संचालक चक्र अवधारणा - Operating Cycle Approach

संचालक चक्र अवधारणा - Operating Cycle Approach


“व्यवसाय के शुद्ध संचालन चक्र की अवधि के लिए संचालन के विभिन्न स्वरूपों के लिए लगने वाली पूँजी की मात्रा को कार्यशील पूँजी कहा जाता हैं। कार्यशील पूँजी की मात्रा व्यवसाय के संचालन चक्र की अवधि पर निर्भर करती हैं।"


किसी व्यवसाय में कच्चा माल खरीदना, उससे निर्मित माल तैयार करना, फिर उसे बेचने के तत्पश्चात् रोकड़ वसूल करना, यह संचालन कार्य चलता रहता हैं। इन कार्यों को पूरा करने में समय लगता हैं। इन सतत क्रियाओं में लगने वाले समय के कुल योग को संचालन अवधि (Operating cycle) कहा जाता हैं। इस संचालन अवधि के लिए पूँजी अवरूद्ध होती हैं।


इस कार्य के लिए जो पूँजी की आवश्यकता होगी उसे कार्यशील पूँजी कहा जाता हैं अर्थात् रोकड़ का माल में, माल का निर्मित माल में, निर्मित माल विक्रय द्वारा देनदार या प्राप्य विपत्र में फिर देनदार एवं प्राप्य विपत्र को रोकड़ प्राप्त करने में जितनी अवधि लगी हैं उतनी अवधि के लिए जिस पूँजी की आवश्यकता होगी उसे कार्यशील पूँजी कहा जाता हैं। लेनदारों से प्राप्त भुगतान अवधि को उपरोक्त कुल अवधि से घटा देने पर शुद्ध संचालन अवधि (Net Operating Cycle) ज्ञात हो जाती हैं।


यह अवधारणा पारम्परिक अवधारणा की तुलना में अधिक उपयुक्त हैं। व्यवसाय की विभिन्न गतिविधियों तथा उत्पादन प्रबंधकीय उपरिव्ययों, विक्रय वितरण उपरिव्ययों में लगने वाले आवश्यक तरल कोष की गणना पूर्व में ही की जा सकती हैं। इस हेतु आवश्यक प्रबंध उचित तरीके से हो सकते हैं। जिसके कारण स्कंध एवं सामाग्री पर नियंत्रण भी प्रभावी ढंग से हो पाता हैं। संचालनचक्र, कार्यशील पूँजी के अनुमान लगाने का विशिष्ट साधन हैं, जिसके कारण नकद पूँजी प्रवाह की गणना भी संभव हो पाती हैं।

कार्यशील पूंजी के उद्देश्य तथा तत्व