क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की समस्याएँ - Problems of Regional Rural Banks
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की समस्याएँ - Problems of Regional Rural Banks
छोटे किसानों, कारीगरों और कृषि श्रमिकों की बचतें एकत्रित करने में आर.आर.बी ने अहम भूमिका निभाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन बैंकों के स्थापित हो जाने से लोगों में बैंक संबंधी आदतें जागृत हो गई हैं। परंतु इस प्रगति के बावजूद भी आर. आर. बी. निम्नलिखित
समस्याओं का सामना कर रहें है:
(क) संगठन से संबंधित समस्याएँ:- चूँकि आर.आर.बी को कई एजेंसियों ने स्पॉन्सर किया है, इसलिए इनकी कार्यप्रणाली में एकरूपता का अभाव पाया जाता है। इससे राज्य सरकारों में पूरा समर्थन नहीं मिल पाया है और न ही स्पॉन्सर बैंकों से उचित मानीटरिंग हो पाया है। दूसरे, क्षेत्र प्रतिबंध भी इनके मार्ग में एक बाधा बन गया है।
तीसरे आर. आर. बी. की सभी संस्थाओं के भीतर उचित प्रणाली एवं कार्य विधि का अभाव भी पाया जाता है। चौथे आर. आर.बी के स्टॉफ की भर्ती एवं प्रशिक्षिण की ओर भी उचित ध्यान नहीं दिया गया है। पाँचवे, इन बैंकों का विकास आयोजित रहा है और इनकी कई शाखाएँ राज्य सरकारों के दबाव के अंदर खोली गई है। इन सभी कारणों के फलस्वरूप इनके आगे नियंत्रण एवं प्रबंध संबंधी कई समस्याएँ अभी बनी हुई हैं।
(ख) वसूली से संबंधित समस्याएँ:- इन बैंकों की ऋण वसूली स्थिति सही नहीं है। इनकी वसूली अभी भी 51 प्रतिशत तथा 61 प्रतिशत के बीच है। अतएव इनके खड़े भुगतान 39 प्रतिशत तथा 49 प्रतिशत के बीच है। इनके ढाँचे विलम्बित या खड़े भुगतान के लिए जो कारण जिम्मेदार है,
वे आंतरिक तथा बाहरी दोनों हैं। आंतरिक कारणः दोषपूर्ण ऋण नीतियां, कमजोर देखभाल, वसूली के प्रति रूचि का अभाव, विकास के साथ ऋण देने का कोई भी तालमेल होना तथा ऋणों के अंतिम प्रयोग में अनिश्चिता का होना। बाहरी कारणों में राजनैतिक हस्तक्षेप, ऋणों की वसूली में राज्य सरकारों को कम कानूनी तथा प्रशासनिक समर्थन आदि।
(ग) बढ़ती हानियों से संबंधित समस्याएं:- जैसा कि ऊपर बता दिया गया है कि 196 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में से 152 बैंक निरन्तर हानियाँ दिखला रहे हैं। इन बढ़ती हानियों के मुख्य कारण निम्नलिखित है: (i) ये बैंक अधिकतर ऋण कमजोर वर्गों को देते है, ऋणों पर इस वर्ग से प्राप्त ब्याज बैंकिंग प्रणाली में सबसे कम है।
(ii) बड़ी संख्या में खातों को बनाए रखने में बहुत खर्च आता है जो हानियों को और भी बढ़ा देता है। (iii) वर्ष प्रतिवर्ष इन बैंकों की शाखाओं के खोलने में ऊपरी लागतों में बहुत वृद्धि होती है जबकि इसके अनुपात में आय बहुत कम प्राप्त होती है। (iv) प्रशिक्षित एवं सक्षम स्टॉफ की उपलब्धता का न होना भी इनकी एक बड़ी समस्या है। (v) इन बैंकों की कई शाखाओं की आर्थिक स्थिति आशाजनक है।
(घ) प्रबंध से संबंधित समस्याएँ:- चूँकि सभी आर. आर. बी. संस्थाएँ जिला स्तर पर स्थापित की गई हैं, स्पॉन्सर बैंकों ने इनकी देखभाल के लिए मध्यवर्गीय प्रबंध स्टॉफ की नियुक्ति की है।
ये प्रतिनियुक्त स्टॉफ सदस्य इस अवस्था में नहीं है कि नई परिस्थिति में वे कोई स्वतंत्र निर्णय ले सकें। इसके अतिरिक्त आर.आर.बी. के बोर्ड ऑफ डायेरक्टरों की मीटिंग भी नियमित रूप से नहीं होती और अशासकीय डायरेक्टरों की एक बड़ी संख्या इन बैंकों की कार्य प्रणाली में कोई रूचि नहीं दिखाती इसमे साथ-साथ कई ऐसी समस्याएँ भी है जो इन बैंकों के बहु-एजेंसी नियंत्रण के कारण उत्पन्न होती है और इनकी कार्यप्रणाली भी सभी राज्यों / जिलों में एक समान नहीं है।
(ङ) स्पॉन्सरिंग बैंकों की शाखाएँ:- आर. आर. बी. को स्पॉन्सर करने वाले कई बैंकों की शाखाएं उस क्षेत्र में है जहाँ कि आर. आर.बी. अपना प्रचालन कर रहे हैं इससे कई विषमताएं उदय हुई है और इनके नियंत्रण एवं प्रशासन पर होने वाले खर्च से बचा नहीं जा सका है।
(च) दोषपूर्ण व्याप्ति क्षेत्रः - इन क्षेत्रों का व्याप्ति क्षेत्र एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न है। कई जिलों में नकद आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन बैंकों तालुका / या ब्लॉक मुख्यालय पर शाखाओं में तालमेल या जुड़ाव नहीं है। कई स्थानों पर इनकी शाखाएं खोलने के लिए सही जगह नही मिल पाई है।
(छ) दोषपूर्ण भर्ती नीतिः - ऐसी अपेक्षा की गई है कि ये बैंक अपने स्टॉफ की स्थानीय भर्ती कर लेगें। परंतु इसमें लगे स्टॉफ की भर्ती बैंकिंग सर्विस रिक्यूटमेंट बोर्ड द्वारा की जा रही है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि ग्रामीण बैंकों के प्रचालन क्षेत्र से बाहर के लोग भी इन बैंकों में रोजगार के लिए योग्य है। इससे निश्चित रूप से इन बैंकों की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई।
(ज) मानदण्डों की कठोरताः- इन बैंकों में लाभग्राहियों के चुनाव के लिए निश्चित किए गए मानदण्ड बहुत कठोर है और संपूर्ण भारत की आय स्तर पर आधारित है। इतना ही नहीं लोगों के व्यवसाय एवं आर्थिक स्तर भी एक ही राज्य में एक ही जिले में व्यापक रूप से भिन्न हैं। जरा सोचिए, पंजाब में उपलब्ध निर्धनता रेखा, उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्य पर कैसे लागू की जा सकती है? इसका परिणाम यह हुआ कि कई उपयुक्त या योग्य व्यक्तियों को छोड़ दिया गया है और उनकी साख आवश्यकताएं पूरी नहीं की गई है। (झ) साधनों की कमी:- गाँव के सभी ज़रूरतमन्द लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
इन बैंकों के पास पर्याप्त साधनों का अभाव है। इनका पूँजी आधार भी कमजोर है। राज्य सरकारों ने भी अपने शेयरों का पूरा भाग इन बैंकों को नहीं दिया है। इसके परिणामस्वरूप इन बैंकों को निरंतर हानि सहनी पड़ी है
और इनका पूँजी आधार भी क्षीण हो गया है। (ञ) जमाएं एकत्रित करने में कठिनाई:- चूँकि ये वर्ग समाज के कमजोर वर्ग को साख सुविधाएँ उपलब्ध कराते है, इन्हें मध्यम वर्ग तथा ग्रामीण उच्च वर्ग से जमाएँ अपनी ओर आकर्षित करना कठिन हो रहा है। ग्रामीण उच्च वर्ग व्यापारिक बैंकों में अपनी बचते जमा करना अधिक पसंद करते हैं और इन्हें व्यापारिक बैंकों की ऋण सुविधाएँ भी प्राप्त होती हो जाती हैं।
(ट) दोषपूर्ण साख नीति: इन बैंकों ने केवल फसल ऋणों पर तथा राज्य सरकारों द्वारा चलाई गई योजनाओं पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया है।
कुटीर तथा ग्रामीण उद्योगों को सही महत्व नहीं दिया गया है। इसी भाँति ग्रामीण कारीगर / हस्तकार और स्वरोजगार व्यक्तियों को भी इन बैंकों से कोई विशेष सहायता नहीं हुई है।
(ठ) ऋण लेन-देन की ऊँची लागतें:- चूँकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में वेतन का पैमाना व्यापारिक बैंकों की भांति ही है, इसलिए इनकी ऋण देन लेन की लागत बहुत ऊँची है, और कई बार यह लागत व्यापारिक बैंक की ग्रामीण शाखाओं से भी अधिक हो जाती है।
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