विपणन संचार के तत्व - Components of Marketing Communication
विपणन संचार के तत्व - Components of Marketing Communication
विपणन संचार से निम्नलिखित चार प्रमुख संघटक माने जाते हैं
1. वैयक्तिक विक्रय (Personal selling) “विक्रय करने के उद्देश्य से एक या अधिक ग्राहकों के साथ वार्तालाप में मौखिक प्रस्तुतीकरण वैयक्तिक विक्रय कहलाता है।” अतः वैयक्तिक विक्रय प्रत्यक्ष विक्रय की वह विधि है जिसमें विक्रेता और संभावित क्रेता आमने-सामने बातचीत के द्वारा एक-दूसरे को प्रभावित करते है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत क्रेता को संतुष्ट करके उत्पाद के विक्रय का प्रयास किया जाता है। वैयक्तिक विक्रय का उद्देश्य भावी ग्राहकों में उत्पाद के प्रति जानकारी उत्पन्न करना, रुचि पैदा करना तथा कीमतों को तय करना है। वैयक्तिक विक्रय लोचपूर्ण संघटक है जो द्विमार्गीय संचार की व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
2. विज्ञापन (Advertising ) विज्ञापन एक ऐसी अवैयक्तिक विक्रय कला है जिसमें एक निश्चित प्रायोजक द्वारा उत्पादों, सेवाओं एवं विचारों की सूचना दी जाती है तथा जिसके लिए भुगतान किया जाता है। विज्ञापन एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें विज्ञापन के विभिन्न माध्यमों जैसे दूरदर्शन, आकाशवाणी, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, बाह्य विज्ञापन आदि का प्रयोग किया जाता है। विज्ञापन संदेश को बार-बार दोहराया जाता है। यह ग्राहकों को विज्ञापित वस्तुा क्रय करने के लिए प्रेरित करता है। विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य निर्माता को लाभ पहुँचाना, उपभोक्ता को शिक्षित करना, विक्रेता को सहायता प्रदान करना तथा सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक तथा उपभोक्ता के बीच संबंध स्थापित करना है। यह संघटक एक मार्गीय संचार की व्यवस्था करता है। उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन में यह संघटक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैयक्तिक विक्रय पर होने वाले व्यायों की अपेक्षा इस संघटक पर कम व्योय होते हैं।
3. विक्रय संवर्द्धन (Sales Promotion ) – विक्रय संवर्द्धन संचार सम्मिश्र का तीसरा प्रमुख संघटक है। विक्रय संवर्द्धन संघटक विज्ञापनों तथा वैयक्तिक विक्रय क्रियाओं को समन्वित तथा एकीकृत करता है तथा उन्हें प्रभावी बनाने हेतु समर्थन प्रदान करना है। विक्रय संवर्द्धन में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। जिनका उद्देश्य विक्रेताओं, विज्ञापन विभाग एवं वितरकों के कार्यों को सम्पन्न करना तथा साथ ही साथ विक्रेताओं के कार्यों को अधिक प्रभावपूर्ण बनाना होता है जिससे विक्रय बढ़ सके तथा उपभोक्ताओं को क्रय में अधिक रुचि लेने को प्रेरित किया जा सके।
4. प्रचार (Publicity) - इसे जन संबंध (Publicity) नाम से भी जाना जाता है। प्रचार अवैयक्तिक होता है तथा इसके लिए किसी प्रकार का भुगतान नही करता पड़ता है। इसके अंतर्गत निर्माता द्वारा बाजार एवं आम जनता में अनुकूल वातावरण बनाया जाता है। इसके लिए दूरदर्शन, रेडियो, समाचार-पत्र, पत्रिकाओं आदि द्वारा उत्पाद या सेवाओं के बारे में अनुकूल समाचार प्रसारित या प्रकाशित कराये जाते हैं।
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