बैंकों के निवेशों के प्रकार - Types of Banks' Investments

बैंकों के निवेशों के प्रकार - Types of Banks' Investments


बैंक के निवेशों को दो भागों में बाँटा जा सकता है (क) अलाभकर निवेश तथा (ख) लाभकर निवेश बैंक को दोनों प्रकार के निवेशों में धन लगाना पड़ता है। बैंक के सफल संचालन के लिए इन दोनों निवेशों में उचित संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। (क) अलाभकर निवेशः- अलाभकर निवेश से बैंक की किसी प्रकार की प्रत्यक्ष आय प्राप्त नहीं होती, परंतु सुरक्षा तथा तरलता की दृष्टि से इस प्रकार के निवेश काफी महत्वपूर्ण होते है। अलाभकर निवेश दो प्रकार के होते हैं: (1) नकद कोष, तथा (2) मृत स्कन्ध । (1) नकद कोषः - ऐसा कहा जाता है कि नकद कोष बैंकों के लिए सुरक्षा की प्रथम पंक्ति है। नकद कोष प्रत्येक बैंक की तरल परिसंपत्ति होता है।

बैंक के पास यथेष्ट नकद कोष न होने पर संभव है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह ग्राहकों की नकदी की माँग को पूरा न कर सके। जिससे बैंक के प्रति ग्राहकों का अविश्वास उत्पन्न हो जाय और बैंक का अस्तित्व खतरे में पड़ जाय। 1930 की मंदी में विफल होने वाले अनेक बैंकों की आर्थिक स्थिति खराब नहीं थी परंतु ग्राहकों को नकद रकम भुगतान न कर सकने के कारण बंद हो गये। नकद कोषों का मात्रा का निर्धारण बैंक को कितना नकद कोष रखना चाहिए, इसके लिए निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। देश, काल तथा बैंक की स्थिति अलग-अलग होने पर विभिन्न बैंको की नकद कोष की आवश्यकता में भी अंतर होता है। आवश्यकता से अधिक नकद कोष रखने पर बैंक के लाभकर निवेश की मात्रा कम हो जाती है। इसलिए


कोष की मात्रा के निर्धारण में बहुत सावधानी से काम लेना पड़ता है। निम्नलिखित तत्वों के आधार पर बैंक नकद कोष की मात्रा का निर्धारण कर सकता है। (i) वैधानिक आवश्यकताः - अधिकांश देशों में सरकार अथवा केंद्रीय बैंक वैधानिक रूप से


बैंकों के नकद कोषों की न्यूनतम मात्रा निश्चित कर देते है। विधान के अनुसार बैंक नकद कोष अपने पास रखते हैं तथा उनका कुछ भाग केंद्रीय बैंक के पास रखते हैं। (ii) परम्पराः - प्रत्येक देश में बड़े-बड़े बैंक अपने अनुभव के आधार पर नकद कोष रखने से


संबंधित परम्पराएं निश्चित करते हैं जिनका अनुसरण अन्य बैंक भी करते हैं। (iii) निवेश की प्रकृतिः- यदि बैंक के अधिकांश निवेश तरल आदेयों जैसे विनिमय बिलों, अल्पकालीन ऋणों, विनिमयशील प्रतिभूतियों आदि में है तो वे कम मात्रा में नकद कोष रखकर भी काम चला सकते हैं।


(iv) जमाराशियों का आकार:- बैंकों में ग्राहकों की बड़ी बड़ी रकम जमा होने पर बैंकों को अधिक मात्रा में नकद कोष रखने की आवश्यकता होगी ताकि बड़ी से बड़ी माँग को पूरा किया जा सके। जब जमाराशियों का आकार छोटा होता है और जमाकर्ताओं की संख्या अधिक होती है तो थोड़ी मात्रा में नकद कोष रखने से ही चल जाता है।


(v) जमाराशियों का स्वरूपः- यदि किसी बैंक की अधिकतर जमाराशियाँ चालू खातों में हैं तो बैंक को अधिक मात्रा में नकद कोष रखने पड़ते है। इसके विपरीत निश्चितकालीन अथवा बचत खातों में जमाराशियों की मात्रा अधिक होने पर थोड़े नकद कोष से काम चल सकता है।


(vi) ग्राहकों की प्रकृतिः - जिस बैंक में सट्टेबाजों तथा बड़े व्यापारियों के खाते अधिक होते हैं जैसे बड़ी मात्रा में नकद कोष रखने होते हैं, क्योंकि उसके ग्राहकों को धन की माँग बराबर बनी रहती है। यदि बैंक के अधिकांश ग्राहक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा लोग है तो बैंक को अधिक मात्रा में नकद कोष नहीं रखने पड़ते, क्योंकि वे लोग प्रायः अधिक रकम नहीं निकालते ।


(vii) बैंकिग विकास तथा चैक का प्रयोगः- यदि देश में बैंकिंग का पर्याप्त विकास हो चुका है तथा लोगों में चैकों द्वारा भुगतान करने की आदत है तो बैंक को अधिक नकदी रखने की आवश्यकता नहीं होती। बैंकों के विकास के अभाव में नकद लेन-देन की आदत होने पर बैंकों को अधिक नकद कोष रखने पडते है।


(viii) समाशोधन गृहों का विकासः-जिन स्थानों पर समाशोधन गृहों की सुविधा उपलब्ध होगी, चैकों का तत्काल समाशोधन होने के कारण जनता को चैकों का प्रयोग करने की प्रोत्साहन मिलेगा। बैंक चैकों का नकद भुगतान न करके अधिकांश भुगतान केवल खातों की प्रविष्टियों द्वार ही तय कर लेगें। इस प्रकार कम नकद कोष रखने पड़ेगें।


उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए बैंक अपनी परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं के अनुसार अपने पास नकद कोष रखते है। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि बहुत कुछ जनता द्वारा बैंक के प्रति विश्वास की मात्रा पर निर्भर करता है। जनता का बैंक में विश्वास बने रहने पर बैंक के सामने साधारणतया कोई कठिनाई उत्पन्न नहीं होती. परंतु जनता का विश्वास न रहने पर बैंक का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।


(2) मृत स्कन्धः - बैंक के प्रत्यक्ष रूप से कोई आर्थिक लाभ न होने पर भी अपना व्यवसाय चलाने के लिए भवनों का निर्माण करना पड़ता है, कार्यालयों के लिए फर्नीचर और पंखे आदि की व्यवस्था करनी पडती है तथा सुरक्षा के लिए मजबूत अलमारियाँ,

तिजोरियाँ और लॉकर आदि रखने पड़ते है। चूँकि आवश्यकता पड़ने पर इन्हें आसानी से नहीं बेचा जा सकता इसलिए इन्हें मृत स्कन्ध कहते हैं।


अपनी प्रतिष्ठा को बढाने के लिए प्रायः बैंक अपने कार्यालयों के लिए विशाल एवं सुंदर भवन बनवाते है। इस संबंध में बैंक को यह देखना चाहिए कि कार्यालय के लिए भवन किराए पर लेना सस्ता होगा अथवा उसका निर्माण करना। डा. राव के शब्दों में बैंक के लिए


ईट तथा चूने में पूँजी लगाने के स्थान पर शुद्ध नकदी के रूप में रखना अधिक श्रेष्ठ है।

(ख) लाभकर निवेश: - बैंकों द्वारा लाभकर निवेश अनेक मदों में किए जाते है। इनका वर्णन नीचे किया गया है।


(i) माँग पर अथवा अल्पसूचना राशि:- बैंक द्वारा दिए गए ये ऐसे ऋण होते है जिन्हें बैंक बिना किसी पूर्व सूचना के अथवा अल्प सूचना देकर वापस ले सकता है। इस प्रकार के ऋणों पर बैंक को बहुत कम ब्याज प्राप्त होती है परंतु अति अल्पकालीन होने के कारण ये बैंक के अत्यधिक तरल निवेश होते है। इस प्रकार के ऋणों में निवेश करने से बैंक अपने साधनों में तरलता बनाए रखता है तथा साथ में ब्याज भी कम लेता है। इस प्रकार एक साथ दो लाभ प्राप्त हो जाते हैं। यदि नकद कोष को बैंक की रक्षा की प्रथम पंक्ति कहा जाय तो अल्पसूचना राशि की रक्षा की द्वितीय पंक्ति कहा जा सकता है। भारत में अधिकांश अल्प सूचनार्थ ऋण प्रायः एक बैंक द्वारा दूसरे बैंक को दिए जाते हैं।


(ii) बिलों की कटौती करना:- व्यापारिक बिलों की कटौती करके भी बैंक अपने धन का निवेश करते है। इस प्रकार का निवेश अल्पकालीन होने के साथ अच्छी आय देने वाला, सुरक्षित तथा तरल होता है, इसलिए इसे बैंक की तृतीय रक्षा पंक्ति भी कहा जाता है। बिलों की कटौती के आधार पर बैंकों द्वारा ऋण देने से बिलों के प्रयोग को प्रोत्साहन मिलता है तथा बैंकों को आय प्राप्त होती है। बिल की अवधि समाप्त होने से पूर्व यदि बैंक को रकम की आवश्यकता पड़ जाय तो बिल बाज़ार में बिक्री अथवा केंद्रीय बैंक से बिल की पुनः कटौती द्वारा बैंक अपनी आवश्यकता को पूरा कर सकता है। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि केवल प्रथम श्रेणी के उतम व्यापारिक बिलों की ही कटौती की जाय ताकि इनकी केंद्रीय बैंक से पुनर्कटौती संभव हो सके।


(iii) कोषागार विपत्र तथा प्रतिभूतियां:- बैंक अपने साधनों का एक भाग कोषागार विपत्रों अथवा ट्रेजरी बिलों में निवेश करते है क्योंकि इससे सरकार को सहायता मिलती है तथा बैंकों को भी आय प्राप्त होती है। ये बिल प्रायः अल्पकालीन होते है तथा इन्हें आसानी से बेचा जा सकता है, इसलिए इनमें किए गए निवेश में तरलता का गुण होता है। लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से बैंक अपने धन का महत्वपूर्ण भाग विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियाँ खरीदने में भी लगाते हैं। परंतु यह बात ध्यान में रखने की है कि बैंकों को प्रतिभूतियों में निवेश करते समय निवेश में तरलता, सुरक्षा एवं आय के सिद्धांतों को सामने रखना चाहिए तथा यथासंभव ऐसी प्रतिभूतियों में लेन-देन करना चाहिए, जिनके मूल्य में स्थिरता रहती है और जिनमें विक्रयशीलता का गुण होता है।


(iv) ऋण तथा अग्रिमः- प्रायः सभी वाणिज्य बैंक अपने साधनों का बहुत बड़ा भाग ऋणों तथा अग्रिमों में निवेश करते है। इनसे बैंकों को काफी आय प्राप्त होती है। चूँकि ऋण तथा अग्रिम उचित धरोहर के आधार पर ही दिए जाते हैं, इसलिए इनमें सुरक्षा का गुण भी होता है। इनसे व्यापारिक तथा औद्योगिक संस्थाओं की धन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है. और इस प्रकार देश के आर्थिक विकास में सहायता मिलती है।


ऋण देने में सावधानियाँ ऋण देते समय बैंकों को उचित सावधानी रखनी चाहिए। बैंकों द्वारा ऋण व्यक्तियों को भी दिए जाते हैं तथा संस्थाओं को भी ऋण देने में कुछ विशेष सावधानियों की आवश्यकता है, जैसे


1. किसी भी ग्राहक को बहुत लंबी अवधि के लिए ऋण नहीं देना चाहिए ।


2. किसी भी ग्राहक को बहुत बड़ी रकम का ऋण नहीं देना चाहिए, बल्कि ऋणों का विकेंद्रीकरण की नीति अपनानी चाहिए।


3. सट्टे के कार्य तथा उपभोग के लिए ऋण देना अच्छा नहीं होता जबकि उत्पादक


कार्यों के लिए दिए गए ऋण स्वयं साध्य होते है और उनमें अधिक सुरक्षा रहती है। 4. ऋणों का बार-बार व आसानी से नवीनीकरण नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसे ऋणों की वसूली करना अंत में कठिन हो जाता है।


5. ऋणों के लिए उचित व पर्याप्त जमानत प्राप्त करनी चाहिए तथा जमानत के मूल्य से कम मूल्य का ऋण देना चाहिए।


6. ऋण लेने वाले की साख तथा उसके व्यवसाय की ठीक से जाँच कर लेनी चाहिए।


7. बैकों में पारस्परिक स्पर्द्धा के कारण सस्ते ऋणों की नीति बहुत हानिकारक होती है, इसलिए इसे कभी - कभी नहीं अपनाना चाहिए ।