औद्योगिक वित्त और संस्थायें - आईएफसीआई, आईसीआईसीआई, आईडीबीआई, नाबार्ड, एलआईसी - Industrial Finance & Institutions - IFCI, ICICI, IDBI, NABARD, LIC

औद्योगिक वित्त और संस्थायें - आईएफसीआई, आईसीआईसीआई, आईडीबीआई, नाबार्ड, एलआईसी - Industrial Finance & Institutions - IFCI, ICICI, IDBI, NABARD, LIC


आईएफसीआई (भारतीय औद्योगिक वित्त निगम)


यह प्रथम अखिल भारतीय सार्वजनिक विशिष्ट वित्तीय संस्था है। इस निगम की स्थापना जुलाई 1984 में की गई थी। इस निगम का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक विकास के लिए विभिन्न औद्योगिक इकाइयों को मध्यम तथा लंबी अवधि के ऋण उपलब्ध करवाना है। यह अपनी वित्तीय नीतियों को देश औद्योगिक नीतियों एवं राष्ट्रीय नीतियों को ध्यानमें रखकर तैयार करती है। सरकार द्वारा निर्धारित किए गए प्राथमिकता क्षेत्र को इसके द्वारा अधिक महत्त्व दिया जाता है। इसके द्वारा योग्य इकाइयों को सीधे वित्त की सुविधा भी दी जाती है। इस उद्देश्य के लिए योग्य इकाइयों को भी स्पष्ट रूप से समझाया गया है।


योग्यता आधार


इस संगठन द्वारा सीधे वित्त के लिए निम्न को योग्य समझा जाता है।


(a) भारत में समामेलित सार्वजनिक, निजी या संयुक्त क्षेत्र की कंपनियाँ,


(b) भारत में पंजीकृत सहकारी समितियाँ जो निम्न कार्यों में लगी हैं या लगने की सोच रही हैं, जैसे (i) वस्तुओं (विशेष) के उत्पादन, रख-रखाव प्रक्रियाओं में, (ii) शिपिंग, (iii) माइनिंग, (iv) होटल उद्योग, (v) विद्युत के बनाने या वितरण संबंधी कार्यों में, (vi) वस्तुओं के यातायात संबंधी कार्यों में, (vii) औद्योगिक बस्तियों के स्थापन एवं विकास में, (viii) मछली उद्योग, (ix) मशीनी, उपकरणों, या गाडियों के रख-रखाव,

सेवाएँ, परीक्षण, मरम्मत कार्यों में, (x) स्वास्थ्य सेवा या संबंधित क्षेत्र, (xi) तकनीकी, दूर संचार या इलेक्ट्रॉनिक सेवा कार्य (xii) लीजिंग कार्य, (xiii) उपरोक्त वर्णित किसी भी क्षेत्र में शोध कार्य में।


भारतीय औद्योगिक वित्त निगम के कार्य


इसके कार्यों के दो मुख्य भागों बांटा जा सकता है:


A. वित्तीय सहायता : यह संस्थान निम्नलिखित में से एक या एक से अधिक रूपों में वित्तीय सहायता प्रदान करता है: (iii) औद्योगिक इकाइयों द्वारा पूँजी बाजार से लिए गए ऋणों की गांरटी द्वारा


(i) औद्योगिक इकाइयों को ऋण एवं अग्रिम राशि दकेर,


(ii) औद्योगिक इकाइयों द्वारा जारी ऋणपत्र करके, 


(iv) औद्योगिक इकाइयों द्वारा जारी किए गए अंश, ऋणपत्र, स्टॉक, बांड आदि के अभियोजन


द्वारा


(v) कंपनियों के समता अंश, पूर्वाधिकार अंश व ऋणपत्रों के द्वारा (vi) नई औद्योगिक परियोजना की स्थापना के लिए सहायता तथा विद्यमान इकाइयों को उनके


विस्तार, विविधीकरण, आधुनिकीकरण एवं पुनर्निर्माण के लिए सहायता


(vii) रूपयों तथा विदेशी मुद्रा के रूप में सहायता


(viii) मध्यम एवं बड़ी औद्योगिक इकाइयों के विदेशी ऋणों व के संबंध में द्वारा ।


(B) प्रोत्साहर गतिविधियाँ प्रोत्साहन क्रियाओं के अंतर्गत यह निगम विभिन्न कार्य करता है,


जैसे


(i) संस्थागत संसाधनों एवं प्रोत्साहन कार्यों में कमी की पूर्ति करना

(ii) नयी परियोजना के लिए परियोजना रिपोर्ट तैयार करने, परियोजना निर्माण करने तथा


उसे लागू करने के लिए सलाह देना तथा ऐसे कार्यों में तेजी लाना।


(iii) सुक्षम एवं लघु उद्योगों में मानवीय संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि लाना


(iv) उत्पादन के संसाधनों में मानवीय संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि लाना (v) अर्थव्यवस्था में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना,


(vi) उद्यमिता को बढ़ावा देनाद्य


आईसीआईसीआई (भारतीय औद्योगिक ऋण तथा निवेश निगम)


इसे सन् 1955 औद्योगिक निवेश एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। इस बैंक की स्थापना का विचार भारत सरकार, विश्व बैंक तथा कुछ अमेरिकन निवेशकों के बीच हुए विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था। इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए एक विशेष समिति गठित की गई थी। इस समिति के प्रयासों के कारण सन् 1955 में ICICI की स्थापना एक पब्लिक लितिटेड कंपनी के रूप में की गई। तत्पश्चात इसे बैंक में परिवर्तन कर दिया गया।


भारतीय औद्योगिक ऋण एवं निवेश निगम के उद्देश्य


इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :


(i) निजी उद्यमों के सृजन, विस्तार एवं आधुनिकीकरण में सहायता देना,


(ii) इन उद्यमों में आंतरिक एवं बाह्य स्रोतो की मदद से निजी पूँजी लगाने प्रोत्साहित करना,


औद्योगिक निवेश तथा बाजार के विकास के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना ता प्रोत्साहित करना।


भारतीय औद्योगिक ऋण एवं निवेश निगम के कार्य


उपरोक्त वर्णित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निगम निम्नलिखित कार्य करता है:



समता भागिता के आधार पर कोष प्रदान करना,


15 वर्ष के पश्चात वापिस किए जाने वाले ऋण प्रदान करना,


नए अंशों व प्रतिभूतियों को प्रायोजित करना व उनका अभिगोपन करना,


(iv) निजी स्रोतों से लिए निवेश की गारंटी देना,


(v) उद्योगों को प्रबंधकीय, तकनीकी एवं प्रशासनिक सहायता देना,


(vi) देश के अविकसित क्षेत्रों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहन गतिविधियाँ आयोजित करना,


(vii) एक मर्चेंट बनकर के रूप में कार्य करना,


(viii) लीज फाइनेंसिंग की सुविधा प्रदान करना, महत्वपूर्ण पूंजीगत संयंत्रों के लिए विदेशी मुद्रा के रूप में ऋण प्रदान करना।