सहकारी बैंकों के सुधार के लिए कपूर समिति की सिफारिशें - Recommendations of Kapoor Committee for Reform of Co-operative Banks

सहकारी बैंकों के सुधार के लिए कपूर समिति की सिफारिशें - Recommendations of Kapoor Committee for Reform of Co-operative Banks


सहकारी बँकिग प्रणाली के सुधार के संबंध में सुझाव देने के लिए अप्रैल 1999 में श्री जगदीश कपूर की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई थी। इस समिति ने 24 जुलाई, 2000 को सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस समिति की मुख्य सिफारिशें अग्रलिखित है:


(क) संसाधनगत आधारः - इस कमेटी ने यह सुझाव दिया कि सहकारी बैंकिंग संस्थाओं के सीमित साधनों को देखते हुए उनके संसाधनगत आधार खासतौर से पूँजी को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।


(ख) विनियमन और नियंत्रणः - इस कमेटी के अनुसार सहकारी संस्थाओं पर सरकार के नियंत्रण को कम किया जाना चाहिए।

उन्हें अधिकतम स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए। इस कमेटी के अनुसार सहकारी संस्थाओं को सदस्यों द्वारा संचालित बनाया जाना चाहिए। राज्य सरकारों को आदर्श सहकारी सोसायटी कानून को लागू करना चाहिए। इस कमेटी ने यह भी सिफारिश की थी कि सहकारी संस्थाओं पर नाबार्ड तथा सरकार दोनों का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। इस पर केवल रिजर्व बैंक का ही नियंत्रण होना चाहिए।


(ग) सहकारी बैंकों मे व्यवसायीकरणः- सहकारी बैंकों को व्यावसायिक संगठनों की तरह मजबूत प्रबंधकीय प्रणाली अपनानी चाहिए। बैंकों के बोडों में व्यावसायिक तथा शिक्षित सदस्य होने चाहिए।

बैंकों के पास अपने कर्मचारियों से उचित काम लेने की पूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए। इनके पास स्टॉफ की भर्ती के लिए उचित नीतियाँ होनी चाहिए।


(घ) कारोबार का विविधीकरणः- सहकारी बैंकों को सभी स्तरों पर विविध प्रकार के व्यवसाय करने चाहिए। सहकारी संस्थाओं को अपने कार्यकरण में आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करना चाहिए। सहकारी बैंकों को इस बात की भी इजाजत होनी चाहिए कि वे अपनी जमा राशियों का 10 प्रतिशत भाग सहकारी दायरे के बाहर व्यापारिक तथा तकनीकी योजनाओं के लिए उधार दे सकें।


(ड़) लागत, मार्जिन तथा निधि प्रबंध :- सहकारी बैंकों को अपने कर्जो पर ऐसी ब्याज दरें लागू करनी होगी जो उनकी लागतों को पूरा करके लाभ प्रदान कर सकें।

इन बैंकों को अपनी जमाराशियों पर बाजार में प्रचलित व्याज दर देनी चाहिए। प्राथमिक कृषि ऋण समितियों को ऐसे काम करने के लिए नही मजबूर किया जाना चाहिए, जिनसे उन्हें लाभ की प्राप्ति न हो। (च) सहकारी बैंकों के स्तरों को कम करना:- इस कमेटी के अनुसार बड़े राज्यों में सहकारी संगठनों की तीन स्तर वाली संरचना अर्थात् (1) प्राथमिक (2) केंद्रीय तथा (3) राज्य स्तरों को बनाए रखना आवश्यक हैं परंतु जिन क्षेत्रों में केंद्रीय सहकारी बैंक कुशलतापूर्वक कार्य नहीं कर रहे हैं उन्हें आपस में मिला देना चाहिए। कमेटी ने भी इस बात की भी सिफारिश की हैं कि अल्पकालीन ऋण देने वाली और दीर्घकालीन ऋण देने वाली संस्थाओं को अलग-अलग नहीं रखना चाहिए। सभी सहकारी समितियों को अल्पकालीन और दीर्घकालीन दोनों प्रकार के ऋण देने चाहिए।


(छ) पुनर्जीवन पैकेज:- कमेटी ने इस बात सिफारिश की है कि उन सहकारी संस्थाओं को मजबूत बनाया जाना चाहिए जिनमें विकास करने की क्षमता है। इसके लिए एक पैकेज लागू किया जाना चाहिए जिसके चार कार्यक्रम हो (1) वित्तीय (2) परिचालनगत (3) संगठनात्मक तथा (4) प्रणालीगत । इन सुधारों को लागू करने के लिए आवश्यक धन का 20 प्रतिशत भाग सदस्यों को शेयर पूँजी के रूप में जुटाना चाहिए तथा 80 प्रतिशत भाग केंद्रीय तथा राज्य सरकारों द्वारा बिना ब्याज के कर्जों के रूप में दिया जाना चाहिए।


(ज) सहकारी पुर्नव्यवस्था तथा विकास निधिः- कपूर समिति ने यह सिफारिश की है कि नाबार्ड को 500 करोड़ रु. की राशि से सहकारी पुर्नव्यवस्था तथा विकास निधि की स्थापना करनी चाहिए।

यह रकम केंद्रीय सरकार द्वारा नाबार्ड को दी जानी चाहिए। इस रकम का प्रयोग उन राज्यों को सहायता देने के लिए किया जाना चाहिए जो सहकारी संस्थाओं को मजबूत बनाने की पूर्व शर्तें पूरी करती हो।


(झ) पूँजी सहायता :- सरकारी बैंकों के लिए आवश्यक है कि वे अपना पूंजीगत आधार मजबूत करने की दशा में आगे बढ़े और एक निश्चित अवधि में लागू मानदंडों के अनुरूप रहें।


(ञ) वसूली प्रबंधः–इस समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि यहाँ ऋण का आधार एक लाख रु. से अधिक है मौजूदा डी. आर. टी. के प्रावधान को सहकारी बैंकों पर भी लागू किया जाना चाहिए।

इसके फलस्वरूप कर्जो की वसूली को जल्दी की जा सकेगी। सरकार को सहकारी बैंकों को ऋणों की वसूली के प्रयासों में सहायता करनी चाहिए। सरकार को ऋण माफी की घोषणाओं से बचना चाहिए।


(ट) आंतरिक जाँच नियंत्रण तथा ऑडिटिंग:- सहकारी बैंकों में उच्च श्रेणियों के अधिकारियों द्वारा नियमित रूप से निरीक्षण, आंतरिक जाँच तथा ऑडिटिग की जानी चाहिए। इसके लिए नाबार्ड द्वारा उचित दिशा निर्देश तैयार की जानी चाहिए। इन बैंकों की ऑडिटिग चार्टर्ड एकाउन्टेंट द्वारा की जानी चाहिए।