भारतीय विदेशी विनिमय का इतिहास - History of Indian Foreign Exchange

भारतीय विदेशी विनिमय का इतिहास - History of Indian Foreign Exchange


भारतीय विदेशी विनिमय का इतिहास अपने ही ढंग का है। सन् १८९३ में भारत सरकार ने इंग्लैंड के सिक्के शिलिंग पेंस में रुपए की एक कानूनन दर निर्धारित की थी वह दर १ रु. १ शिलिंग ४ पेंस थी। भारत सरकार इस दर को सन् १९१७ तक बनाए रखने में समर्थ रही। इसके बाद विनिमय की दर का बढ़ना प्रारंभ हुआ। विनिमय की दर के बढ़ने का प्रधान कारण चाँदी की कीमत में वृद्धि थी। चाँदी की कीमत इतनी बढ़ गई थी कि भारत का चाँदी का रुपया प्रामाणिक सिक्का हो गया। सन् १९९८ में यह दर १ शि. ६ पें. हो गई। मई और अगस्त, सन् १९१९ में यह दर क्रमशः १ शि. ८ पें. और १ शि. १० पें. हो गई। चाँदी की कीमत फिर भी बढ़ती ही गई। इसी वर्ष विनिमय की दर सितंबर में २ शिलिंग, नवंबर में २ शि. २ पें. तथा दिसंबर में २ शि. ४ पें. तक बढ़ गई।


सन् १९२० के फरवरी महीने के प्रथम सप्ताह में मुद्रा कमेटी (Currency Committee) की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। कमेटी ने यह सिफारिश की कि भारतीय विनिमय की कानूनन दर बढ़ा दी जाए पर कमेटी ने ऊँची दर से होने वाली हानियों की तरफ पूरा ध्यान नहीं दिया। इस दर से भारत के निर्यात व्यापार और उद्योग धंधों को भारी क्षति पहुंचने की संभावना थी परंतु उसने इसकी परवाह न की। कुछ समय बाद विनिमय की दर का घटना आरंभ हुआ और वह अप्रैल सन् १९२० तक २ शि. पौने चार पेंस तक गिर गई। विनिमय की दर गिरती ही गई और १९२० के अंत तक वह गिरते गिरते १ शि. १० पें, तक आ गई। इस बीच भारत सरकार को कई लाख रुपयों की उल्टी हुंडिया एवं कई लाख रुपए का सोना घाटे पर बेचना पड़ा।

उल्टी हुंडियोंको बेचने से भारत सरकार को करीब ३२ करोड़ की हानि हुई और घाटे पर सोना बेचने से करीब ८ करोड़ की हानि हुई। इस प्रकार भारत को लगभग ४० करोड़ रुपयों की हानि हुई।


कई करोड़ रुपयों की हानि उठाने के बाद सितंबर, सन् १९२० से भारत सरकार ने विनिमय संबंधी बातों में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई। इससे विनिमय दर की अस्थिरता और भी बढ़ती गई। सन् १९२१ से १९२५ तक यह दर १ शि. ६ पे एवं १ शि. ३ पे के बीच घटती बढ़ती रही। इस 'अस्थिरता के कारण भी देश को बहुत नुकसान हुआ।


हिल्टन यंग कमीशन की रिपोर्ट सन् १९२६ ई. में प्रकाशित हुई। इस कमीशन की सिफारिशों के अनुसार भारतीय विनिमय की दर १ शि. ६ पें. निश्चित हुई और भारत सरकार ने आवश्यक कानून बना दिए


लेनदेन के प्रकार, प्रकृति, संरचना और (Nature, structure and Types of transactions)


भारत में, प्राधिकृत डीलरों ने रिजर्व बैंक को उस समय अमेरिकी डॉलर को बेचने / खरीदने के लिए सहारा दिया, जो बाद में उस मुद्रा में लेनदेन करने के लिए तैयार है। रिज़र्व बैंक सामान्य रूप से अधिकृत डीलरों से, किसी अन्य मुद्रा को खरीद / बेच नहीं देगा। रिज़र्व बैंक के डीलिंग रूम में यह अनुबंध किसी भी कामकाजी दिन में प्रवेश किया जा सकता है। शनिवार को कोई लेनदेन दर्ज नहीं किया जाता है। इस अनुबंध में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभ्यास के अनुरूप स्पॉट के साथ-साथ अगली डिलीवरी के लिए मूल्य तिथि होना चाहिए। भारतीय रिज़र्व बैंक सामान्यतः बाजार में प्रवेश नहीं करता है, जहां सट्टा बलों के कारण एक्सचेंज दरें हानिकारक तरीके से बढ़ रही हैं, रिज़र्व बैंक सीधे या स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के माध्यम से बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।