भुगतान सन्तुलन का ऐतिहासिक अवलोकन - Historical Evaluation of Balance of Payments

भुगतान सन्तुलन का ऐतिहासिक अवलोकन - Historical Evaluation of Balance of Payments


संतुलन का विचार अत्यन्त संकीर्ण अर्थों में चौदहवीं शताब्दीमें वाणिकवादी विचारधारा द्वारा प्रचलित हुआ। राष्ट्रवाद वणिकवादी विचारों का केन्द्र बिन्दु था। आर्थिक क्षेत्र में व्यापार व वाणिज्य का महत्व बढने लगा जिसके चलते एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया, जिसे व्यापारी कहा जाने लगा। व्यापारी व राजा के हित समान थे। राजा को धन व शक्ति की आवश्यकता केवल अपने लिए नहीं वरन अपनी जनता के कल्याण के लिए भी थी। व्यापार को ही इस उद्देश्य की पूर्ति का एक उत्तम स्रोत माना गया था।


पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक समाज के आर्थिक ढाँचे में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गए थे। घरेलू अर्थव्यवस्था के स्थान पर विनिमय अर्थव्यवस्था को महत्व दिया जाने लगा था।

विनिमय व व्यापार की प्रगति से मुद्रा की आवश्यकता भी बढी विज्ञान व तकनीक का निरन्तर विकास हुआ। नई खोज व आविष्कार हुए। जहाजरानी अब अधिक सुविधाजनक हो गई और नए महाद्वीपों की खोज हुई जिससे व्यापार का क्षेत्र विमत हुआ।


आर्थिक दृष्टि से व्यापार व वाणिज्य का विस्तार तथा राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए मुद्रा व बहुमूल्य धातुओं पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया। वणिकवादियों का यह विश्वास था कि स्वर्ण चाँदी व अन्य बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त करने का एकमात्र साधन विदेश व्यापार ही था।


वणिकवादी लेखकों ने कहा कि यदि आयात की अपेक्षा निर्यात अधिक होते हैं तो ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है

कि एक व्यापारी अपने व्यापार से बहुमूल्य धातुओं का निर्यात करेगा व इस प्रकार शासन के कोषों में वृद्धि होगी। वणिकवादी लेखक व्यापार के अनुकूल सन्तुलन के प्रश्न पर एकमत नहीं थे। कुछ लेखकों का विचार था कि हर व्यक्तिगत सौदे से राष्ट्र को लाभ प्राप्त होना चाहिए।


वणिकवादी लेखकों में किसी ने इस बात को स्पष्ट नहीं किया कि अनुकूल व्यापार सन्तुलन से उनका आशय सम्पूर्ण व्यापार के सन्तुलन की अनुकूलता से था या वे प्रत्येक देश से होने व्यापार के सन्तुलन की अनुकूलता को अलग-अलग लेते थे। यह कहा गया कि विदेश व्यापार में इस नियम का पालन हर व्यक्ति को करना चाहिए कि हम जो कुछ एक वर्ष में विदेशियों को भेजते है वह उन वस्तुओं के मूल्य से अधिक होना चाहिए जिनको हम उनसे प्राप्त करते है।


कवादी साहित्य में अनुकूल व्यापार सन्तुलन से सम्बन्धित कुछ अन्य विचार भी महत्वपूर्ण हैं; जैसे निर्यातों का मूल्य अधिक से अधिक होना चाहिए अर्थात् वस्तुओं का निर्यात अधिकाधिक मात्रा में ही नहीं बल्कि ऊंची मूल्य की वस्तुओं के निर्यात को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


कच्ची सामग्री के निर्यात को सीमित रखना चाहिए। विलासिता की वस्तुओं का आयात कम होना चाहिए। वणिकवर्ष लेखक व्यापार सन्तुलन की अदृश्य मदों से भी परिचित थे। इन मदों में उन्होंने जहाजों द्वारा माल होने से प्राप्त होने वाली आय, बीमा, विदेशों में दूतावासों तथा सेना पर होने वाला व्यय इत्यादि को सम्मिलित किया।