कम्पनी की विशेषताएँ अथवा लक्षण - characteristics of the company
कम्पनी की विशेषताएँ अथवा लक्षण - characteristics of the company
1. व्यक्तियों द्वारा स्थापना- कम्पनी की स्थापना करने के लिये एक निश्चित संख्या में व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जेसे सार्वजनिक कम्पनी के लिये कम से कम सात व निजी कम्पनी के लिये कम से कम दो सदस्यों का होना आवश्यक होता हैं। इसी तरह सार्वजनिक कम्पनी में सदस्यों की अधिकतम संख्या 50 हो सकती हैं।
2. कृत्रिम व्यक्ति- कम्पनी की स्थापना व्यिक्यों द्वारा की जाती हैं, परंतु यह एक कृत्रिम व्यक्ति होती है। इसे न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है। कम्पनी अपने नाम से दूसरे व्यक्तियों पर मुकदमा दायर कर सकती तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा भी कम्पनी पर मुकदमा दायर किया जा सकता हैं।
प्राकृतिक पुरूष व कम्पनी में एक मात्र अंतर यह है कि पार कृतिक परूतु “ा का जन्म माँ बाप द्वारा होता है।, जबकि कम्पनी का जन्म व अंत विधान द्वारा होता है।
3. विधान द्वारा निर्मित- कम्पनी एक वैधानिक व्यक्ति है। इसकी स्थापना के लिये देश में प्रचलित कानून की स्वीकृति आवश्यक है। हमारे देश में कम्पनी के कार्यों का नियमन एंव नियंत्रण भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 के अधीन होता है। भारत में स्थापित प्रत्येक कम्पनी का इस अधिनियम के अधीन पंजीयन होना अनिवार्य है। कम्पनी का जन्म विधान द्वारा होता है तथा उसका अंत भी कम्पनी अधिनियम में दी गई व्यवस्थाओं के तहत किया जाता है।
4. व्यापारिक संस्था- कम्पनी का उद्देश्य व्यवसाय को चलाना होना चाहिये। कम्पनी का व्यवसाय वैधानिक होना चाहिये। उसे कोई ऐसा व्यवसाय नहीं करना चाहिये जिस पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया हो। साथ ही व्यवसायिक संस्था होने के नाते सरकार द्वारा बनाये गये नियमों का उसे पालन करना चाहिये।
5. सीमित दायित्व यह कम्पनी का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण हैं। सामान्यतया प्रत्येक कम्पनी के अंशधारियों का दायित्व उसके द्वारा खरीदे गये अंशों के मूल्यों तक सीमित रहता हैं।
सीमित दायित्व के कारण ही जनता कंपनी में रूचि लेती हैं व अपने साधनानुसार अंश क्रय करती हैं। सीमित दायित्व के कारण कम्पनिया अनेक व्यक्तियों से पूंजी प्राप्त करने में सफल होती हैं व बड़े आकार का व्यवसाय कर सकती है।
6. सार्वमुद्रा - कम्पनी कृत्रिम व्यक्ति होने के कारण न तो स्वयं व्यापार कर सकती हैं और न ही हस्ताक्षरा कम्पनी की ओर से उसके समस्त कार्यों को संचालको उत्तरदायित्वोंद्वारा किया जाता हैं। अत: कम्पनी की ओर से किये गये कार्यो के लिये सार्वमुद्रा का प्रयोग करना अनिवार्य होता हैं। जिस कागज, लेख या दस्तावेज पर सार्वमुद्रा नहीं लगी होती, उसमे लिखा गया सौदा या कार्य कम्पनी की ओर से किया गया नहीं माना जाता। सार्वमुद्रा कम्पनी से स्वतंत्र एवं कृत्रिम अस्तित्व को सिद्ध करती है।
7. स्वतंत्र अस्तित्व- कम्पनी का उसके अंशधारियों से स्वतंत्र अस्तित्व होता हैं। कम्पनी द्वारा किये गये कायर के लिये अंशधारियों के कार्यों के लिये कम्पनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और कंपनी अपने अंशधारियों पर तथा अंशधारी कम्पनी पर मुकदमा चला सकते हैं।
8. निरंतर उत्तराधिकार- कम्पनी का उत्तराधिकार निरंतर होता हैं। इसके सदस्यों की मृत्यु पागलपन या दीवालियापन का कम्पनी के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैं।
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