कार्यशील पूंजी के प्रकार - Types of Working capital
कार्यशील पूंजी के प्रकार - Types of Working capital
कार्यशील पूंजी के निम्न प्रकार बताये जाते हैं
अ) स्थायी कार्यशील पूँजी स्थायी कार्यशील पूँजी, व्यवसाय के अविरत संचालन के लिए आवश्यक हैं। यह राशि प्रतिवर्ष बदल सकती है और व्यवसाय की उन्नति, व्यवसाय के संचालन चक्र पर निर्भर करती हैं। वर्षभर चालू सम्पत्तियों की सतत आवश्यकता को स्थायी कार्यशील पूँजी कही जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं
यह समय के आधार पर वर्गीकृत की जा सकती हैं।
व्यवसाय की प्रक्रिया को बनाये रखने में, सतत संचालन में इसकी आवश्यकता होती हैं।
• व्यवसाय के संचालन की वृद्धि के साथ-साथ इसका आकार भी बढ़ता हैं।
कच्चे माल का न्यूनतम स्तर, स्टॉक में न्यूनतम तैयार माल, न्यूनतम बैंक शेष या आकस्मिकताओं के लिए संचय आदि में कार्यशील पूँजी स्थायी तौर पर रखी जाती हैं।
ब) चर या अस्थायी कार्यशील पूँजी अस्थायी कार्यशील पूंजी का मतलब है कि व्यवसाय को संचालित करने के लिए अतिरिक्त संपत्ति की आवश्यकता के लिए जरूरी धनराशि सीजन में अतिरिक्त स्कंध क्रय करने के लिए अतिरिक्त रोकड़ की आवश्यकता होती है
या किसी विशिष्ट विक्रय के लिए माल की आवश्यकता होती हैं। तात्कालिक रूप से अतिरिक्त चालू सम्पत्तियों में विनियोग, अस्थायी कार्यशील पूँजी कहलाता हैं। मौसमी व्यवसायों में अस्थायी कार्यशील पूँजी के आँकलन की आवश्यकता होती हैं।
कार्यशील पूँजी की विशेषताएँ- कार्यशील पूँजी की निम्न विशेषताएँ होती है।
1. अल्प जीवनकाल - चालू सम्पत्तियों, रोकड़, बैंक शेष, देनदार, प्राप्य विक्रय, स्कंध आदि का जीवनकाल अल्प होता हैं। ये सामान्यतः एक वर्ष के लिए होती है तथा इसका स्वरूप परिवर्तित होता रहता हैं। रोकड़ शेष सामान्यतः साप्ताहिक, देनदार प्राप्य विपत्र एक से तीन माह, स्कंध छ: माह से अधिक नहीं रखा जाता हैं।
चालू सम्पत्तियों का जीवनकाल संचालन चक्र की अवधि पर निर्भर करता हैं।
2. शीघ्र रूपांतरण शीघ्र रूपांतरण कार्यशील पूँजी की दूसरी विशेषता है। चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों के स्वरूप शीघ्र बदलते रहते हैं। रोकड़ कच्चे माल में, कच्चा माल निर्मित माल में, निर्मित माल देनदार में, रोकड़ में देनदार, इस तरह यह सतत् क्रम चलता रहता हैं।
3. अल्प अवधि हेतु प्रबंध- कार्यशील पूँजी अल्पकालीक वित्तीय स्थिति की ओर ध्यान केन्द्रित करती हैं। सामान्यतः एक वर्ष के अल्प समय को ध्यान में रखते हुए सम्पत्तियों का प्रबंध किया जाता है। इसमें रूपये के वर्तमान मूल्य पर विचार नहीं किया जाता हैं।
4. बारम्बारता - कार्यशील पूँजी प्रबंध की गतिविधियाँ बारम्बार एवं पुनरावृत्ति प्रकृति की होती हैं। एक संचालन चक्र पूरा होने पर दूसरा चक्र चालू हो जाता हैं। ये गतिविधियाँ निश्चित क्रम में, सुव्यवस्थित भी नहीं होती हैं।
5. तरलता - कार्यशील पूँजी प्रबंध का मूल तत्व यह है कि व्यवसाय में तरलता इस तरह बनी रहे कि न तो ऊँचे दर का जोखिम हो और न ही विनियोगों पर प्रत्याय दर नीची रहे। वित्तीय प्रबंधक के लिए ऐसा प्रबंध करना चुनौतीपूर्ण कार्य होता है क्योंकि चालू सम्पत्तियों में विनियोग परिवर्तित होता रहता हैं।
6. सम्पत्तियों में आन्तरिक संबंध चालू सम्पत्तियाँ शीघ्र ही अपना स्वरूप बदलती हैं।
इनमें अंतर्सम्बन्ध होता हैं। चालू सम्पत्तियों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। एक सम्पत्ति के संबंध में लिया गया निर्णय दूसरे सम्पत्ति को प्रभावित करता है। विक्रय के स्तर का विश्लेषण किये बिना, स्कंध में विनियोग का स्तर तय नहीं किया जा सकता हैं। रोकड़ विक्रय की दशा में, देनदार नहीं होंगे।
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