क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के कार्य - Functions of Regional Rural Bank

 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के कार्य - Functions of Regional Rural Bank



क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको से निम्नलिखित कार्य करने की अपेक्षा की गई है: (क) ऋण क्रियाओं से संबंधित कार्य:- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा किए जाने वाले ये कार्य निम्नलिखित है:


(i) ऋण एवं अग्रिम देना:- ये बैंक छोटे तथा सीमांत किसानों एवं कृषि श्रमिकों को ऋण व अग्रिम देते हैं। इन किसानों तथा श्रमिकों को ऋण एवं अग्रिम उपलब्ध कराने का उद्देश्य उनको इस योग्य बनाना है कि वे निजी रूप से कृषि संबंधी क्रिया शुरू कर सकें। मुख्यतः ये क्रियाएँ हैं-भूमि, बीज, खाद आदि की खरीद करना। इन ऋणों के मिल जाने से ये लोग स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे और बड़े-बड़े भू-स्वामियों तथा साहूकारों के बंधन से मुक्त हो सकेंगे। इससे उनकी आय कमाने की क्षमता में वृद्धि होगी और वे अपना जीवन स्तर ऊँचा करने में सक्षम हो सकेंगे।


(ii) भुगतान प्राप्तकर्ता :- ये ऋण एवं अग्रिम व्यक्तिगत रूप में अथवा समूहों में अथवा सहकारी समितियों को जिनमें कृषि बाजान समितियाँ, कृषि प्रक्रमण समितियाँ, प्राथमिक कृषि समितियाँ शामिल हैं, कृषि उद्देश्यों के लिए अथवा अन्य उद्देश्यों के लिए दिए जा सकते हैं। निजी व्यक्तियों अथवा समूहों को ये ऋण देने का उद्देश्य उनको उत्पादक क्रियाओं में ये राशि निवेशित करने की प्रेरणा देना है, ताकि उनके रोजगार तथा आय में वृद्धि हो । सहकारी कृषि समितियाँ, इन ऋणों की प्राप्ति से इस योग्य हो जाएगी कि वे उत्तम प्रकार के बीज, खाद, उर्वरक आदि खरीद सकें और इस प्रकार अपने उत्पादन के स्तर में वृद्धि कर सकें। इन ऋणों की सहायता से कृषि विपणन समितियाँ सही समय, सही स्थान तथा सही कीमत पर कृषि उत्पाद को बेच सकेंगी।


(iii) साहूकारों से मुक्तिः - क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ये बैंक संस्थागत साख उपलब्ध कराने में वैकल्पिक एजेंसियों के रूप में कार्य करते हैं। समय व्यतीत होने के साथ-साथ इनका उद्देश्य ग्रामीण साहूकारों पर निर्भरता को भी समाप्त करना है। ये बैंक सहकारी साख समितियों के पूरक के रूप में भी कार्य करते हैं।


(iv) बैंकिग सेवाएं उपलब्ध कराना:- ये बैंक ग्रामीण लोगों के घरों पर बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराते है विशेष कर उन क्षेत्रों में जहाँ व्यापारिक बैंकों की कोई भी सेवा उपलब्ध नहीं है।


(v) जमाएँ स्वीकार करनाः- आर.आर.बी. ग्रामीण बचतों को एकत्रित करते हैं और उनकी जमाओं को स्वीकार करते हैं और फिर इन जमाओं को उत्पादक क्रियाओं में लगाते हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का यह कार्य गाँव के लोगों को अपनी आय में से बचत करने की प्रेरणा देता है इस प्रकार उनकी बचत करने की आदतों को प्रोत्साहन मिलता है।


(vi) साख की लागत कम करना: जैसा कि हम जानते है कि गाँव के लोगों की आय कम होती है, इसलिए वे अकसर ग्रामीण साहूकारों से कई उद्देश्यों के लिए ऋण लेते हैं। ये साहूकार दिए गए ऋणों पर ब्याज की ऊँची दर लेते हैं और ब्याज की यह ऊँची दर ग्रामवासियों को इस प्रकार फंसा लेती है

कि उनके लिए साहूकार के चंगुल से निकलना मुश्किल हो जाता है। इस कठिनाई से मुक्ति देने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ब्याज की नीची दर लेते हैं और इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में ये साख की लागत को कम करने का प्रयास करते हैं।


(ख) गैर-कृषि क्रियाओं से संबंधित कार्य क्षेत्रीय ग्रामीण बँक गैर-कृषि क्रियाओं से संबंधित निम्नलिखित कार्य करते है:


(i) कारीगरों को ऋणः - कारीगरों को भी ऋण उपलब्ध कराते हैं, ताकि वे कलात्मक व अन्य संबंधित वस्तुओं के उत्पादन से संबंधित उत्पादक क्रिया कर सकें। कारीगर तथा अन्य ऐसे श्रमिकों निर्धन व्यक्ति, बाज़ार में अपनी निर्मित कलात्मक वस्तुएं बेचकर ही वे अपना निर्वाह करते हैं।

यदि इन व्यक्तियों को वितीय सहायता प्राप्त हो जाती है, तो ये लोग अपनी वस्तुओं के उत्पादन के लिए कच्चा माल व अन्य वांछित सामग्री खरीदने में समर्थ हो सकेंगे और इस प्रकार बेचे जाने वाले अपने सामान की गुणवत्ता में ये सुधार ला सकते हैं। अच्छी क्वालिटी वाली वस्तुओं के बिकने से इनकी आमदनी में वृद्धि होगी और इस प्रकार जीवन स्तर ऊँचा उठ सकता है।


(ii) छोटे उद्यमियों को ऋणः- गाँवों, उपनगरों तथा छोटे-छोटे कस्बों में छोटे उद्यमियों की एक बड़ी भारी संख्या है, ये लोग खुदरा व्यापार, वाणिज्य तथा अन्य कई उत्पादक क्रियाओं में लगे हुए है। इन छोटे उद्यमियों के पास भी अपनी व्यापारिक एवं उत्पादक क्रियाएँ चलाने के अपर्याप्त वित्तीय साधन हैं।

आर.आर.बी. इन्हें ऋण व अन्य वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं, ताकि ये अपनी व्यापारिक क्रियायों में वृद्धि कर सकें। वे उद्यमी जिनके पास छोटे-छोटे या घरेलू उद्योग हैं, उन्हें कच्चा माल तथा मशीनरी के लिए कलपुर्जे खरीदने तथा अपने उद्योगों के रख-रखाव के लिए ये बैंक सहायता उपलब्ध कराते हैं। ये बैंक स्वरोजगार के लिए भी ऋण देते हैं, ताकि बेरोज़गार लोग कोई स्वयं का धन्धा शुरू करके अपने परिवारों का पालन-पोषण कर सकें।


(iii) उपभोग आवश्यकताओं को पूरा करना:- आजकल आर. आर. बी. कमजोर वर्गों की उपभोग आवश्यकताओं को भी पूरा करने में लगे हैं, जिसमें विशिष्ट छोटे एवं सीमांत किसान,

अनुसूचित वर्ग एवं अनुसूचित जनजातियाँ तथा अन्य ऋणकर्ता जो शिक्षा, चिकित्सा, व्ययों, पुनः सृजन आदि जैसे विशिष्ट उद्देश्यों के छोटे साधन हैं, शामिल हैं।


(ग) निर्धनता उन्मूलन:- हमारी पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य तथा सुधारों का अंतिम उद्देश्य समानान्तर आर्थिक विकास तथा निर्धनता को कम करना है। सभी पंचवर्षीय योजनाओं में यह प्रावधान है कि आर्थिक विकास की गति को तेज किया जाए और निर्धन परिवारों को लाभान्वित किया जाए. ग्रामीण विकास के लिए कार्यक्रम अपनाएं जाएं और इनके लिए जो भी उपाय अपनाएं जाए वे स्वयंमेव कार्य करते जाएं।



(घ) पुनः वित्त की सुविधा:- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक नाबार्ड से अल्पकालीन तथा मध्यकालीन अग्रिमों के रूप में पुनः वित्त सुविधा प्राप्त करते हैं। नाबार्ड से प्राप्त पुनः वित्त का अधिकांश भाग अल्पकालीन अग्रिमों के संदर्भ में होता है।


अब क्षेत्रीय बैंक सोने के आभूषण, राष्ट्रीय बचत सर्टीफिकेट, इंदिरा विकास पत्र आदि की जमानत पर उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं तथा अन्य उद्देश्यों के लिए ग्रामीण को ऋण व अग्रिम दरें लगे हैं। वे अपने ग्राहकों की तरफ से गारण्टी भी देने लगे हैं। अपने स्पासरिंग बैंक के एजेण्ट के रूप में ये बैंक यात्री चैक भी दे सकते हैं और लॉकर सुविधा भी उपलब्ध करा सकते हैं। ये 25,000 रु. तथा एक लाख रु. तक के प्रति ग्राहक तथा प्रति ब्रांच चैक और ड्राफ्ट भी खरीद सकते हैं।


इन बैंकों को यह अनुमति भी दे दी गई है कि ये यू.टी.आई. द्वारा सूचीबद्ध लाभ देने वाली सावध संस्थाओं के फिक्स डिपाजिट राष्ट्रीयकृत बैंकों तथा अन्य सार्वजनिक उद्यमों के बॉण्डों तथा ब्लु चीप कंपनियों के गैर परिवर्तनशील डिबेंचरों और अपने स्पासरिंग बैंक के क्रेडिट, पोर्टफोलियो धनराशि निवेश कर सकते हैं। परंतु इसकी अधिकतम सीमा एक वर्ष के दौरान अपनी ताजा उधार दी गई राशि की 15 प्रतिशत होनी चाहिए। 8 जनवरी 1997 से इन बैंकों को यह अनुमति भी मिल गई कि ये निगम शेयरों तथा डिबेंचरों तथा मिचुअल फंडस की इकाइयों में निवेश कर सकते हैं, इनकी अधिकतम सीमा अपनी वेतन वृद्धि जमाओं की 5 प्रतिशत होनी चाहिए। अब ये द्वितीयक बाजार से भी निगमीय शेयर व डिबेंचर खरीद सकते हैं। ये बैंक अपनी उधार तथा जमा दरें भी निश्चित कर सकते हैं।