विज्ञापन की आलोचना या दोष - Criticism or Evils of Advertising
विज्ञापन की आलोचना या दोष - Criticism or Evils of Advertising
विज्ञापन को उपयोगी मानने के बाद भी अनेक विद्वानों जैसे गिलब्रेध, वानों पेकार्ड, स्लेसिंगर आदि इसकी कड़ी आलोचना भी की है। उन्होंने विज्ञापन को अपव्ययी', 'अनुत्पादक', 'रिझाने वाला', 'धोखा देने वाला', 'बहकाने वाला' आदि विशेषणों का प्रयोग करके आलोचना की है। उनके अनुसार विज्ञापन समाज में मूल्यों को नष्ट करता है तथा उपभोक्ताओं पर अनावश्यक लागतों के बोझ को बढ़ा देते हैं। ये राष्ट्रीय साधनों की बर्बादी को प्रोत्साहित करता है तथा आवश्यकताओं को बढ़ाकर भौतिकवाद की बुराइयों को जन्म देता है।
विज्ञापन के प्रमुख दोष निम्नलिखित है
1. आवश्यकताओं में वृद्धि - विज्ञापन मनुष्य में तीव्र इच्छाएँ जागृत करके उन्हें आवश्यकताओं में बदल देता है।
विज्ञापन प्रभाव से मनुष्य की आवश्यकताएँ ऐसी बढ़ जाती है जिन्हें सीमित साधनों से पूरा करना कठिन हो जाता है। भारतीय दर्शन के अनुसार आवश्यकताएँ व्यक्ति के दुख का कारण है क्योकि ये असंतुस्टि को बढ़ाती है।
2. धन का अपव्यय :- विज्ञापन उपभोक्ताओं की क्रय प्राथमिकताओं ( Buying Pretences) में परिवर्तन कर देता है। विज्ञापन से प्रभावित होकर ग्राहक फैशन व विलासिता की वस्तुएँ जिनकी उसे आवश्यकता नहीं होती उसे खरीदने के लिए बाध्य हो जाता है। इससे उसका बजट बिगड़ जाता है तथा सीमित धन का दुरूपयोग होता है।
3. भ्रामक विज्ञापन :- विज्ञापन को प्रभावी बनाने के लिए निर्माता कई बार गलत तथ्यों को पेश करते हैं। इस अतिशयोक्तिपूर्ण विज्ञापन से ग्राहक ठगे जाते हैं तथा उनका विज्ञापन पर से विश्वास उठ जाता है।
संसाधनों की बर्बादी:- विज्ञापन के कारण उपभोक्ताओं की रुचि, पसंद, फैशन तथा जीवन-शैली में तेजी से परिवर्तन होते रहते हैं जिसके कारण बाजार में प्रचलित वस्तुएँ फैशन से बाहर हो जाती है और नई वस्तुएँ चलन में आ जाती है। इस तरह व्यापारियों को घाटे पर पुरानी वस्तुओं को बेचना पड़ता है तथा निर्माताओं को नई वस्तुओं के निर्माण पर अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है। इससे संसाधनों का नुकसान होता है।
5. मूल्यों से वृद्धि :- कुछ विद्वानों का मत है कि विज्ञापन का व्यय भार उपभोक्ता को ही उठाना पड़ता है। विज्ञापन पर किया गया खर्च वस्तु की लागत से जोड़ दिया जाता है जिससे वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो जाती है।
6. सामाजिक बुराइयों का जन्मदाता :- विज्ञापन के कारण व्यक्ति के जीवन में अनेक सामाजिक बुराइयाँ जैसे-प्रतिस्पर्धा, धूम्रपान, ईर्ष्या, विलासितपूर्ण जीवन, धन का अपव्यय आदि उत्पन्न हो जाता है। इससे उनका व्यक्तिगत जीवन कष्टमय को जाता है तथा समाज में निष्क्रियता बढ़ती है।
7.
नैतिक पतन :- विज्ञापन को प्रभावी बनाने के लिए कुछ निर्माता द्वारा विज्ञापन में अश्लीलता प्रस्तुत
किया जाता है, जिससे समाज में अनैतिकता फैलती है। विज्ञापन में प्रतिस्पर्धा :- एक कंपनी के विज्ञापन को देखकर अन्य कंपनियाँ भी विज्ञापन पर खर्च बढ़ा देती है तथा बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन करने लगती है। इससे कंपनियों में विज्ञापन को प्रभावी बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। वे वस्तु के गुण तथा ग्राहक संतुष्टि की तरफ ध्यान नहीं देते हैं। 8.
9. दुर्घटनाओं में वृद्धि :- यातायात दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण विज्ञापन भी है। चौराहे, सड़कों के किनारे तथा भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर पोस्टर्स व होर्डिग्स लगे होने के कारण वाहन चालकों तथा राहगीरों का ध्यान बँट जाता है जिसके परिणामस्वरूप भयंकर दुर्घटनाएँ घटित हो जाती है। नकली वस्तुओं का विक्रय :- विज्ञापन के द्वारा नकली तथा निम्न श्रेणी की वस्तुओं का भी विक्रय
10.कर दिया जाता है जिसमें लोगों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं।
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