बाजार संरचना और डब्लूसीएस की खरीद-बिक्री - Market structure and trading of WCS

बाजार संरचना और डब्लूसीएस की खरीद-बिक्री - Market structure and trading of WCS


ब्रोकन पीरियड इंट्रेस्ट या बढ़ते ब्याज की अवधारणा से आशय बांड पर एक निश्चित अवधि पर होल्डर (बांड धारक) जो कि उस समय बांड का मालिकाना हक भी रखता है, को मिलने वाले ब्याज से है। इस प्रकार अगर कोई निवेशक ऐसा बांड बेचता है जिस पर हर 6 महिने पर अदायगी होती है, लेकिन ब्याज अदायगी की तिथि के तीन महीने बाद इस स्थित में विक्रेता को उन तीन महीनों का ब्याज नहीं मिलेगा। वह ब्याज खरीदार को मिलेगा यद्यपि उससे तीन पहले ही बांड खरीदा था, वजह यह है कि ब्याज की अदायगी के वक्त वह मालिकाना हक रखता है।


इसलिए बांड के वैसे सौदों के दौरान जो ब्याज अदायगी की दो तिथियों के बीच होता है, क्रेता-विक्रेता को उस अवधि का ब्याज अदा करेगा।

इसकी गणना ब्याज अदायगी की तिथि से सौदे की तिथि के अनुसार होता है। इस प्रकार जब ब्याज की गणना होगी तो उसमें ब्याज अदायगी की तिथि तो शामिल होगी, लेकिन सौदे की तिथि नहीं शामिल होगी।


सरकारी प्रतिभूतियों में लेन-देन के मामले में बढ़ते ब्याज की गणना के लिए प्रतिदिन गणना का तरीका 30/360 है। उदाहरणतः प्रत्येक महीना में 30 दिन लिया जाता है, इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि महीने मे वास्तविक कितने दिन होते है। इसलिए महीना जो भी हो चाहे फरवरी मार्च, जनवरी, मई जुलाई, अगस्त, अक्टूबर और दिसम्बर, हर महीना 30 दिन का ही लिया जाता है।


सरकारी प्रतिभूतियों का लेन देन स्पष्ट कीमत पर किया जाता है, लेकिन अस्पष्ट कीमत पर निपटारा होता है।

(लेन- देन कीमत + बढ़ते ब्याज) ऐसा तब होता है, जब कुपन पेमेंट पर कीमत में कोई छूट नहीं दी जाती है। जैसा कि दूसरे गैर सरकारी ऋण प्रपत्रों के मामले में होता है।


उत्तर- लेन-देन में प्रतिभूतियों का संचयी अंकित मूल्य लेन देन का अंकित मूल्य है और यह समान्यतः प्रत्येक लेन-देन का पहचाने जाने योग्य विशेषता है।


मान लें की 5,000 सरकारी प्रतिभूतिया जिनका कि पर प्रतिभूति कीमत 100 रुपये है, और कुल 5,00,000 रुपये है, का लेन देन होता है। कीमत


सरकारी प्रतिभूतियों के लेन देन का संचयी कीमत कारोबारी मूल्य है। (उदाहरणत: प्रतिभूतियों में कीमत से गुणा करना।



मान लें उपर दिये गये 5000 सरकारी प्रतिभूतियों के लेन-देन पर प्रतिभूति 102 रुपये किया गया है, ताकि कारोबारी 5.10,000 रुपये हो।


लेन-देन कीमत और बढ़ते व्याज का योग निपटारा कीमत होगा।


बाण्ड इकाइयों के बढ़ते ब्याज का आकलन इस तरह होता है।


= बाण्ड का कूपन X सरकारी प्रतिभूतियों का अंकित मूल्य (100) X (ब्याज भुगतान की तारीख से निपटारे की तारीख से निपटारे की तारीख तक के दिनों की संख्या) / 36


लेन देन की ब्याज भुगतान की तारीख और निपटारे की तारीख में बीच के दिनों की संख्या के आँकलन में सिर्फ


उन दिनों में दो दिनों को समाहित किया जाता है। सरकारी प्रतिभूतियों निम्नलिखित रूपों में रखी जा सकती है:


भौतिक प्रतिभूतियों ( जो कि ज्यादातर चलन से बाहर हो चुका है और ज्यादा उपयोग में नहीं आता है।) भारतीय रिजर्व बैंक में जन ऋण कार्यालय के साथ एस जी एल (सबसिडियरी जेनरल लेजर) खाता।

एस जी एल खाता जबकि कुछ अस्ती जैसे बैंक और संस्था के लिए प्रतिबन्धित है। वैसे बैंक और पी डी एस की अंगीकृत एस जी एल खाता जो निवेशकों की तरफ से सरकारी प्रतिभूतियों को अपने


भारतीय रिजर्व बैंक की एम जी एल-II खाता में रखते है, वो सिर्फ ग्राहकों के लिए होता है।


वैसे ही डीमैट खाता का उपयोग इक्यूटिस के लिए जमाकर्ता के द्वारा होता है। एन एस डी एल और सी डी एस एल उनको अपने भारतीय रिजर्व बैंक की एस जी एल-II खाता में रखते है, जो सिर्फ ग्राहकों के लिए होता है। लेन-देन के दो निम्नलिखित प्रकार है, जो भारतीय बाज़ार में लागू होते हैं:


बैंक और वैसा दूसरा थोक बाज़ार का भागीदार जिसका खाता पूरे थोक बाज़ार के आकार के लगभग 25% हो के


बीच प्रत्यक्ष लेन-देन : यहाँ बैंक और संस्था खुद के बीच प्रत्यक्षत: लेन-देन करती है चाहे टेलीफोन के द्वारा या भारतीय रिजर्व बैंक के एन डी एस सिस्टम के द्वारा।


बाजार में होने वाले लगभग 70-75% सौदे ब्रोकरों के द्वारा करवाए जाते है। वे ब्रोकर ही बैंक, प्राथमिक व्यापारी और संस्थाओं के साथ सौदा का लेन-देन कर सकते है, जिन्हें भारतीय रिजर्व बैंक के मान्य स्टॉक एक्सचेंज की सदस्यता प्राप्त हो।


बी एस ई और दूसरे एक्सचेंज सरकारी प्रतिभूतियों के लिए आर्डर आ स्क्रीन आधारित सौदा सुविधा उपलब्ध कराते हैं। ज्यादातर सौदों के लिए आज के दिन बी एस ई के सिस्टम पर सौदे बाजी ब्रोकरों के कार्यालयों और उनके इलक्ट्रोनिक प्रणाली से एक्सचेंज को मिलने वाली सूचनाओं द्वारा नियंत्रित है। ये सूचनाएं - निगोशियेटेड डील्स और क्रॉस डील्स से संबंधित होती हैं।