कार्यशील पूंजी का निर्धारण - Determination of working capital

कार्यशील पूंजी का निर्धारण - Determination of working capital


स्कंध अवधि, देनदार अवधि, लेनदार अवधि की गणना करके संचालन चक्र अवधि ज्ञात कर ली जाती है। इन सूत्रों को यथा स्थान समझाया गया है। वास्तव में संचालन चक्र को पूरा करने में जिस कोष की आवश्यकता होती है उसे कार्यशील पूँजी कहा जाता है।”


लागत संतुलन:


कार्यशील पूंजी में संतुलन बहुत आवश्यक है- अनुकूल स्तर प्राप्त करना होता है। जोखिम प्रत्याय संतुलन में एक अलग तरीका है। चालू सम्पत्तियों के विशेष स्तर पर लागत बनाये रखना। चालू सम्पत्तियों को व्यापार में रखने या न रखने के संदर्भ में दो लागत शामिल है।


(अ) तरलता की लागत (ब) अतरलता की लागत । अ) तरलता की लागत :- यदि फर्म में चालू सम्पत्तियों का स्तर बहुत अधिक है जो अत्यधिक तरलता है।


ऐसी दशा में सम्पत्तियों पर प्रत्याय कम होगा क्योंकि सम्पत्तियाँ निष्क्रिय रोकड़ और स्कंध में अवरूद्ध हो गई है जो कुछ नहीं कमा रहे ऊँचे स्तर के देनदार लाभदायकता को घटा रहे हैं। इस तरह चालू सम्पत्तियों के स्तर बढ़ने के साथ, तरलता की लागत में वृद्धि हो जाती है, ।


ब) अतरलता की लागत का आशय अपर्याप्त चालू सम्पत्तियाँ रखना,

फर्म अपने दायित्वों को चुका नहीं पाती क्योंकि रोकड़ की कमी है। यह दशा फर्म को ऊँची दर से ऋण लेने पर बाध्य करती है। इससे फर्म की उधार लेने की क्षमता प्रभावित होगी और भविष्य में कोष प्राप्त करने में कठिनाई होगी। इन सबसे फर्म विघटन की ओर प्रवृत्त होती है। कम स्तर पर स्कंध की मात्रा विक्रय की हानि कराती है। ग्राहक अन्य प्रतिस्पर्धियों के पास चले जायेंगे। देनदारों का निम्न स्तर कठोर साख नीति के परिणामतः होगी जो कि विक्रय को प्रभावित करेंगे। इस तरह निम्न स्तर की चालू सम्पत्तियों की भी लागत है। चालू सम्पत्तियों का अनुकूलतम स्तर पाने के लिए लाभदायकता और सक्षमता की गुत्थी को कुल लागत को न्यूनतम रखकर किया जा सकता है। चालू सम्पत्तियों के स्तर में बढ़ोतरी से तरलता की लागत बढ़ती है। वहीं अतरलता की लागत घटती है। चालू सम्पत्तियों के स्तर में कमी करने से तरलता की लागत घटती है और अतरलता की लागत बढ़ती है। फर्म को उस स्तर पर चालू सम्पत्तियाँ रखनी चाहिए जहाँ से दोनों लागतें न्यूनतम रहती हो। न्यूनतम लागत बिन्दु अनुकूलतम स्तर कहलाता है।