क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के सुधार के लिए सुझाव - Suggestions for Reform of Regional Rural Banks
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के सुधार के लिए सुझाव - Suggestions for Reform of Regional Rural Banks
आर.आर.बी द्वारा सामना की जाने वाली उपरोक्त सभी समस्याएँ सही हैं। इन समस्याओं के समाधान की आवश्यकता है, अतएव इस संदर्भ में निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं: (क) स्वामित्व तथा नियंत्रणः - स्पांसर बैंकों के विस्तार के रूप में कार्य करने की बजाए, इन्हें एक अलग-थलग इकाई के रूप में स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए। वर्तमान 50:35:15 पूँजी अंशदान को हल करने के लिए पूँजी निवेश की पुनः संरचना की जाए। इन बैंकों को विशेष पदनाम अस्तित्व तथा भूमिका दी जाए ताकि ये अपनी मूल संस्था से अलग हट कर काम कर सकें। श्रेणीबद्धता स्तरों की संख्या से इन्हें राज्य स्तर समन्वय तथा रिजर्व बैंक केंद्रीय सरकार स्तरीय नियमन तथा नियंत्रण तक घटाया जाए।
उच्च स्तर पर औपचारिक विनियमितता उपाय अपनाए जा सकते है, जबकि कार्यसंबंधी नीतियों का राज्यनीतियों, प्राथमिकताओं, आवश्यकताओं तथा विशेष परिस्थितियों के अनुरूप राज्य स्तर पर निर्माण किया जा सकता है।
इन बैंकों को अपनी प्रचालन नीति तथा कार्यप्रणाली में पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इनकी कार्यप्रणाली में किसी अन्य एजेंसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए ऐसे स्वतंत्र वातावरण में ये बैंक अपने कार्य की दिशा का निर्णय ले सकते हैं और सामान्य प्रबंध का संचालन सही प्रकार से कर सकते हैं। इस प्रबंधन में यदि कोई मार्गदर्शक नीति अथवा अन्य बैंकिंग विनियमन इसके समक्ष आता है, तो ये बैंक इसे सहर्ष स्वीकार कर सकते हैं।
(ख) कोषों का प्रबंधः - इन बैंकों के लिए कठोर रूप से मार्गदर्शन किया जाए कि वे अपने कोषों का उपयुक्त उपयोग कहाँ करें, इनका प्रचालन का विस्तृत क्षेत्र क्या प्रकार की ऋण सेवाएँ ये प्रदान करें। इन बैंकों का लक्ष्य ग्रामीण सुधार होना चाहिए। इस तथा किस संदर्भ में यदि ये बैंक एक लोचशील दिशानिर्देश अपनाएँ, तो इससे अच्छे परिणाम मिल सकते है। इनको अपनी नीतियों का निर्माण इस विधि से अपनाना चाहिए कि जिससे निम्नलिखित उद्देश्य यथाशीघ्र प्राप्त हो सकें। लोगों की जमाओं का एकत्रीकरण करना स्व-रोजगार परियोजना को संगठित करने के लिए स्व-सहायता समूहों को समर्थन देना, निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए वित्त प्रबंध करना विशेष क्षेत्रों के लिए उपयुक्त प्रमुख ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन देना तथा बेरोजगारी, निर्धनता,
निरक्षरता एवं अन्य ऐसी सामाजिक आर्थिक बुराइयों के चंगुल से बचने के लिए ब्लॉक / ग्रामीण स्तर पर जीवनक्षम सामाजिक आर्थिक क्रियाओं को शुरू करना ।
(ग) लक्ष्य तथा प्रयोजनः - साख / जमा अनुपात 75 प्रतिशत के आस-पास अवश्य बना रहना चाहिए। प्राथमिक क्षेत्र अग्रिम लक्ष्य किसी भी कीमत पर पूरा किया जाना चाहिए। लगभग सभी अग्रिम ग्रामीण क्षेत्र में जाने चाहिए। ग्रामीण कोषों को किसी भी हालत में अन्य क्षेत्रों में नहीं जाने देना चाहिए।
ऋणों की अवधि, जोखिम तत्व, प्राथमिकता, सरकारी स्कीमों आधारित विभिन्न प्रकार के सभी ऋणों की (जैसे फसल ऋण,
ग्रामीण गृह निर्माण ऋण, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग व अन्य) ब्याज की दर लोचशील होनी चाहिए।
निर्धन तथा मार्जिन किसानों के कल्याण के लिए कार्य करने वाले इन बैंकों का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होना चाहिए। इन्हें सेवा की भावना से कार्य करना चाहिए। वित्तीय सुधारों के बाद व्यापारिक बैंक सामाजिक बैंक की बजाए लाभ बैंकों में बदल गए हैं और इस बदलाव के क्रम में प्राथमिक क्षेत्र को बीच में छोड़ दिया गया है। सार्वजनिक क्षेत्रीय बैंक की भूमिका पर अब प्रश्न यह उठता है कि प्राथमिक क्षेत्र (ग्रामीण कृषि, कुटीर उद्योग आदि) अब किसका बच्चा है, अर्थात् उसका ध्यान रखने वाला कौन है। इसका यह अर्थ नहीं कि उधार देने के सिद्धांतों को हवा में फेंक दिया जाए। एक उचित लागत परिणाम- लाभ विश्लेषण की आवश्यकता है। कार्य प्रणाली में मितव्ययित तथा कुशलता को बलि पर नहीं चढ़ा देना चाहिए।
(घ) व्यापित क्षेत्र तथा शाखा विस्तारः- भारत में लगभग 5 लाख गाँव है।
अनुसूचित बैकों ने तो अपना ध्यान शहरी तथा मैट्रों क्षेत्रों में केंद्रित कर लिया है, जिसके फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी कई शाखाएं प्रायः बंद हो चुकी है, सहकारिता को छोड़कर अब केवल एक मात्र विकल्प क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की कार्य प्रणाली ही है। इसलिए आवश्यक है कि सभी गाँवों में पंचायतें, ब्लाक तथा तालुका इन बैंकों के अधीन आ गए। क्षेत्रीय आधार पर स्थित इसकी शाखाओं का एक निकट जाल अप्रत्याशित प्रतिस्पर्धा, आत्मसंतुष्टि तथा प्रयासों के दोहरेपन को जोड़ सकता है और समक्षता को प्रोत्साहित कर सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि देश के संपूर्ण ग्रामीण क्षेत्र को व्याप्ति में लाने के लिए इन बैंकों की अधिक से अधिक शाखाएँ खोली जाए।
(ङ) कर्मचारी तथा प्रशिक्षण:- इन ग्रामीण परक संस्थाओं में कर्मचारियों की नियुक्ति एवं प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
प्रत्येक शाखा के कर्मचारियों में कम से कम एक ऐसा व्यक्ति अवश्य होना चाहिए जो उसी ग्रामीण इलाके का हो, ऐसा होने से बैंक मैनेजर स्थानीय दशाओं तथा लोगों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकता है। सामान्यतया ग्रामीण समुदाय में से इन बैंकों में लोगों / कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए ताकि बैक में काम करने वाले अन्य कार्यकर्ता अपने आपको ग्रामीण वातावरण से बाहर न महसूस करें। इसके अतिरिक्त ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति अपने आप को इन बैंकों में प्रभावी सिद्ध कर सकते है और अच्छी प्रकार से अपनी सेवाएं प्रदान कर सकते है। बेशक यह एक कोरी आशा हैं, परंतु फिर भी इन बैंकों में ग्रामीण शिक्षित युवकों के लिए 5 लाख रोजगार सृजित किए जा सकते हैं।
इनके कर्मचारियों को निरंतरता के आधार पर प्रभावपूर्ण प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि इन कर्मचारियों की क्रियाएँ ठीक दिशा की ओर अग्रसर हो सकें।
उमंग व जोश लाने तथा लक्ष्य प्राप्ति के लिए इन कर्मचारियों को मौद्रिक तथा गैर-मौद्रिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
(च) कृषि आधारित उद्योगों का विकास:- सूखे के कारण फसलों के फेल होने से विश्वीकरण के कारण छोटे, कुटीर तथा लघु उद्योगों के बीमार होने से आधारिक संरचना के अभाव आदि के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी तथा अल्प रोजगार काफी मात्रा में व्याप्त है। जब तक कृषि आधारित उद्योग विकसित नहीं किए जाते बैंकों के लिए इन ग्रामीण क्षेत्रों मे कम करना थोड़ा कठिन-सा हो गया है।
इन क्षेत्रों में कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से बैकों को भी लाभ होगा तथा क्षेत्र के आर्थिक कल्याण में वृद्धि होगी। ग्रामीण क्षेत्र में औद्योगिकीकरण के विस्तार से, आर.आर.बी अपने प्रचालन तथा कार्यविधि में वृद्धि कर सकते हैं।
अतएव किसी विशेष इलाके में उपयुक्त औद्योगिक इकाइयों की स्थापना एवं विकास के फलस्वरूप आर. आर.बी की कार्यप्रणाली अधिक कुशल हो सकेगी।
(छ) ग्रामीण वित्त में नेता:- ग्रामीण वित्त में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की हैसियत एक बाज़ार नेता के रूप मे होनी चाहिए। अन्य खिलाडियों के प्रवेश को वहाँ प्रतिबंधित किया जाए। दीर्घकालीन ऋण आवश्यकताओं, पूँजी निवेश, गृह निर्माण आदि के अतिरिक्त जनसंख्या की अन्य सभी जरूरतों की पूर्ति आर.आर.बी द्वारा की जानी चाहिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कोषों के अतिरिक्त प्रवाह द्वारा सहायता प्रदान कर सकता है।
(ज) उच्च पूँजी:- आर.आर.बी. को व्यापार की अतिरिक्त मात्रा को पूरा करने के लिए अपनी पूँजी को बढ़ाना होगा,
ताकि जनसंख्या के कम से कम 50 प्रतिशत की माँग को पूरा किया जा सके। विशाल ग्रामीण जनसंख्या को कवर करने के लिए इन बैंकों को लगभग 1 लाख शाखाएँ खोलनी होगी, बेशक वे सरल पैमाने पर ही हो। इसके अनुरूप सरकारी योगदान अथवा / और सार्वजनिक इशू द्वारा इन बैंकों को अपने पूँजी आधार को बढ़ाना होगा। विभिन्न एजेंसियों द्वारा पुनर्वित्त सुविधा, इस संदर्भ में, सुगम और उपयोगी होगी।
(झ) स्पांसर बैंक के लिए सुझाव:- स्पांसर बैंक को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए। (i) उन्हें व्यापारिक बैंकों की ग्रामीण शाखाओं को बंद कर देना चाहिए और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को दे देना चाहिए: (ii) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को परामर्श देकर उनके लिए कोषों के प्रबंध मे इनके द्वारा अधिक प्रभावी योगदान देना चाहिए ऋण योजनाओं के मूल्यांकन में साख के उपयोग में तथा उनके आंतरिक ऑडिट के लिए उपयुक्त प्रशिक्षित स्टॉफ उपलब्ध कराने में पूर्ण रूप से संभव सहायता देनी चाहिए ।
(iii) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के पुनः वित पर ब्याज को कम दर देनी चाहिए: (iv) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की जमाओं का निवेश दीर्घकालीन सरकारी प्रतिभूतियों मे करें (v) इन बैंकों के स्टॉफ के प्रशिक्षण के लिए सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
(ञ) केंद्रीय सरकार के लिए सुझाव:- केंद्रीय सरकार / भारतीय रिजर्व बैंक तथा नाबार्ड द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए: (i) अपने स्टॉफ का वेतन पैमाना तथा काम के घंटे निश्चित करने में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को इन द्वारा पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिए: (ii) नए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक उन क्षेत्रों में खोले जाने चाहिए जहाँ पिछड़े वर्गों की जनसंख्या अधिक हो; (iii) इन बैंकों को स्पान्सर बैंकों द्वारा नहीं बल्कि अपने स्टॉफ की स्वयं भर्ती करने की अनुमति देनी चाहिए, ताकि स्थानीय व्यक्ति जो स्थानीय स्थिति तथा समस्याओं से परिचित है इनकी सहायता कर सकें।
(ट) राज्य सरकारों के लिए सुझाव:- राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
(i) राज्य सरकारों को बकाया राशि वसूली में इन बैंकों की सहायता करनी चाहिए; (ii) इन्हें या तो प्राथमिक कृषि साख समितियों को पुनः संगठित करना चाहिए अथवा नई सेवा समितियाँ स्थापित करनी चाहिए ताकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को बड़े पैमाने पर उत्पादक क्रियाएँ शुरू करने के लिए साख उपलब्ध हो सके और सेवा लागत कम हो सके।
(ठ) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए सुझावः अपनी कार्य प्रणाली को सुधारने के लिए क्षेत्रीय बैंकों को निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए:
(i) इन्हें गैर-लक्ष्य समूहों को भी साख सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए ताकि उनका लाभ - मार्जिन बढ़ सकें। परंतु ऐसी साख सुविधाएँ कुल बकाया अग्रिम की 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। (ii) पर्याप्त शिक्षित एवं प्रशिक्षित स्टॉफ के साथ इन बैंकों को अपने स्वयं की वसूली प्रणाली अपनानी चाहिए:
(iii) इनको वह रणनीति खोजनी चाहिए कि जिसके द्वारा ग्रामवासियों में बैंक संबंधी आदतें पैदा हो, (iv) ऋण देने के साथ-साथ इन्हें अपनी क्रियाओं में वृद्धि करनी चाहिए जैसे ग्रामीण परामर्श सेवा, साख कार्य को थोड़ा-थोड़ा करके कई बार में पूरा करना, रोजगार के अधिक अवसर पैदा करना आदि ।
ग्रामीण क्षेत्रों में चूँकि संस्थागत वित्त अपर्याप्त है, साहूकार अपना प्रभुत्व जमाए हुए है. और ग्रामीण जनता ऋण और बंधवा की कड़ियों में जकड़ी हुई है। व्यापारिक बैंक अपनी ग्रामीण शाखाओं को बन्द करते जा रहे हैं, ग्रामीण निर्धन की सेवा की बजाए लाभदायकता पर वे अपना ध्यान अधिक केंद्रित कर रहें हैं। इस संदर्भ में सरकारी संस्थाओं द्वारा व्यवस्थित रूप में गाँवों में उधार देना शुरू करना चाहिए,
ताकि ग्रामीण लोगों को ऋण और निर्धनता से मुक्ति मिल सके और वे अपने लिए रोज़गार प्राप्त कर सके तथा अपनी उत्पादकता सुधार सकें।
वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्र के लिए अनेक स्कीमें व संगठन है, जो उनकी सेवा कर सकते है। आवश्यकता इस बात की है कि क्षेत्र की संपूर्ण संवृद्धि के लिए इन सभी संस्थाओं, नीतियों और परियोजनाओं में समन्वय की आवश्यकता है। एक लक्ष्य-परक समयबद्ध, वास्तविक तथा क्षेत्रीय पहुँच की अत्यन्त आवश्यकता है। इस संदर्भ आर. आर. बी. ग्रामीण क्षेत्रों में कोषों में गतिशीलता लाने के लिए अत्यन्त उपयुक्त है और क्षेत्रीय विकास में वे अपना पूरा योगदान दे सकते हैं।
सन 1986 में केलकर वर्किंग ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को कहा कि जो कार्य आर. आर. बी. को सौपें गए है,
ये बैंक उनके लिए बिल्कुल उपयुक्त है। अतएव आर.आर.बी. के साधनों में वृद्धि करके, इनके ऋण देने वाली प्रक्रिया को युक्तिकरण करके, इनके स्टॉफ को उचित प्रशिक्षण देकर तथा राज्य सरकारों से सहयोग प्राप्त करके इनकों नया जीवन देने की अत्यन्त आवश्यकता है।
टी.टी. वैल्युधन तथा वी. शंकरनारायण का कहना है कि, "क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक केवल ग्रामीण साख एजेंसियों ही नहीं है ये इससे अधिक हैं, ये बैंक प्रेरित ग्रामीण विकास का एक फलदायक अभ्यास है।"
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की पुनः संरचना
आर. आर. बी. की हानि की समस्या को हल करने के लिए तथा इनकी क्षमता में सुधार लाने के लिए हाल ही के वर्षों में इनके प्रचालन को पुनः संरचित करने के लिए तथा इनमें नई पूँजी डालने के लिए प्रयास किए गए है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने आर. आर. बी. की पुनःसंरचना के लिए उपाय सुझाने के लिए एम.सी. भंडारी समिति की नियुक्ति की थी। भण्डारी समिति की सिफारिशों पर 1994-95 में 49 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को पुनःसंरचना एवं पुनर्जीवन के लिए लिया गया। आर.आर.बी. की प्रबंधकीय प्रचालन संबंधी तथा कार्य प्रणाली से संबंधित संरचना के लिए नाबार्ड की विकासीय क्रिया योजनाओं द्वारा कार्य शुरू किया गया है और आवर्ती योजना के आधार पर पाँच वर्षों की समय अवधि के लिए इनके तुलन पत्रों को शुद्ध किया जाएगा।
दिसंबर 1995 में नाबार्ड द्वारा नियुक्त बासु समिति ने फेज के अंतर्गत 68 आर. आर.बी की व्यापक पुनः संरचना के चयन की सिफारिश की। इस संदर्भ में ब्याज दरों,
शाखाओं के पुनः आवंटन, साख आवंटन, साख की दिशा और पूँजी के अनुप्रेरण के साथ-साथ मानवशक्ति नीति की प्रमुख से पहल की गई। भारत सरकार ने 1994-98 तथा 1998-99 के बीच आर.आर.बी. के पुनः पूँजीकरण के लिए 1867.5 करोड़ रु. की राशि विमोचित की।
इसके अतिरिक्त 1998-99 में रु. 305.3 करोड़ का अतिरिक्त इक्यूटी समर्थन भी दिया गया। 1988-99 में 196 आर. आर. बी. में से 175 आर. आर. बी. पूर्णतया या आंशिक रूप से पुनः पूँजीकृत किए जा चुके थे जबकि 2 आर.आर.बी को किसी समर्थन की आवश्कता नहीं थी। केवल 19 आर.आर.बी. पूँजीकरण कार्यक्रम परिधि के बाहर थे। इसके अतिरिक्त आर. आर.बी. की निर्गमित शेयर पूँजी की राशि भी रु. 75 लाख से बढ़ा कर रु. 1 करोड़ कर दी गई। उत्पादकता, नकदी प्रबंध अग्रिम पोर्टफोलियों तथा वसूली निष्पादन में नाबार्ड इन बैंकों की कार्यप्रणाली को मानीटर करता हैं।
नाबार्ड ने आर.आर.बी. के लिए निम्नलिखित अल्पकालीन उपायों का भी एक पैकेज तैयार किया है।
(i) उनको अपने सेवा क्षेत्र आभारों से मुक्त कर दिया गया हैं।
(ii) उन्हें अपने गैर-लक्षीय समूह वित्त को भी 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक बढ़ाने की अनुमति दे दी गई है।
(iii) उनको अपनी कुछ हानि देने वाली शाखाओं को कृषि उत्पाद केंद्रों, मार्केट यार्ड, मण्डी आदि में आंबटित करने की अनुमति दे दी गई है। (iv) उन्हें विस्तार पटल के खोलने की भी स्वतंत्रता दे दी गई है।
(v) गैर - कृषि क्रियाओं को पूरा करने के लिए उन्हें इस बात की अनुमति भी दे दी गई है
कि वे अपनी क्रियाओं की रेंज को बढ़ाए तथा गहन करें। आशा की जाती है कि आर.आर.बी. की इस पुनः संरचना से ये बैंक अब अधिक कार्यकुशलता से कार्य कर सकेंगे।
राव कमेटी सिफारिशें
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की कार्य प्रणाली के विभिन्न पक्षों की समीक्षा करने तथा वित्तीय क्षेत्र में सुधारों की दृष्टि से इन बैंकों द्वारा प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य के लिए सिफारिशें करने की दृष्टि से सरकार ने जुलाई 2001 में श्री एम.वी.एस. चालापाथी राव, नाबार्ड के प्रबंध निर्देशकों की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की, ताकि वह क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 में सुधार करने के लिए सुझाव दें। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट जून 2002 में दी, इस रिपोर्ट में निम्नलिखित सुझाव की गई:
(i) पूंजी संरचना तथा स्वामित्व प्रतिमान में परिवर्तन किया जाए।
(ii) स्पासर बैंकों की भूमिका को बढ़ाया जाए।
(iii) सामाजिक आर्थिक जोन आधार पर मिश्रण द्वारा संरचनात्मक एकीकरण किया जाए।
(iv) थोड़े-थोड़े रूप में पूँजी पर्याप्त मानदंडों का समावेश किया जाए। (v) इन्हें अतिरिक्त पर्यवेक्षी अधिकार प्रदान की जाए।
(vi) कंप्यूटर आधारित प्रबंध प्रणाली अपनाई जाएं।
(vii) परिसंपत्ति दायित्व तथा जोखिम प्रबंध प्रणालियों को समावेश किया जाए।
वार्तालाप में शामिल हों