क्रेडिट यूनियन - credit Union

क्रेडिट यूनियन - credit Union


आपसी सहकारी समितियां हैं, जिसमें एक विशेष क्रेडिट यूनियन में जमा जमा करना उस क्रेडिट यूनियन में स्टॉक खरीदने जैसा है उस क्रेडिट यूनियन की कमाई उन सभी को वितरित की जाती है जिनके पास लाभांश के रूप में एक खाता है (दूसरे शब्दों में, जमाकर्ताओं का आंशिक मालिक हैं)। क्रेडिट यूनियनों उपभोक्ता सेवाओं पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, इसलिए मैं इन पुस्तकों में या यहाँ कहीं और उनके बारे में चर्चा नहीं करता। हालांकि, उनके डिजाइन को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि मुस्लिम देशों में वाणिज्यिक बैंकों में यह एक ही प्रारूप बहुत लोकप्रिय है, जहां


शरिया कानून परंपरागत रूपों को चार्ज या भुगतान करने पर रोकता है।

नतीजतन, यू.एस. में एक क्रेडिट यूनियन का ढांचा दुनिया के दूसरे हिस्सों में वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अपनाया जाता है, इसलिए इस ढांचे की बुनियादी जागरूकता अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट बैंकिंग के लिए उपयोगी हो सकती है। बीमा कंपनियां


बीमा (इंश्योरेंस) उस साधन को कहते हैं जिसके द्वारा कुछ शुल्क (जिसे प्रीमियम कहते हैं) देकर हानि का जोखिम दूसरे पक्ष (बीमाकार या बीमाकर्ता) पर डाला जा सकता है। जिस पक्ष का जोखिम बीमाकर पर डाला जाता है उसे 'बीमाकृत' कहते हैं। बीमाकार आमतौर पर एक कंपनी होती है जो बीमाकृत के हानि या क्षति को बांटने को तैयार रहती है और ऐसा करने में वह समर्थ होती है।


बीमा एक प्रकार का अनुबंध (ठेका) है। दो या अधिक व्यक्तियों में ऐसा समझौता जो कानूनी रूप से लागू किया जा सके, अनुबंध कहलाता है। बीमा अनुबंध का व्यापक अर्थ है कि बीमापत्र (पॉलिसी) में वर्णित घटना के घटित होने पर बीमा करनेवाला एक निश्चित धनराशि बीमा करानेवाले व्यक्ति को प्रदान करता है। बीमा करानेवाला जो सामयिक प्रव्याजि (बीमाकिस्त, प्रीमीयम ) बीमा करनेवाले को देता रहता है, वही इस अनुबंध का प्रतिदेय है। 'बीमा' शब्द फारसी से आया है जिसका भावार्थ है 'जिम्मेदारी लेना। डॉ. रघुवीर ने इसका अनुवाद किया है 'आगोप। उसका अंग्रेजी पर्याय "इंश्योरेंस" (Insurance) है।


बीमा वास्तव में बीमाकर्ता और बीमाकृत के बीच अनुबंध है जिसमें बीमाकर्ता बीमाकृत से एक निश्चित रकम (प्रीमियम) के बदले किसी निश्चित घटना के घटित होने (जैसे कि एक निश्चित आयु की समाप्ति या मृत्यु की स्थिति में) पर एक निश्चित रकम देता है या फिर बीमाकृत की जोखिम से होने वाले वास्तविक हानि की क्षतिपूर्ति करता है। बीमा के आधार के बारे में सोचने पर पता चलता है कि बीमा एक तरह का सहयोग है जिसमें सभी बीमाकृत लोग, जो जोखिम का शिकार हो सकते हैं, प्रीमियम अदा करते हैं जबकि उनमें से सिर्फ कुछ (बहुत कम) को ही, जो वास्तव में नुकसान उठाते हैं, मुआवजा दिया जाता है। वास्तव में जोखिम की संभावना वालों की संख्या अधिक


होती है लेकिन किसी निश्चित अवधि में उनमें से केवल कुछ को ही नुकसान होता है। बीमाकर्ता (कंपनी) बीमाकृत पक्षों के नुकसान को शेष बीमाकृत पक्षों में बांटने का काम करती है। बीमा किस स्थिति में हो सकता है?


जुआ खेलने या बाजी लगाने में भी दो व्यक्ति यही समझौता करते हैं कि अमुक घटना घटित होने पर दूसरा व्यक्ति अमुक धनराशि अदा करेगा। लेकिन उसे बीमा नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वयं उस घटना के घटित होने या न होने में उस बाजी लगानेवाले का कोई स्वतंत्र हित नहीं होता। अस्तु, बीमा अनुबंध के लिए सामान्य अनुबंध के तत्वों के साथ-साथ बीमाहित (Insurable Interest) का अस्तित्व आवश्यक है। उदाहरणार्थ क के जीवन का बीमा कोई अजनबी व्यक्ति ख नहीं करा सकता क्योंकि क के जीवित रहने या न रहने में ख का कोई स्वतंत्र हित नहीं है। लेकिन यदि ख क की पत्नी हो तो क के जीवित रहने में ख का हित निहित होने से ख द्वारा क के जीवन का बीमा करना नियमानुकूल होगा।


बीमा हित का अर्थ व्यापक है। पति पत्नी के जीवित रहने में एक दूसरे का हित तो स्पष्ट ही है। कर्जदार के जीवन में महाजन का हित भी वैसा ही मान्य है। इसी प्रकार संपत्ति बीमा के लिए बीमाहित उस संपत्ति के स्वामी को तो है ही यह हित उस व्यक्ति को भी उपलब्ध हो जाता है, जिसे किसी अनुबंध के अंतर्गत कोई संपत्ति उपलब्ध होती है। यही नहीं, संपत्ति पर कब्जा मात्र होने से, भले ही वह कब्जा गैरकानूनी हो, बीमाहित उपलब्ध हो जाता है। उदाहरणार्थ अगर किसी दिवालिए के पास उसके कब्जे में कोई संपत्ति हैं, भले ही वह अधिकर स्वतः गैरकानूनी हो क्योंकि दिवाला निकलने के बाद उसकी सारी संपत्ति पर अधिकारी अभिहस्तांकिनी का अधिकार हो जाता है किंतु उस संपत्ति का बीमा कराने के लिए उस दिवालिए को भी अधिकारी मान लिया जाता है।

किसी अनुबंध द्वारा बीमा हित उत्पन्न होने का आधार उत्तरदायित्व अथवा हित दोनों हो सकते हैं। उदाहरणार्थ जब कोई व्यक्ति कोई मकान किराए पर लेता है तो उस मकान की हिफाजत का कोई उत्तरदायित्व उस पर नहीं होता लेकिन चूँकि उस अनुबंध से किराएदार को सुरक्षा की सुविधा उपलब्धि होती है अतः उस मकान की सुरक्षा के बीमे के लिए भी उस किराएदार को बीमा हित उपलब्ध हो जाता है।


बीमा अनुबंध के लिए बीमा हित की आवश्यकता उक्त अनुबंध की वैधता आँकने के लिए तो है ही, क्षतिपूर्ति के नियमों का पालन करने के लिए भी यह आवश्यक है।

इस संबंध में अंग्रेजी विधि (नियम) और भारतीय विधि में कुछ अंतर है। अंग्रेजी विधि के अनुसार (समुद्र बीमा विधि 1906 और जीवन बीमा विधि 1774) आगोप्य हित का वस्तुत: अस्तित्व आवश्यक है। किंतु भारतीय विधि में ऐसा नहीं हैं। भारतीय अनुबंध विधि की धारा 30 के अनुसार चूँकि जुआ या शर्त बाजी आदि के समझौते अवैध करार दिए गए हैं इसलिए बीमाहित का अस्तित्व वस्तुतः न भी हो किंतु उसे उपलब्ध करने की उचित आधार पर आशा हो तो भी वह बीमा अनुबंध की वैधता के लिए पर्याप्त है।


बीमा अनुबंध का दूसरा प्रमुख आधार सद्भाव एवं निष्कपटता है। अतः यह आवश्यक है

कि दोनों पक्ष (बीमा करनेवाला तथा बीमा करानेवाला) बीमा विषयक सभी तथ्य प्रगट कर दें। प्रगट कर देने का अर्थ यही है कि जान बूझकर कुछ छिपाया न जाए। यदि कोई सार तथ्य प्रगट न किया गया हो तो दूसरा पक्ष उक्त अनुबंध से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।


इस संबंध में भी अंग्रेजी और भारतीय विधि नियमों में कुछ अंतर है। भारतीय बीमा विधि की धारा 45 के अनुसार जीवन बीमा में अनजाने में, जानबूझकर तथा बेईमानी की इच्छा से यदि कोई गलतबयानी हो जाए तो वह क्षम्य मानी गई है। लेकिन सामान्य विधि (अंग्रेजी कानून) के अनुसार अनजाने में भी कोई गलतबयानी उस अनुबंध को प्रभावित कर देती है।