रिज़र्व बैंक की कार्यप्रणाली - Reserve Bank Functioning

रिज़र्व बैंक की कार्यप्रणाली - Reserve Bank Functioning


भारतीय रिज़र्व बैंक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य यह है कि वह देश की बैंकिंग व्यवस्था का नियमन और नियंत्रण करता है। बैंकों की नीति देश हित में रहे और वे सही दिशा में साख विस्तार करते रहे इसके लिए आवश्यक है कि उनके कार्यों पर रिज़र्व बैंक का उचित नियंत्रण रहे। रिज़र्व बैंक निम्नलिखित साधनों से भारतीय वित्तीय व्यवस्था का नियंत्रण करता है:


1. लाइसेंस - भारत में स्थापित होने वाले प्रत्येक बैंक को रिज़र्व बैंक से लाइसेंस लेना अनिवार्य है। इसके लिए रिजर्व बैंक को प्राथना पत्र देना पड़ता है। रिजर्व बैंक द्वारा उसी बैंक को लाइसेंस दिया जाता है जो आवश्यक शर्तों की पूर्ति करता है। यदि बैंक देशहित के विरुद्ध काम करता है तो उसका लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है।


2. प्रबंध – भारत में कोई भी व्यक्ति एक से अधिक बैंक में निदेशक नियुक्त नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति किसी बैंक के प्रतिशत से अधिक मतों का अधिकारी नहीं हो सकता है। रिज़र्व बैंक इस बात का ध्यान रखता है कि कोई बैंक इन दोनों बातों के विपरीत काम नहीं करे ।


3. पूँजी - भारत में बैंकों के अनुचित विस्तार को रोकने के लिए इनकी पूँजी व्यवस्था इस प्रकार की बनाई गई है कि केवल बड़े-बड़े बैंक ही देश के अधिकांश भागों में अपनी शाखाओं का विस्तार कर सकें और छोटे बैंक अपने व्यवसाय को एक राज्य में सीमित कर उस क्षेत्र की जनता के अधिकाधिक लाभ पहुँचा सकें।

बैंकिंग अधिनियम की धरा 12 में यह व्यवस्था की गई है कि किसी बैंक की प्रर्थिक पूँजी अधिकृत पूँजी की 50 प्रतिशत और प्रदत्त पूँजी प्रर्थिक पूँजी की 60 प्रतिशत से कम नहीं हो सकती।


4. तरल कोष भारत के सभी बैंकों के लिए यह आवश्यक है कि वे पर्याप्त मात्र में नकद या तरल राशि रखें ताकि जमाकर्ताओं को तत्काल भुगतान कर सकें। इस संबंध में बैंकिंग अधिनियम की धारा 24 में यह व्यवस्था की गयी है कि सभी भारतीय बैंक अपने कुल दायित्व का 25 प्रतिशत नकद एवं


अनुमोदित प्रतिभूतियों के कोष के रूप में रखेंगे।


5. शाखा विस्तार भारतीय रिज़र्व बैंक को बैंकों की शाखा विस्तार पर भी नियंत्रण करना पड़ता है। कोई बैंक रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना न तो नई शाखा खोल सकता है और न पुरानी शाखा का स्थान ही बदल सकता है।


6. निरीक्षण रिजर्व बैंक को यह अधिकार दिया गया है कि वह भारत के किसी भी बैंक का किसी भी समय निरीक्षण कर सकता है। इस निरीक्षण में रिज़र्व बैंक के अधिकारी यह जाँच करते हैं

कि बैंक उधार देने, विनियोग करने तथा जमानत रखने, आदि में सरकारी नीति की अवहेलना तो नहीं कर रहे हैं। इस प्रकार नियमित निरीक्षण द्वारा रिज़र्व बैंक भारतीय बैंकों की क्रियाओं तथा नीतियों पर पूरा नियंत्रण रखता है।


7. दुर्बल बैंकों का समामेलन जिन बैंकों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है उन्हें रिज़र्व बैंक दुसरे बैंकों के साथ मिल जाने का आदेश दे सकता है। इस आदेश का दोनों बैंकों द्वारा पालन किया जाना आवश्यक है। 


8. अवसायन - जिन बैंकों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो और उसमें सुधर की कोई सम्भावना न हो उन बैंकों को बनाये रखना ग्राहकों के हित में नहीं होता,

क्योंकि अंत में उन बैंकों के बंद हो जाने से ग्राहकों की साडी रकम डूबने का भय रहता है। रिज़र्व बैंक को यह अधिकार है कि ऐसे बैंकों को बंद करने के लिए वह उचित कदम उठाये।


9. अंतिम लेखे एवं अंकों की समयानुकूल रिपोर्ट भारत के प्रत्येक बैंक को अंतिम लेखे छः माहि अवधि के 30 सितंबर एवं 31 मार्च को तैयार करने पड़ते हैं और इनकी तीन प्रतियाँ 31 मार्च तक रिजर्व बैंक को भेजनी पड़ती है। इससे रिज़र्व बैंक को देश की पूरी बैंकिंग व्यवस्था की सही जानकारी रहती है।


10. ऋण नीति निर्धारित करना अनुसूचित व्यापारिक बैंक की ऋण नीति रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित होती है तथा इस नीति में परिवर्तन का आदेश भी रिज़र्व बैंक द्वारा दिया जाता है। इसी संबंध में चयनित साख नियंत्रण का आदेश भी रिज़र्व बैंक द्वारा दिया जाता है।