नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और निफ्टी - National Stock Exchange and Nifty

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और निफ्टी - National Stock Exchange and Nifty


नब्बे के आर्थिक संकट के बाद देश के शेयर बाजार में सुधार के लिए मनोहर फेरवानी समिति का गठन किया गया था। सितंबर 1991 में तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में समिति ने एनएसई के गठन की सिफारिश की। समिति ने शेयर बाजार को ज्यादा पारदर्शी, आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए भी सुझाव दिए। इसके बाद सरकार ने 1992 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाने का निर्णय लिया। यह देश का पहला इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज बना, जहां बिना किसी ब्रोकर की सहायता के शेयरों की खरीद-बिक्री करना संभव हो पाया। इसे पूर्णत: स्वचालित और स्क्रीन बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक कारोबार के लिए ही बनाया गया था।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज मैं भी यह सुविधा बाद में आई। आज एनएसई बीएसई से भी बड़ा स्टॉक एक्सचेंज बन चुका है। लेन-देन की संख्या के लिहाज से एनएसई में अब बीएसई की तुलना में करीब पांच गुना ज्यादा कारोबार हो रहा है। एनएसई की स्थापना के बाद देश के दूसरे स्टॉक एक्सचेंज असरहीन होते चले गए। कई तो एनएसई का ही हिस्सा बन गए। सरकार ने एनएसई को अप्रैल 1993 में प्रतिभूति अनुबंध अधिनियम, 1956 के तहत मान्यता दी थी। वैसे एनएसई के लगभग आधे शेयर एलआईसी, एसबीआई, आईएफसीआई, आईडीबीआई जैसी सरकारी कंपनियों के पास हैं। लेकिन बीएसई की तरह यह भी एक निजी कंपनी है। एनएसई के सभी ।। सूचकांकों में सबसे महत्वपूर्ण निफ्टी 50 या निफ्टी है। यह अंग्रेजी के दो शब्दों नेशनल और फिफ्टी से मिलकर बना है। इसका अस्तित्व 22 अप्रैल 1996 से है। जैसा की नाम से भी जाहिर है, निफ्टी एनएसई की 50 चुनिंदा कंपनियों (अब 51 ) का प्रति निधित्व करता है। निफ्टी में वित्तीय सेवा, एनर्जी, आईटी, ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता उत्पाद, फार्मा और निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों की हिस्सेदारी है।