भारत में सहकारी बैंकिग को बढ़ावा देने के लिए सुझाव - Suggestions for Promotion of Co-operative Banking in India
भारत में सहकारी बैंकिग को बढ़ावा देने के लिए सुझाव - Suggestions for Promotion of Co-operative Banking in India
रिजर्व बैंक के अनुसार सहकारी बैंक की व्यवस्था ने पूरे देश में बैंक की आदतों को फैलाने का उपयोगी कार्य किया है। लेकिन अपने दीर्घकालीन अस्तित्व के बावजूद अधिकतर सहकारी बैंकों को सुस्थिर आधार पर वित्तीय क्षमता प्राप्त करना बाकी है। इसलिए सहकारी वित्तीय संस्थाओं के सुधार पर ध्यान दिया जा रहा है।
भारत में सहकारी बैंकिग का विकास बहुत धीमा रहा है। इस बैकिंग प्रणाली की सफलता
निम्नलिखित तत्वों पर निर्भर करती है:
(क) प्राथमिक समितियों का पुनर्गठन:- प्राथमिक समितियों का पुनर्गठन किया जाना चाहिए । छोटी और एक बहुउद्देशीय समितियों का गठन किया जाना चाहिए। इनका दायित्व भी सीमित होना चाहिए।
(ख) पूँजी की पूर्तिः - इन बैंकों के पास पूँजी की कमी है, उसे दूर करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक तथा सरकार को इन्हें कम ब्याज पर काफी रुपया उधार देना चाहिए। सदस्यों को रुपया जमा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
(ग) सहकारी बैंकिग का प्रचारः - सहकारी बैंकों के सिद्धान्तों तथा लाभों का काफी प्रचार किया जाना चाहिए, जिससे लोग उन्हें समझ सकें।
(घ) बचतः - सहकारी बैंकों को गाँवों तथा शहरों में छोटी-छोटी बचत इकट्ठी करने का प्रयत्न करना चाहिए। इससे एक तो फिजूलखर्ची कम होगी तथा दूसरे इन बैंकों पूँजी में वृद्धि होगी।
(ङ) फसलों के आधार पर साख:- इन बैंकों को ऋण खड़ी फसल के आधार पर देना चाहिए। इससे उन्हें भी ऋण मिल सकेगा। जिनके पास बहुत थोड़ी भूमि है। किसान अपने अल्पकालीन खर्चे आसानी से पूरा कर सकेंगे।
(च) प्रशिक्षण: - सहकारी बैंकिंग की शिक्षा दिलाने का प्रबंध किया जाना चाहिए। इसके लिए एक संस्था सबसे पहले रिजर्व बैंक ने पूना में खोली थी। लगभग सभी राज्यों मे सहकारी बैंकिग का प्रशिक्षण दिए जाने का प्रबंध किया जाना चाहिए।
(छ) कम सरकारी नियंत्रणः - सरकार को सहकारी बैंकिंग के संगठन पर अपना नियंत्रण कम कर देना चाहिए। इसके फलस्वरूप सहकारी बैंकिग आंदोलन में जनता की रूचि अधिक बढेगी।
(ज) सहकारी बैंकों का पुनर्गठनः - केंद्रीय तथा राजकीय सहकारी बैंकों की आर्थिक दशा में सुधार किया जाना चाहिए जिससे वे अधिक ऋण दे सकें। केंद्रीय बैंकों को ऋण देने के अतिरिक्त प्राइमरी समितियों का निरीक्षण भी करना चाहिए।
(झ) दीर्घकालीन साख:- भूमि विकास बैंकों का अधिक विकास किया जाना चाहिए किसानों को दीर्घकालीन ऋण मिल सकें और वे उसकी सहायता से भूमि तथा खेती का सुधार कर सकें
(ञ) सरकारी सहायता :- यदि सरकार किसानों की सहायता बैंकों द्वारा करेगी तो ये अधिक लोकप्रिय बन जायेगें और उनकी सदस्यता बढ़ेगी।
(ट) प्रबंध व्यवस्था में सुधार:- इन बैंकों की प्रबंध व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। बैंकों के चुने हुए पदाधिकारियों को भी सहकारिता का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इनके हिसाब-किताब की जाँच के लिए उचित प्रबंध किया जाना चाहिए।
(ठ) ऋण नीति में सुधार:- इन बैंकों को अपनी ऋण संबंधी नीति में सुधार करना चाहिए। ऋण की राशि उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें उसकी वास्तव में आवश्यकता है।
ऋणी के उपयोग की निगरानी की जानी चाहिए। ब्याज की दर कम की जानी चाहिए। ऋण को वापिस लेने के विशेष प्रयत्न किए जाने चाहिए।
(ड) समितियों के रक्षित कोषः - प्रत्येक बैंक को अपने रक्षित कोष में अधिक जमा करने का प्रयत्न करना चाहिए, जिससे वह आर्थिक संकट का सामना कर सकें।
(ढ) दीर्घकालीन तथा अल्पकालीन सहकारी साख का समन्वयः - रिजर्व बैंक ने अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन सहकारी साख का समन्वय करने के लिए एक समिति की स्थापना की थी। इस समिति ने सुझाव दिया है कि दोनों प्रकार की साख का धीरे-धीरे समन्वय किया जाना चाहिए। इसने वर्तमान संस्थाओं के स्थान पर सहकारी जिला विकास बैंक तथा राजकीय सहकारी विकास बैंक की स्थापना का सुझाव दिया है।
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