अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मोनेटरी फंड आई.एम.एफ.) - International Monetary Fund (International Monetary Fund IMF)

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मोनेटरी फंड आई.एम.एफ.) - International Monetary Fund (International Monetary Fund IMF)


अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का जन्म जुलाई 1944 के ब्रेटनबुड्स सम्मेलन में हुआ। तब 94 देश इसके सदस्य थे। आज क्यूबा को छोड़ अधिकांश देश इसके सदस्य हैं। आई एम एफ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था की केंद्रीय संस्थान है। भुगतान संतुलन ठीक करने में सदस्य देशों को सहायता देना इसका प्रमुख उद्देश्य है। भारत संतुलन में सुधार समष्टिगत (मैक्रो) आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करके लाया जाता है। मुद्रा कोष, मुद्रा, सीमा शुल्क और विनिमय दर की नीतिया के क्षेत्रों में अध्ययन कराता है और परिवर्तनों की सिफारिश करता है। गत वर्षों में कोष ने तीसरी दुनिया की ऋण समस्या को हल करने के अधिक दीर्घकालिन प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई है।


उद्देश्य : कोष के अनुबंध की धाराओं के अनुसार मुद्रा कोष के उद्देश्य इस प्रकार हैं:


अ) एक ऐसी स्थायी संस्था द्वार अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना जो अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक समस्याओं पर परामर्श और सहयोग का एक तंत्र प्रदान करे।


ब) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रसार और संतुलित संवृद्धि को बढ़ावा देना तथा आर्थिक नीति के प्रमुख उद्देश्यों के रूप में सभ सदस्य देशों में रोजगार और वास्तविक आय के ऊँचे स्तर पाने और बनाए रखने में उत्पादक शक्तियों का विकास करने में योगदान देना।


स) सदस्यों के बीच सुव्यवस्थित विनिमय के बंदोबस्त बनाए रखनेतथा विनिमय में प्रतियोगिता के कारण ह्रास से बचने के उद्देश्य से विनिमय संबंधी स्थायित्व को बढ़ावा देना।


द) सदस्यों के बीच चालू लेन-देन के लिए भुगतान की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना में तथा विश्व व्यापार की संवृद्धि में बाधक विदेशी मुद्रा संबंधी बाधाओं को समाप्त करना।


य) सदस्यों को कोष के सामान्य संसाधन अस्थयी रूप से उपलब्ध कराके उनके बीच आपसी विश्वास पैदा करना।

इससे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय समृद्धि को ठेस पहुँचाने वाले उपायों का सहारा लिए बिना अपने भुगतान संतुलन संबंधी गड़बड़ियों को ठीक करने का अवसर मिलता है।


२) उपरोक्त उद्देश्यों के अनुरूप सदस्य देशों के भुगतान संतुलन में प्रतिकूलन की अवधि को कम करना तथा इस असंतुलन के परिणाम को कम करना ।


इस तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था के समुचित संचालन पर निगरानी रखने के अलावा कोष सदस्य देशों को भुगतान संतुलन संबंधी अस्थायी संकट का सामना करने में सहायता भी देता है।


सांगठनिक ढाँचा : आई एम एफ एक स्वायत्त संगठन है जिसके 181 सदस्य देश हैं। उसका सर्वोच्च नीति निर्माता प्रशासक मंडल है जिसमें हर सदस्य देश का एक प्रतिनिधि गवर्नर होता है तथा में एक वैकल्पिक गवर्नर भी होता है। प्रशासन का दायित्व कार्यकारी निर्देशकों के बोर्ड के ऊपर है।


विनिमय दरें : जैसा कि कहा गया, आई एम एफ का एक उद्देश्य विनिमय दरों में स्थायित्व को प्रोत्साहन देना है। इसके लिए प्रत्येक सदस्य देश से आरंभ में आशा की गई कि वह सोने या अमरिकी डालर के सापेक्ष अपनी मुद्रा का सममूल्य (पार वैल्यू) गोषित करेगा और उसक घोषित सममूल्य को एक प्रतिशत के अंदर उतार-चढ़ाव तक सीमि रखने का आश्वासन देगा।

सममूल्य में परिवर्तन सिर्फ कोष की पूर्वानुमति से संभव था। ऐसे परिवर्तन की अनुमति तथी दी जाती थी जब सदस्य देश भुगतान के बुनियादी असंतुलन से ग्रस्त हो । इस व्यवस्था को समायोजिनीय कील व्यवस्था, (एडजस्टिबुल पेग सिस्टम) कहा गया क्योंकि इसमें विनिमय दरों के समायोजन का प्रावधान था।


उपरोक्त व्यवस्था पिछली सदी के सत्तरवें दशक तक जारी रही। अमरीकी डालर के अवमूल्यनों की एक श्रंखला के बाद ब्रेटन वुड्स सिस्टम नामक व्यवस्था मार्च, 1973 में धराशायी हो गई और 14 प्रमुख राष्ट्रों ने अपनी मुद्राओं को परिवर्तनीय बनाने का निश्चय किया।

इस समय कोष के लगभग एक तिहाई सदस्य देशों की मुद्रा परिवर्तनीय है। कुछ ने अपनी मुद्रा का अमरीकी डालर, कुछ ने फ्रांसीसी फ्रांक और कुछ ने एस डी आर के साथ सममूल्य स्थापित कर रखा है।


संसाधन : अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूँजीका मुख्य स्रोत उसके सदस्य देशों द्वारा दिया गया योगदान है। हर सदस्य देश के चन्दा (योगदान) को कोटा कहते हैं जो उस देश की राष्ट्रीय आय, विदेशी मुद्रा भंडार, निर्यात की परिवर्तनीयता और राष्ट्रीय आय से उसके निर्यातों के अनुपात आदि अनेक लतों पर आधारित होता है। आरंभ में सदस्य देशों से अपेक्षा की गई थी कि वे अपने कोटे का 25 प्रतिशत सोने या अमरीकी डलरों के रूप में और बाकी अपनी खुद की मुद्रा में दे।

लेकिन इस समय-समय पर इन कोटों की समीक्षा की जाती है और इनके बीच का अंतराल 5 वर्षों से अधिक का नहीं होता। 1994 में कोष की पूँजी 144.6 अरब एस डी आर थी।


सदस्य देशों से कोटा के रूप में अनुदान पाने के अलावा मुद्रा कोष को 'सामान्य ऋण व्यवस्था' (जनरल अरेंजमेंट टू बारों) के अंतर्गत भी ऋण लेने का अधिकार है। इस व्यवस्था में दस औद्योगिक देश अपनी-अपनी मुद्राओं में एक सहमत सीमा तक कोष को ऋण देने को तैयार होते हैं। मुद्रा कोष इस व्यवस्था में मूलत: : तभी ऋण ले सकता था जब भागीदार देशों को धन की आवश्यकता होती थी। पर आज दूसरे देशों के आहरण की व्यवस्था के लिए भी कोष इन निधियों का प्रयोग कर सकता है, बशर्तें ऋण लेने वाले देश, कोष द्वारा अनुमोदित आर्थिक समायोजिन कार्यक्रम करने पर सहमत हों।