सेंसेक्स और निफ्टी का निर्धारण - Determination of Sensex and Nifty

सेंसेक्स और निफ्टी का निर्धारण - Determination of Sensex and Nifty


सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही सूचकांकों में होने वाले परिवर्तन को मापने के लिए हमारे देश में फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटालाइजेशन (एफएफएमसी) नाम का तरीका अपनाया जाता है। इसके तहत सभी कंपनियों के बाजार में उपलब्ध शेयरों (कुल शेयरों के आधार पर नहीं) की कुल कीमत के आधार पर गणना की जाती है। हालांकि 2003 तक सेंसेक्स का निर्धारण इसकी 30 कंपनियों के सभी शेयरों के कुल बाजार मूल्य के आधार पर किया जाता था। इस पद्धति से सूचकांक में परिवर्तन को हम एक उदाहरण से समझते हैं। माना कि किसी कंपनी के कुल एक लाख शेयर हैं, जिनमें 30 हजार उसके मालिक और 70 हजार आम लोगों के पास हैं। अब यह मानते हैं

कि एक जुलाई 2017 को इस कंपनी के एक शेयर का मूल्य 1,000 रुपए है। एफएफएमसी पद्धति में आम लोगों वाले 70 हजार शेयरों का ही ध्यान रखा जाता है। यानी इस पद्धति के अनुसार उस कंपनी के बाजार में उपलब्ध कुल शेयरों की कीमत सात करोड़ रुपए होगी। यही तरीका सेंसेक्स की सभी 30 और निफ्टी के 50 प्रतिनिधि कंपनियों के शेयरों पर लागू किया जाता है। इस तरह एक जुलाई, 2017 को सूचकांक के सभी प्रतिनिधि कंपनियों के बाजार में उपलब्ध शेयरों का कुल मूल्य प्राप्त हो जाएगा।


माना कि यह योग 320 करोड़ रुपए है। इसके बाद पता करना होगा कि एक अप्रैल, 1979 (सेंसेक्स की आधार तिथि) या 3 नवंबर,

1995 (निफ्टी की आधार तिथि) के दिन ऐसी सभी कंपनियों के बाजार में उपलब्ध शेयरों का बाजार मूल्य कितना था। माना कि वह राशि उस समय एक करोड़ रुपए थी। तो आज का सूचकांक प्राप्त करने के लिए हमें 320 करोड़ (नया मूल्य) में एक करोड़ (पुराना मूल्य) से भाग देकर प्राप्त हुई राशि में 100 या 1,000 (सूचकांक का आधार मूल्य) से गुणा करना होगा। यही यानी 32,000 आज की तारीख में बाजार के सूचकांक का स्तर कहा जाएगा।




BSE तथा NSE भारत के प्रमुख शेयर बाजार हैं जहां शेयरों की ट्रेडिंग होती है. सेंसेक्स तथा निफ्टी इनके प्रमुख सूचकांक हैं. सेंसेक्स की ही तरह निफ्टी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर मुक्त फ्लोट बाजार भारित शेयर बाजार सूचकांक (free float market-weighted stock market index) है.

किसी भी कंपनी के बाजार पूंजीकरण Market Capitalization का वह हिस्सा जो बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध हो सकता है वह फ्री फ्लोट बाजार पूँजी होगी और उसी के आधार पर निफ्टी की भी गणना की जाती है. पचास शेयरों के इसी इंडेक्स को निफ्टी कहते हैं.


मुक्त फ्लोट बाजार भारित शेयर बाजार सूचकांक (free-float market-weighted stock market index) में इंडेक्स की कैसे गणना की जाती है. निफ्टी का आधार वर्ष 1995 है और आधार अंक 1000 है. इस सूचकांक की गणना 3 नवम्बर 1995 से की जाती है और इस दिन सूचकांक का आधार 1000 माना गया है. आज यदि निफ्टी का मूल्य 8000 के करीब है, तो इसका मतलब यह है कि निफ्टी के शेयरों की कीमत 1995 के मुकाबले अब तक 800% तक बढ़ चुकी है.


एनएसई में ट्रेडिंग: थोक ऋण बाजार (डब्लयूडीएम), पब्लिक इशू ऑफरिंग (पीआईओ), समयबद्ध पीआईओ प्रणाली, स्क्रीन आधाररत ट्रेडिंग सिस्टम (SBTS) (Trading at NSE: Wholesale Debt Market (WDM), Public Issue Offerings (PIO), Time Bound PIO System, Screen Based Trading System (SBTS)


एनएसई ने सिडबी के साथ मिलकर छोटी कंपनियों के लिए एक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म TReDS लॉन्च किया है इसमें ट्रेड रिसीट की ट्रेडिंग होगी यानी छोटी कंपनियों को मिलने वाले भुगतान की रसीद ट्रेड की जा सकेगी, इससे छोटी कंपनियों के लिए पूंजी की दिक्कत कम होगी। TREDS प्लेटफॉर्म एमएसएमई के लिए है। देश की जीडीपी में एमएसएमई की हिस्सेदारी 30 फीसदी है। इससे कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की किल्लत कम होगी।

कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग के आधार पर फाइनेंसिंग की जाएगी। बड़ी कंपनियों के बिल की एवज में जल्द पैसा मिलेगा। इससे कंपनियों की फाइनेंस कॉस्ट भी कम होगी।


थोक ऋण बाजार (डब्लयूडीएम) ऋण बाज़ार वह बाज़ार है जहां निश्चित आय की विभिन्न प्रकार और गुणों वाली प्रतिभूतियां जारी की जाती हैं और खरीदी व बेची जाती है। अतः ऋण बाजार निश्चित आय वाली प्रतिभूतियों का वह बाजार है जिसमें केन्द्र व राज्य सरकार, नगर निगम अन्य सरकारी निकायों व वाणिज्यिक इकाइयों, जैसे वित्तीय संस्थाओं, बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां, पब्लिक लिमिटेड कंपनियों और संरक्षित वित्तीय प्रपत्रों की खरीद बिक्री की जाती है।


थोक ऋण बाजार- इसमे निवेशक मुख्य बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक, प्राथमिक व्यापारी, बीमा कंपनियां, वित्तीय संस्थाओं, निगमित इकाइयों, एम एफ और एफ आई आई वगैरह के रूप में होते हैं। खुदरा ऋण बाजार में व्यक्ति गत निवेशक, प्रोविडेंट फंड, पेंशन फंड, प्राइवेट प्राइवेट ट्रस्ट, एनबीएफसी और दूसरी वैध इकाइयां होती हैं। ऋण बाजार की वर्तमान प्रकृति सौदा बाजार की है जहां ज्यादातर सौदे टेलीफोन के द्वारा होते हैं और पुष्टि के लिए


उसकी जानकारी एक्सचेंज को दे दी जाती है। अतः इसकी प्रकृति थोक बाजार की है। निवेशकों में सर्वप्रमुख हैं वाणिज्यिक बैंक और वित्तीय संस्थाएं। पिछले कुछ वर्शो में निवेशक आधार बढ़ा है।

इसमें सहकारी बैंक निवेशक संस्थाएं, बड़े कॉरपोरेट घराने, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां, म्यूचुअल फंड और धनकुबेर भी शामिल हुए हैं। एफआईआई को भी अपने फंड का 100 प्रतिशत ऋण बाजार में निवेश की अनुमति प्रदान कर दी गई हैं। पहले यह सीमा 30 प्रतिशत थी। 1988-1989 में सरकार ने एफ आई आई को ट्रेजरी बिल में भी निवेश की अनुमति दे दी। इसकी वजह भी निवेशक आधार को बढ़ाना था।सरकारी प्रतिभूतियां रिजर्व बैंक द्वारा प्रतिफल या मूल्य आधार पर नीलामी द्वारा जारी की जाती है। नीलामी बहुमूल्यीय या एकल मूल्य वाला होता है।



रिजर्व बैंक ने फुटकर निवेशकों के लिए गैर प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी सुविधा की घोषणा की है। इसके तहत घोषित रकम को 5 प्रतिशत हिस्से के लिए गैर प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के तहत बोली लगाई जाएगी। इसके मुख्यतः दो तरीके हैं:


पूर्ण खरीद और बिक्री वह सौदा है जिसमें उत्क्रमण की गुंजाइश सौदे निपटाने के समय नहीं रहती है। खरीद या बिक्री स्वतंत्र होता है यह सौदे के समय या बाद में किसी अन्य सौदे के साथ नहीं जुड़ा होता है। रेडी फॉरवर्ड ट्रेड (इसे सामान्यतः पुनः खरीद करार या रेपो ट्रेड के रूप में जाना जात है वैसा सौदा है जिसमें उस


सौदे के पीछे कालांतर में उत्क्रमण की मंशा होती है, लेकिन उस दर पर जिसमें ब्याज भी शामिल होता है। यह सौदे के दो विपरीत चरणों के समयांतराल पर आधारित होता है। इसलिए उस तरह के सौदे में एक भागीदार प्रतिभूतियां बेचता है और उससे बाद में खरीद का करार करता है यह सौदा रेपो ट्रेड कहलाता है। लेकिन विक्रेता की नजरों से। और यही सौदा खरीददार के लिए रिवर्स रेपो ट्रांजेक्शन कहलाता है।


रेपोज इस प्रकार विक्रेता को विशिष्ट रकम उपलब्ध करा तरलता उपलब्ध कराते हैं। यह सौदा रेपो सौदा कहलाता है विक्रेता की दृष्टि से और खरीददार की दृष्टि में यह रिवर्स रेपो सौदा होता है। रेपोज और रिवर्स रेपोज का इस्तेमाल बाजार में सामान्यतः अल्पावधि तरलता प्रबंधन के लिए किया जाता है। इन्हें उधार तंत्र के समानांतर परिभाषित किया जा सकता है। बैंक या वित्तीय संस्थाए अक्सर अपने रिजर्व की आवश्यकताओं और तरलता प्रबंधक के लिए रिवर्स रेपो की सहायता लेती हैं। प्रतिफल से आशय मिलने वाली राशि के उस प्रतिशत से हैं जो स्टॉक पर डिविडेंड (लाभांश) के रूप में मिलता है या फिर बांड या नोट पर प्रतिफल निवेश के प्रकार और उनके गुणों पर निर्भर करता है।


परिपक्वता पर प्रतिफल (वाईटीएम) ऋण बाजार में प्रतिफल का सर्वाधिक बड़ा मापक है। यह बांड, नोट या निश्चित आय वाली प्रतिभूतियों पर मिलने वाला प्रतिशत होता है,

अगर आप उसे परिपक्वता तक अपने पास रखते हैं।


वर्तमान प्रतिफल कूपन को बाजार दर से भाग देकर निकाला जाता है।


अतः वर्तमान प्रतिफल प्रतिभूति का कूपन (% में) प्रतिभूति का अंकित मूल्य (सरकारी प्रतिभूति में 100 रुपये) वा


प्रतिभूति का बाजार मूल्य


उदाहरण: मान लें कि 10.18% सरकारी प्रतिभूति 2012 का बाजार मूल्य 120 रूपए है। इस पर वर्तमान प्रतिफल


0.1018x100)/120-8.48% 1 सरकारी प्रतिभूतियों का प्रतिफल विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है। यह अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति, मुद्रास्फीति, भविष्य में ब्याज दर की उम्मीद, सरकारी उधार कार्यक्रम और सरकार की मौद्रिक नीतियों द्वारा प्रभावित होती हैं।


परिपक्वता पर प्रतिफल ( वाईटीएम) का आकलन दर, परिपक्वता की समयावधि और बाजार मूल्यों द्वारा होता है। यह बांड पर प्रतिफल का अंतरिम दर है जिसका निर्धारण बांड की आयु के दौरान नगदी आगम के आकलन द्वारा होता है। वाईटी- एम से संबंधित महत्वपूर्ण धारणा यह है कि बांड की आयु के दौरान उस पर मिले कूपन ब्याज को उसी दर पर पुनः निवेश किया जाता है।


वाईटीएम का आकलन मूलतः 'ट्रायल एंड एरर' विधि द्वारा वाईटीएम के लिए सभी संभावित नगद आगम का आकलन कर किया जाता है ताकि नगद आगम की शून्य तक दर पर प्राप्ति हो सके।


बाजार में बाण्ड के मूल्यों का निर्धारण मांग और पूर्ति के द्वारा होता है, जैसा कि अन्य बाजार में होता है। बाण्ड का मूल्य बाजार में अन्य बहुत सारे कारकों पर निर्भर होता है, और नीचे दिये गये निम्नलिखित कारकों में बदलाव के अनुसार चढ़ेगा और उतरेगा।



आर्थिक परिस्थिति


सामान्य मुद्रा बाजार की स्थितियाँ, उसमें राज्य द्वारा अर्थव्यस्था में मुद्रा पूर्ति भी शामिल है। ब्याज की दर जो कि बाजार में मौजूद है और नये निर्गम की दर आकलित भविष्य ब्याज दर जारीकर्ता की साख गुणवत्ता यहां यद्यपि बाजार में मूल्य निर्धारण के लिए उसके प्रतिफल के आधार पर मापन को मजबूती देने वाला एक सिद्धांत भी है। बांड की कीमत और प्रतिफल प्रतिलोमत: जुड़े होते हैं। यानी अगर कीमत बढ़ेगी तो प्रतिफल घटेगा। इसी तरह कीमत घटने पर प्रतिफल बढ़ेगा।


ब्याज दर के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव का तुरंत और संभाव्य असर बांड की कीमतों पर पड़ता है। जब बाजार में व्याज दर बढ़ती है, गैर समाशोधित बांडो की कीमतें ऊंचे ब्याज दर वाले नए बांडो के समतुल्य गिरती हैं।

कीमत में गिरावट इसलिए होती है कि निम्न कूपन वाले बांड को खरीदने वाले कम होते हैं। कीमत में गिरावट उस


हद तक होगी जहां पुराने बांड पर समान प्रतिफल प्राप्त हो सके जोकि नए बांड पर उपलब्ध है। बाजार में ब्याज दर के गिरने का विपरीत असर होता है। इससे गैर समाशोधित बांड की कीमतें बढ़ती हैं। उस हद तक बढ़ती हैं जब तक कि पुराने बांड का प्रतिफल गिर कर जारी किए गये नए बांड के ब्याज दर के बराबर न आ जाए। ये उतार-चढ़ाव यह सुनिश्चित करते हैं कि बांड की पूरी जीवन अवधि में उसका मूल्य समान नहीं रहेगा और यह यह बाजार में ब्याज दर, परिपक्वता और कूपन दर वगैरह के आधार पर वास्तविक अंकित मूल्य से ज्यादा या कम हो सकता है।