भारत में सहकारी बैंकिग का महत्व या लाभ या भूमिका - Importance or Benefits or Role of Co-operative Banking in India
भारत में सहकारी बैंकिग का महत्व या लाभ या भूमिका - Importance or Benefits or Role of Co-operative Banking in India
भारत के आर्थिक विकास में सहकारी बँकिग का बहुत अधिक महत्व है। डेनमार्क, इजराइल, आयरलैंड जैसे देशों ने सहकारिता के कारण अपना आर्थिक विकास किया है। योजना आयोग के अनुसार, पंचवर्षीय योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए सहकारिता का बहुत अधिक महत्व है। श्री जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, "सहकारिता भारत की आधारभूत क्रिया बननी चाहिए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सहकारिता के महत्व के विषय में लिखा है, "भारत जैसे देश मे जहाँ 82 प्रतिशत लोग ग्रामों में रहते है वहाँ कृषकों के जीवन विकास और ऋणग्रस्तता के लिए सहकारिता उन लोगों के संगठन पर आधारित है जिनके पास अन्य साधन नहीं है और जो व्यक्तिगत रूप में कोई साख नहीं रखते।
ऐसे लोगों के आर्थिक संतुलन का यह आधार है। भारत में सहकारिता काफी सक्रिय तथा जीवित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस आंदोलन की काफी समस्याएँ है परंतु वे विकास की समस्याएँ हैं, गतिहीनता की समस्याएँ नहीं है।" भारत को सहकारिता से निम्नलिखित लाभ मिलने की आशा है:
(क) ब्याज की कम दर:- सहकारी बैंक किसानों तथा कारीगरों को सस्ते ब्याज पर रुपया उधार देते है। वे महाजनों के शोषण से बच जाते है। उन्हें उत्पादक कार्यों के लिए ही रुपया उधार मिलता है, इसलिए फिजूलखर्ची भी नहीं कर पाते।
(ख) कृषि उत्पादन में वृद्धिः - सहकारी बैंक किसानों को अच्छे बीज, खाद तथा पशु खरीदनें
के लिए कर्जे देते हैं। उनकी भूमि की चकबंदी करने में सहायता देते है। सिंचाई तथा यातायात की कमी को पूरा करते हैं। इसके फलस्वरूप कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि होती है। हरित क्रांति की सफलता में सहकारिता का काफी महत्व है। पंजाब तथा हरियाणा में गेहूँ क्रांति, महाराष्ट्र में गन्ना क्रांति तथा गुजरात के कपास क्रांति की सफलता मे सहकारी बैंकिग ने काफी सहयोग प्रदान किया है।
(ग) ग्रामीण जीवन की उन्नतिः- सहकारी बैंकों के फलस्वरूप किसानों की आय में वृद्धि होती हैं, उनका जीवन स्तर ऊँचा उठता है। भारत मे सहकारी बैंकों को लाभ का 10 प्रतिशत गांवों के विकास पर खर्च करना पड़ता है।
इस प्रकार सहकारिता ग्रामीण जीवन की उन्नति का एक विशेष साधन है।
(घ) बचत को प्रोत्साहन :- सहकारी बैंक बचत को प्रोत्साहन देती है। इसके द्वारा लोगों द्वारा बचाई गई आय का ठीक उपयोग भी संभव होता है। (ङ) नैतिक लाभः - सहकारी बैंक नैतिक गुणों का विकास करते हैं। सदस्यों में आत्मसम्मान,
भाईचारे तथा आत्मविश्वास की भावना को प्रोत्साहन मिलता है। सदस्य मुकदमेबाजी, शराब
की लत, फजूलखर्ची तथा जुए आदि की बुरी आदतों से बच जाता है।
(च) सामाजिक लाभः - सहकारी बैंकिग के असीमित उतरादायित्व के कारण इसके सदस्य बैंकों के कार्यकरण पर नियंत्रण रखते हैं।
इनमें एक प्रकार की सामाजिक चेतना उत्पन्न हो जाती है। ये बैंक सामाजिक कल्याण के कामों जैसे कुएं, पार्क, पीने का पानी, चिकित्सालय आदि के निर्माण पर धन खर्च करते हैं।
(छ) शिक्षा संबंधी लाभः - सहकारी बैंकिंग के सदस्यों को बैंकिग की शिक्षा मिलती है। उन्हें
संगठन करने का ढंग आता है, उनके ज्ञान में वृद्धि होती है। (ज) योजना में सहयोगः- भारत में पंचवर्षीय योजनाओं की सफलता जनता के सहयोग पर निर्भर करती है। जनता का सहयोग बैंकिग द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसलिए पंचवर्षीय योजनाओं मे सहकारी बैकों को बहुत अधिक महत्व दिया गया है।
भारत में सहकारिता ने लगभग 94 वर्ष पूरे कर लिया है। परंतु सहकारी बैंकिंग की कई कारणों से बड़ी धीमी प्रगति रही है। अभी तक यह आंदोलन किसानों की ऋण संबंधी केवल 40 प्रतिशत आवश्यकताओं को पूरा कर पाया है। देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या पर इसका प्रभाव पड़ा है। श्री एम. विश्वेश्वरैया के अनुसार, जो कुछ भी इस दिशा में किया गया है वह भूमि कुरेदने के समान है।"
इस आंदोलन की धीमी प्रगति के मुख्य कारण निम्नलिखित है:
(क) सरकार का अधिक हस्तक्षेपः- दूसरे देशों में सहकारी बैंकिंग का जन्म सदस्यों की इच्छा के परिणामस्वरूप हुआ था
परंतु भारत में यह सरकार द्वारा चलाया जाता था और सरकार का इस पर अब भी बहुत अधिक नियंत्रण है। जनता इसे सरकारी काम समझती है। वह सहकारी बैंकों को कर्जा प्राप्त करने का साधन मानती है तथा कर्जे के रुपयों को सरकारी रुपया समझती हैं। इसलिए इन बैंकों का उचित विकास नहीं हो पाता है।
(ख) सहकारिता के सिद्धांतों के ज्ञान का अभाव :- भारत में सहकारी बैंकिग का विस्तार मुख्य रूप में गांवों में हुआ है। हमारी ग्रामीण जनता सहकारिता का सच्चा अर्थ उनके उद्देश्य व आधार को नहीं समझती है।
इस कारण वे सहकारिता को भली-भाँति नहीं समझ पाते और इसके विकास में कोई रुचि नहीं रखते हैं।
(ग) धन की कमी - भारत में सहकारी बैंकों के पास धन की कमी होती है, क्योंकि सदस्य अधिक धन नहीं बचा पाते है। केंद्रीय संस्थाओं के पास भी जनता कम ही धन जमा करती है। धन की कमी के कारण ये बैंक सदस्यों की बहुत कम आवश्यकताएँ पूरी कर पाते हैं।
(घ) केवल उत्पादक ऋण सहकारी बँक केवल उत्पादन कार्यों के लिए ऋण देते है। किसानों को अपनी दूसरी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए महाजनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
(ङ) अशिक्षा:- भारत में व्यापक अशिक्षा के कारण सहकारी बैंकिग की प्रगति काफी धीमी हो गई है। इन बैंकों को चलाने के लिए शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। कई बार गाँवों में सहकारी समितियों के लिए शिक्षित सेक्रेटरी मिलना भी कठिन हो जाता है। शिक्षा के अभाव में कई समितियाँ असफल हो गई है।
(च) स्वार्थी लोगों द्वारा विरोध:- स्वार्थी लोगों द्वारा सहकारी बैंकिग का विरोध किया जाता है।
गाँवों में महाजन तथा मण्डियों में व्यापारी इसका काफी विरोध करते हैं।
(छ) अकुशल प्रबंध: भारत में अधिकतर बैंकों के पदाधिकारी प्रशिक्षित नहीं होते। इसलिए वे बैकों का काम ठीक प्रकार से नहीं चला पाते। कर्जे देने में काफी देर की जाती है, उनकी वसूली के लिए भी विशेष प्रयत्न नहीं किया जाता।
(ज) भ्रष्टाचार तथा पक्षपातः- सहकारी बैंकों में भ्रष्टाचार तथा पक्षपात की बुराई पाई जाती है। पदाधिकारी अधिकतर अपने रिश्तेदारों, मित्रों और कृपापात्रों को कर्जा देते हैं। (झ) दलबंदी: - अधिकतर बैंकों के संगठन में दलबंदी पाई जाती है। इसके कारण बैंकों का कार्य ठीक रूप से नहीं चल पाता।
(ञ) ऋण लौटाने में देरी:- सहकारी बैंकों के अधिकतर सदस्य ठीक समय पर अपने ऋण वापिस नहीं करते हैं
जिसके फलस्वरूप कुछ सदस्यों पर बहुत अधिक कर्जा जमा हो जाता है। इससे इन ऋणों के कार्यों में बाधा पड़ती है। ऋणों के बहुत अधिक मात्रा से समय पर वापिस न होने की बुराई सहकारी बैंकिग का एक मुख्य दोष है।
(ट) दोषपूर्ण लेखा निरीक्षण:- इन बैंकों के हिसाब-किताब की जाँच ठीक प्रकार से नहीं हो पाती। अधिकतर बेईमान पदाधिकारियों द्वारा हिसाब-किताब में गड़बड़ की जाती है।
(ठ) असीमित दायित्व:- बैंकों का दायित्व असीमित होने के कारण धनी लोग इसके सदस्य नहीं बनते। इस कारण इसके पास आर्थिक साधनों का अभाव रहता है।
(ड़) बचत का अभाव :- इन बैंकों मे लोग अपनी बचत को कम जमा कराते हैं। ये बैंक केवल ऋण लेने की एजेंसियां ही समझे जाते हैं। इन्हें अपनी पूँजी के लिए बाहरी साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
(ढ) समन्वय का अभाव :- भारत में प्राथमिक केंद्रीय तथा राज्य सहकारी बैंकों में समन्वय का अभाव पाया जाता है। इस कारण इनके कार्यों में बाधा पड़ती है। (ण) क्षेत्रीय असमानताः- भारत मे सहकारी बैंकिग के संबंध में बहुत अधिक क्षेत्रीय असमानता
पाई जाती है। सहकारी ऋण का 70 प्रतिशत भाग आठ राज्यों, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, केरल द्वारा किया जाता है। बाकी राज्यों में सहकारी बैंकिग का उचित विकास नहीं हो पाया है।
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