कार्यशील पूँजी का चक्रीय तंत्र - cyclical system of working capital
कार्यशील पूँजी का चक्रीय तंत्र - cyclical system of working capital
कार्यशील पूँजी को चक्रीय पूँजी भी कहा जाता है। इसकी प्रवृत्ति चक्रीय होती है। व्यापार में यह चक्र की भांति गोल घूती है। रोकड़ से शुरू होती है, स्वरूप बदलती है। कुछ अवधि पश्चात् फिर रोकड़ में परिवर्तित हो जाती है। इस तरह व्यवसाय में पुनरावृत्ति होती रहती है। स्थायी सम्पत्तियों पर पुनः पुनः खर्च नही किया जाता किन्तु चालू सम्पत्तियों पर पुनः पुनः खर्च किया जाता है। एक चक्र पूरा होने पर व्यवसाय में साख का सृजन होता है, जितनी अधिक बार यह चक्र पूरा होगा व्यवसाय में लाभ की मात्रा बढ़ जाती है।
व्यवसाय में कच्चा माल खरीदकर, मजदूरी, उपरिव्ययों, कारखाना व्ययों, कार्यालय व्ययों का भुगतान करके निर्मित माल तैयार किया जाता है। इसे नकद या उधार बेचकर रोकड़ प्राप्त की जाती है।
इस तरह लाभ का सृजन होता है। कर इत्यादि का भुगतान करके यह लाभ व्यवसाय में रख लिया जाता है। यह चक्र परिक्रमा पथ पुनः पुनः : निरन्तर चलता रहता है। इस हेतु जो पूँजी या कोष की आवश्यकता होती है, कार्यशील पूँजी कहलाती है । व्यवसाय में कितनी कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती इसका निर्धारण का एक तरीका संचालन चक्र भी है।
संचालन चक्र
संचालन चक्र से आशय यह है कि व्यवसाय में कच्चा माल खरीदने से लेकर उसे निर्मित माल में परिवर्तित करना, फिर उसे बेचकर रोकड़ प्राप्त करने की इस प्रक्रिया में लगने वाले समय को संचालन चक्र कहा जाता है। कार्यशील पूँजी की मात्रा का अनुमान संचालन चक्र की सहायता से किया जा सकता है। संचालन चक्र प्राप्यों, स्कंधों, देनदारों, लेनदारों के चक्र को दिनों में विश्लेषित करता है। अर्थात् प्राप्यों से कितने दिनों में रूपया वसूल होगा। स्कंध को विक्रय में परिवर्तित होने में कितना समय लगेगा। लेनदारों को कितने दिनों के अंतराल से भुगतान किया जाता है। कच्चा माल निर्मित माल में कितने दिन से परिवर्तित होता है। इस तरह कुल लगने वाले समय को संचालन चक्र कहा जाता है।
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