कार्यशील पूँजी की आवश्यकता के निर्धारक तत्व - Elements of Working Capital requirements

कार्यशील पूँजी की आवश्यकता के निर्धारक तत्व - Elements of Working Capital requirements


किसी भी व्यावसायिक संस्था में कार्यशील पूँजी कितनी होनी चाहिए इसका निर्धारण करने का कोई निश्चित तरीका या नियम नहीं है। अतः यह एक कठिन कार्य है और यह विभिन्न कारणों से प्रभावित होती है। एक संस्था में विभिन्न परिस्तिथियों में कार्यशील पूँजी की गणना और मात्रा अलग हो सकती है। कार्यशील पूँजी की मात्रा को प्रभावित करने वाले निर्धारक तत्वों, निम्न प्रकार हैं


1. व्यवसाय की प्रकृति कार्यशील पूँजी की मात्रा व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करती है। जनपयोगी संस्थाएँ रेलवे, विद्युत कम्पनी, जल आपूर्ति संस्थान में सीमित कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती. है,

यहाँ नकद बिक्री होती है, स्कंध की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये संस्थाएँ सेवाएँ प्रदान करती है। व्यावसायिक व्यापारिक संस्थाएँ, स्थाई सम्पत्तियों में कम मात्रा में विनियोग करती है. लेकिन यह संस्थायें स्कंधों, प्राप्यों एवं रोकड़ जैसी चल सम्पत्तियों में अधिक राशि विनियोजित करती है। निर्माण संस्थाओं में कार्यशील पूँजी अधिक मात्रा में चाहिए होती है। उत्पादन प्रक्रिया में लगने वाला समय, उधार बिक्री, आदि इसके कारक हैं।


2. व्यवसाय का आकार - व्यवसाय के आकार परिचालन के स्तर के आधार पर भी कार्यशील पूँजी की मात्रा निर्धारित होती है।

बड़े स्तर के व्यावसायिक संस्थानों में बड़ी रकम, कार्यशील पूँजी के लिए चाहिए होती है वही छोटे व्यापारिक संस्थानों में सामान्यतः कम पूँजी की आवश्यकता होती है। कुछ दशाओं में छोटे प्रतिष्ठानों में ऊँचे परिव्यय, संसाधनों के अकुशल प्रयोग के कारण भी अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता हो सकती है।


3. निर्माण प्रक्रिया - निर्माण व्यवसाय में कार्यशील पूँजी की आवश्यकताएँ निर्माणी प्रक्रिया की अवधि के प्रत्यक्ष अनुपात में बदलती है। निर्माण अवधि लंबी होगी तो उसी के अनुरूप कच्चा माल तथा अन्य सामग्री निर्माण प्रक्रिया में लंबे समय तक अवरुद्ध रहेगी,

साथ ही साथ श्रम व अन्य लागतों में भी क्रमिक वृद्धि होती है। फलस्वरूप अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।


4. मौसमी परिवर्तन कुछ उद्योगों में कच्ची सामग्री पूरे वर्ष उपलब्ध नहीं होती। उत्पादन प्रक्रिया निर्बाध रूप से चलती रहे इसके लिए मौसम में प्रचुर मात्रा में कच्चे माल का स्कंध रखने के लिए भी बड़ी राशि की आवश्यकता होती है। व्यवसाय में तेजी के समय अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।


5. स्कंध आवर्त की दर व्यवसाय में बिक्री की गति यदि अधिक है

तो कार्यशील पूँजी की आवश्यकता कम होती है। जिन उद्योगों में स्कंध आवर्त दर ऊँची है उन्हें कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।


6. साख नीति - कार्यशील पूँजी स्तर, साख नीति से निर्धारित होती है। इसका संबंध क्रय विक्रय, लेनदार / देनदार के साथ अपनाई जाने वाली नीति से हैं, जो कि कार्यशील पूँजी की मात्रा को प्रमुख रूप से प्रभावित करती है। जैसे कि -


(a) संस्था की उधार विक्रय की नीति क्या है?


b) संस्था को उधार क्रय की सुविधा उपलब्ध है या नहीं?


उधार क्रय और नगद विक्रय में कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है, जबकि नकद क्रय और उधार विक्रय में अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। उधार विक्रय में पूँजी देनदारों में अवरूद्ध होती है और नकद क्रय में पूँजी लेनदारों को चुकानी होती है।


7. व्यापार चक्र व्यापार चक्र का आशय सामान्य व्यावसायिक क्रिया के एक के बाद एक घटित होने वाले विस्तार व संकुचन से है। तेजी की अवस्था में जब व्यवसाय में समृद्धि होती है

तो बिक्री में वृद्धि, कीमतों में वृद्धि, व्यवसाय का आशावादी विस्तार आदि के कारण कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता पड़ती है। जबकि मंदीकाल में व्यापार संकुचित होता है, बिक्री कम होती है, देनदारों से वसूली में देरी होती है तब कार्यशील पूँजी कम रह सकती है।


8. व्यवसाय के विकास की दर व्यवसायिक क्रियाओं के विकास और विस्तार के साथ-साथ कार्यशील पूँजी की आवश्यकता बढ़ती है। संस्था में विक्रय और स्थाई सम्पत्ति के बढ़ने के साथ कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता होती है, विकासशील संस्था में कार्यशील पूँजी की अग्रिम योजना की सतत् आवश्यकता होती है।


9. मूल्य स्तर में परिवर्तन मूल्य स्तर के परिवर्तन भी कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं को प्रभावित करते है। बढ़ती कीमतों के कारण संस्था को कार्यशील पूँजी की बड़ी रकम की आवश्यकता होती है। चालू सम्पत्तियों को बनाये रखने के लिए अधिक कोष की आवश्यकता होगी। बढ़ती कीमतों का प्रभाव अलग-अलग संस्थाओं में अलग-अलग प्रकार से पड़ता हैं।


10. आपूर्ति की शर्तें - यदि संस्था को कच्चा माल, स्टोर और पुर्जे इत्यादि शीघ्र एवं उचित मात्रा में मिलते हैं तो छोटी स्कंध मात्रा से भी कार्य संभव हो जाता है। अतः कार्यशील पूँजी की मात्रा की कम आवश्यकता होती है। इसके विपरित यदि कच्चे माल की उपलब्धता अनिश्चित होती है,

माल मिलने में देरी की संभावना होती हैं तो उत्पादन सतत् जारी रखने के लिये स्कंध की अधिक आवश्यकता होती है जिसके फलस्वरूप कार्यशील पूँजी अधिक लगेगी।


11. लाभांश नीति - जो संस्थाएँ ऊँचे दर से लाभांश का नकद वितरण करती हैं उन्हें अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है बनिस्बत जो कि अपने लाभों को प्रतिस्थापित कर लेते हैं और नकद लाभांश भी नीची दर से वितरित करते हैं।


12. बैंकिंग संबंध - यदि बैंकिंग सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हैं,

संस्था को बैंक द्वारा अच्छे संबंधो के कारण आसानी से ऋण मिल पाता है, तो कम कार्यशील पूँजी की आवश्कता होती है। जबकि बैंकिग सुविधाओं के अभाव में या बैंक के साथ खराब प्रतिष्ठा के कारण, कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता होती है।


13. आसामान्य कारक हड़ताल, तालाबंदी जैसे असामान्य कारको के कारण संस्था को कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता होती है। मुद्रा स्फिीति के कारण भी अधिक कार्यशील पूँजी की जरुरत होती है।

सरकार की कर नीति, ऊँची कर-दर के कारण अधिक कर भुगतान के लिये, कार्यशील पूँजी की जरुरत होती है।


14. अन्य घटक - उत्पादन विभाग और वितरण विभाग में उचित सामंजस्य के अभाव में कार्यशील पूँजी की जरूरत अधिक होती है। आयात नीति, अनियमित आपूर्ति, परिचालन अकुशलता, श्रमिक सुविधाएँ आदि भी कार्यशील पूँजी की मात्रा को प्रभावित करती हैं। कुछ अन्य तत्व जैसे, मूल्य स्तर परिवर्तन, प्रबन्धकीय योग्यता, राजनीतिक स्थायित्व, युद्ध आशंका, परिवहन व संचार की सुविधा, आदि भी कार्यशील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं।