पूंजी की लागत - Capital Cost

पूंजी की लागत - Capital Cost

हमारे द्वारा एकत्रित की जाने वाली पूँजी का कुछ मूल्य हमें अवश्य चुकाना पड़ता है। वह मूल्य ब्याज अथवा लाभांश के रूप में हो सकता है। पूँजी की लागत का अभिप्राय उस मूल्य से है जो हमें पूँजी के उपयोग के बदले चुकाना पड़ता है। पूँजी की लागत वह न्यूनतम दर होती है जिसे पूँजी पर अर्जित करना प्रबन्धकों के लिए आवश्यक होता है जिससे पूँजी के उपभोग के मूल्य तथा उससे सम्बद्ध व्ययों की पूर्ति होती रहे। सामान्य तौर पर पूँजी का एकत्रीकरण तीन प्रकार से कर सकते हैं:


1. आत्मपूंजी या स्वत्व पूंजी- इसके अन्तगर्त नियोक्ता द्वारा दैनिक बचतों के माध्यम से एकत्रित पूंजी को उद्यम में विनियोजित किया जाता है। इस पूंजी पर नियोक्ता प्रतिफल स्वरूप लाभ प्राप्त करना चाहता है।


2. ऋणपूंजी ऋणपूंजी के अन्तगर्त, नियोक्ता, परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों आदि द्वारा बैंक, वित्तीय संस्थानों अथवा ऋणपत्रों के निगमन द्वारा पूँजी संग्रहण हेतु प्रयास किया जाता है। प्राय: इस प्रकार से एकत्रित पूंजी पर नियोक्ता को ब्याज देना पड़ता है।


3. अंश पूंजी इसके अन्तगर्त नियोक्ता द्वारा बाजार में अपने अंशों का निर्गमन किया जाता है। जनता द्वारा उन निर्गमित अंशों को क्रय करने पर नियोक्ता के पास अंश पूंजी के रूप में प्रचुर मात्रा में धनराशि एकत्रित हो जाती है। किन्तु अंश धारकों को प्रतिफल स्वरूप लाभांश का भुगतान करना पड़ता है। साथ ही आँषिक तौर पर अंशधारकों के मध्य स्वामित्व का हस्तान्तरण भी हो जाता है।