वेतन की नीति का महत्व (2) - Importance of salary policy

वेतन की नीति का महत्व (2) - Importance of salary policy

 इस अधिनियम के अंतर्गत नियोजित व्यक्तियों को अपेक्षित मजदूरी देने का दायित्व नियोजक पर है लेकिन निम्नलिखित नियोजनों में नियोजक के प्रति उतरदायी या उसके द्वारा नामनिर्दिष्ट या नामांकित व्यक्ति भी मजदूरी के भुगतान के लिए दायी होते है-


1. कारखानों में उनके प्रबंधक,


2. औद्योगिक या अन्य प्रतिष्ठानों में उनके पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए नियोजक के प्रति उतरदायी व्यक्ति


3. रेलवे में, अगर उसका नियोजक रेलवे प्रशासन है तो स्थानीय क्षेत्र के लिए प्रशासन द्वारा इसके लिए नामनिर्दिष्ट व्यक्ति ।


(घ) मजदूरी कालावधि तथा मजदूरी भुगतान के लिए समय-राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा रेलवे में या केंद्रीय या राज्य सरकार के लोकनिर्माण विभाग में दैनिक दर पर नियोजित व्यक्तियों के संबंध में मजदूरी भुगतान के उपर्युक्त उपबंधों से छूट दे सकती है, लेकिन इस संबंध में छूट देने से पहले केंद्र सरकार से सलाह ले लेना आवश्यक है।



कर्मचारियों की सेवा की समाप्ति को छोड़कर अन्य स्थितियों में मजदूरी का भुगतान काम चलने वाले ही दिन किया जाना जरूरी है।


(ङ) वैध मुद्रा में मजदूरी का भुगतान मजदूरी का भुगतान चालू सिक्कों या करेंसी नोटों या दोनों में ही किया जा सकता है, लेकिन कर्मचारियों के लिखित प्राधिकरण पर नियोजक उन्हें मजदूरी चेक ये या उनके बैंक खाते में जमाकर भी कर सकती हैं।


(च) मजदूरी से अनुज्ञेय कटौतियां - अधिनियम के अनुसार कर्मचारियों से केवल निम्नांकित प्रकार की कटौतियां ही की जा सकती है-


(i) जुर्माने के लिए कटौतियां कर्मचारियों पर जुर्माना केवल कृत्यों और लोगों के लिए लगाया जा सकता है जिनके संबंध में नियोजक ने राज्य सरकार या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ले ली हो,

ऐसे कृत्यों और लोगों की सूचना विहित स्थानों में और विहित तरीकों से प्रदर्शित करना आवश्यक है। किसी भी कर्मचारी पर जुर्माना तब तक नहीं लगाया जा सकता, जब तक उसे जुर्माने के खिलाफ कारण बताओं का अवसर नहीं दिया गया हो या इस संबंध में विहित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई हो। किसी भी मजदूरी कालावधि में जुर्माने की अधिकतम राशि उस कालावधि के लिए देय मजदूरी के 3 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। पंद्रह वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों पर जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। जुर्माने की रकम को किश्तों में या उसे लगाए जाने के 60 दिनों के बीत जाने के बाद वसूल नहीं किया जा सकता। सभी जुर्मानों और इस संबंध में वसूल की गई सभी वसूलियों को रजिस्टर में अंकित करना जरूरी है। जुर्माने के रूप में वसूल की गई सभी राशि को केवल उस कारखाने या प्रतिष्ठान में नियोजित व्यक्तियों के लाभ के लिए ही खर्च किया जा सकता है।


(ii) काम से अनुपस्थिति के लिए कटौतियां- अगर कोई कर्मचारी नियोजन की शर्त का उल्लघंन कर काम से अनुपस्थित होता है, तो उसके लिए भी मजदूरी से कटौती की जा सकती है। काम से अनुपस्थिति के लिए कटौती वास्तविक अनुपस्थिति से अधिक अवधि के लिए नहीं की जा सकती। लेकिन, जब किसी प्रतिष्ठान में दस या अधिक कर्मचारी गुटबंदी से बिना सूचना के या बिना उचित कारण के अनुपस्थित होते है तो अनुपस्थिति की अवधि के लिए कटौती करते समय 144 समय अधिकतम आठ और दिनों के लिए भी कटौती की जा सकती है अगर नियोजन की शर्त के अनुसार अनुपस्थिति की नोटिस के बदले मजदूरी से कटौती करने की व्यवस्था है नियोजित व्यक्तियों को काम से अनुपस्थित तक भी समझा जाएगा, जब कार्यस्थल पर उपस्थित रहने के बावजूद वे हाजिर हडताल या अन्य अनुचित कारणों से अपना काम करने से इंकार करते है।


(iii) नुकसान या हानि के लिए कटौती- नुकसान या हानि के लिए कटौती की राशि नियोजक को होने वाली हानि की रकम से अधिक नहीं हो सकती। उपर्युक्त सभी स्थितियों में मजदूरी से कटौती तब तक नहीं की जा सकती, जब तक उस कर्मचारी को कटौती के विरूद्ध कारण बताने का अवसर नहीं दिया जा चुका हो या विहित प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया हो। मजदूरी देने के लिए उतरदायी व्यक्ति के लिए उपर्युक्त सभी कटौतियों को विहित तरीके से रजिस्टर में दर्ज करना आवश्यक है।


(iv) प्रदत सेवाओं के लिए कटौतियां- अधिनियम के अंतर्गत कर्मचारियों को उपलब्ध कराई जाने वाली निम्नलिखित सेवाओं के लिए मजदूरी से कटौतियां की जा सकती है-


• नियोजक, सरकार, किसी कानून के अधीन स्थापित आवास बोर्ड या अन्य सहायता प्राप्त आवास स्थान उपलब्ध कराने वाले प्राधिकारी द्वारा प्रदान की जाने वाली आवासीय सुविधाओं के लिए कटौतियां, तथा,


• नियोजक द्वारा प्रदत ऐसी सुख सुविधाओं के लिए कटौतियां, जिनके संबंध में, राज्य सरकार या उसके द्वारा अधिकृत पदाधिकारी ने सामान्य या विशेष आदेश से स्वीकृति दे दी हो। इन सुविधाओं के लिए कर्मचारी की मजदूरी से तब तक कटौती नहीं की जा सकती, जब तक उसने इन सुविधाओं को नियोजन की शर्त के रूप में स्वीकार नहीं किया हो। कटौती की मात्रा सेवा के मूल्य के अनुपात से अधिक नहीं हो सकती। सरकार इस संबंध में शर्त भी निर्धारित कर सकती हैं।


(v) अग्रिम की वसूली के लिए कटौतियां कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की पेशगी या उस पर देय ब्याज की वसूली या अधिक मजदूरी के समायोजन के लिए कर्मचारियों की मजदूरी से कटौती की जा सकती है। नियोजन के पहले दिए गए अग्रिम धन की वसूली पहली पूरी मजदूरी कालावधि के लिए देय मजदूरी से ही की जा सकती है। नियोजन के बाद दिए गए अग्रिम के लिए कटौती राज्य सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार ही की जा सकती है। जो मजदूरी पहले से अर्जित नहीं की गई हो, उसके अग्रिम के लिए कटौती राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार ही की जा सकती हैं।


(vi) ऋणों की वसूली के लिए कटौती- श्रमिकों के कल्याण के लिए स्थापित निधि से या गृह निर्माण या राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित अन्य प्रयोजनों के लिए दिए गए ऋण और उससे संबंध ब्याज की वसूली के लिए भी कर्मचारियों की मजदूरी से कटौती की जा सकती हैं।

इस प्रकार की कटौती राज्य सरकार बनाए गए नियमों के अनुसार ही की जा सकती है।


(vii) सहकारी समितियों तथा बीमा योजनाओं में देनगी के लिए कटौतियां श्रमिकों की मजदूरी से राज्य सरकार या अधिकार प्राप्त पदाधिकारी द्वारा स्वीकृत सहकारी समितियों या डाकखाने द्वारा चलाई जाने वाली बीमा योजना में देनगी के लिए मजदूरी से कटौतियां की जा सकती है। इसी तरह जीवन बीमा निगम को जीवन बीमा पॉलिसी के लिए देय किश्त या केंद्र सरकार या राज्य सरकार की प्रतिभूतियों के क्रय या सरकार को किसी बचत योजना डाकघर बचत योजना में जमा करने के लिए कर्मचारियों के लिखित प्राधिकरण पर मजदूरी से कटौती की जा सकती है ये कटौतियां राज्य सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार ही की जा सकती है। कर्मचारियों के लिए बनाई गई केंद्र सरकार की किसी बीमा योजना के लिए भी मजदूरी से कटौतियां की जा सकती है।


(viii) नियोजित व्यक्ति द्वारा देय आयकर के लि कटौतियां ।


(ix) न्यायालय या अन्य सक्षम प्राधिकारी के आदेश द्वारा अपेक्षित कटौतियां


(x) कानून के अधीन स्थापित तथा राज्य सरकार या समक्ष पदाधिकारी द्वारा अनुमोदित भविष्य निधि में अंशदान या अग्रिम की वसूली के लिए कटौतियां ।


(xi) कर्मचारी द्वारा लिखित रूप से प्राधिकृत किए जाने पर राज्य सरकार या सक्षम पदाधिकारी से स्वीकृत नियोजक या पंजीकृत श्रमसंघ द्वारा नियोजित व्यक्तियों या उनके परिवार के सदस्यों के कल्याण के लिए गठित निधि में अंशदान के लिए कटौतियां ।


(xii) कर्मचारी के लिखित प्राधिकरण पर श्रमसंघ अधिनियम, 1926 के अंतर्गत पंजीकृत श्रमसंघ की सदस्यता के लिए देय फीस से संबंध कटौतियां


(xiii) विश्वस्तता गारंटी बांड पर बीमा किश्त देने के लिए कटौतियां


(xiv) नियोजित व्यक्ति के लिखित प्राधिकरण पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत निधि या केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट ऐसे अन्य कोष के लिए कटौतियां किसी भी मजदूरी कालावधि मे कटौतियां की कुल राशि उस कालावधि के लिए दी जाने वाली मजदूरी के 50 प्रतिशत से अधिक नही हो सकती, लेकिन सहकारी समितियों में अंशदान के लिए यह 75 प्रतिशत तक हो सकती हैं। अगर कटौतियों की कुल राशि इन सीमाओं से अधिक हो जाती है,

तो अतिरिक्त राशि की वसूली विहित तरीके से की जाएगी। नियोजक भारतीय रेलवे अधिनियम, 1890 को 146 छोड़कर अन्य कानूनों के अंतर्गत देय किसी भी राशि को कर्मचारियों की मजदूरी से वसूल कर सकता है।


(छ) अन्य उपबंध - अधिनियम के कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपबंध निम्नांकित प्रकार के हैं


(i) अधिनियम के सार का प्रदर्शन अधिनियम के दायरे में आने वाले कारखानों या औद्योगिक या अन्य प्रतिष्ठानों में मजदूरी भुगतान के लिए दायी व्यक्ति के लिए अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के सार को अंग्रेजी तथा नियोजित बहुसंख्यक श्रमिकों द्वारा समझी जाने वाली भाषा में विहित ढंग से प्रदर्शित करना आवश्यक है।

(ii) रजिस्टरों और अभिलेखों का अनुरक्षण- नियोजक के लिए कर्मचारियों के संबंध में उनके कार्यो, उनको दी गई मजदूरी मजदूरी से की गई कटौतियों दी गई रसीदों तथा अन्य विहित विवरणों को विहित ढंग से रजिस्टरों और अभिलेखों में अनुरक्षित करना आवश्यक है। ऐसे रजिस्टरों और अभिलेखों को अंतिम प्रविष्टि के दिन से कम से कम तीन वर्षो की अवधि तक सुरक्षित रखा जाएगा।


(iii) संविदा द्वारा त्याग इस अधिनियम के लागू होने के पहले या बाद में की गई कोई भी संविदा या समझौता, जिससे नियोजित व्यक्ति अधिनियम के अधीन उपलब्ध किसी अधिकार का त्याग कर देता है, अकृत और शून्य है।


(iv) असंवितरित मजदूरी का भुगतान अगर किसी कर्मचारी की मृत्यु या उसका पता नहीं मालूम होने के कारण मजदूरी भुगतान नहीं हो सका हो, तो उसका भुगतान कर्मचारी द्वारा मनोनीत व्यक्ति को करना आवश्यक है। अगर ऐसे मनोनीत व्यक्ति को मजदूरी का भुगतान करना संभव नहीं है तो उसे विहित प्राधिकारी के पास जमा करना जरूरी है। कर्मचारी द्वारा मनोनीत व्यक्ति को मजदूरी का भुगतान कर देने या उसे प्राधिकारी के पास जमा कर देने पर नियोजक का मजदूरी के भुगतान का दायित्व समाप्त हो जाता है।


(v) निरीक्षक- कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत नियुक्त निरीक्षक भी इस अधिनियम के अधीन कारखानों के लिए निरीक्षक होते हैं। इनके अतिरिक्त राज्य सरकार रेल कर्मशालाओं तथा अन्य प्रतिष्ठानों के लिए भी निरीक्षकों की नियुक्त कर सकती है।

खानों, तेलक्षेत्रों, रेल कर्मशालाओं को छोड़कर रेलवे तथा केंद्रीय वायु यातायात सेवा में निरीक्षकों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। निरीक्षक भारतीय दंडसंहिता के अर्थों में लोकसेवक भी होता है। नियोजक के लिए निरीक्षक को परिसर में प्रवेश, निरीक्षण, पर्यवेक्षण, परीक्षण तथा जांच करने की सुविधाएं प्रदान करना अनिवार्य है।


(v) दावे और अपील- राज्य सरकार औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 या इस तरह के अन्य कानून के अंतर्गत स्थापित श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण के पीठासीन अधिकारी या कर्मकार क्षतिपूर्ति आयुक्त या सिविल न्यायालय के न्यायाधीश का अनुभव रखनेवाले अन्य अधिकारी या वैतनिक दंडाधिकारी को मजदूरी से कटौतियां या मजदूरी भुगतान में विलंब आदि से संबंद्ध दावों की सुनवाई और फैसले के लिए प्राधिकारी नियुक्त कर सकती है।


(vi) संपति की कुर्की- अगर नियोजक या मजदूरी भुगतान के लिए दायी अन्य व्यक्ति प्राधिकारी या न्यायालय के आदेश के अनुसार कटौती या बकाए की रकम देने में टाल-मटोल कर रहे हो तो ऐसे व्यक्ति की संपति की कुर्की के लिए भी आदेश दिए जा सकते हैं।


(vii) शासितयां - विहित समय में मजदूरी भुगतान नहीं करने या मजदूरी भुगतान में विलंब करने या मजदूरी से अनधिकृत कटौतियां करने या अधिनियम के उपबंधों के उल्लघंन में जुर्माना लगाने या विहित विवरणी या दस्तावेज रखने में विफलता, वांछित सूचनाएं नहीं देने या गलत सूचनाएं देने, निरीक्षक के कार्य में बाधा डालने या निरीक्षक के समक्ष रिकार्ड और दस्तावेज नहीं पेश करने के दोषों की 200 से 1000 रू0 तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

मजदूरी कालावधि नियत नहीं करने या काम के दिन तथा प्रचलित सिक्कों या करेंसी नोटों में भुगतान करने में विफलता या जुर्माने या कटौतियों से संबंध रजिस्टर नहीं रखने या विहित सूचनाओं को प्रदर्शित नहीं करने के दोषी को 500 रू0 तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। अपराधों को दुहराना एक महीने से 6 महीने तक के कारावास तथा 500 से 3000 रू0 तक के जुर्माने से दंडनीय है। प्राधिकारी द्वारा नियत तिथि तक मजदूरी का भुगतान नहीं करने पर अभियुक्त की अपराध के प्रत्येक दिन के लिए 100रू0 के जुर्माने से दंडित किया जा सकता हैं।


(viii) नियम बनाने की शक्ति- अधिनियम के उपबंधों को लागू करने तथा प्राधिकारियों और न्यायालयों की प्रक्रियाओं को विनियमित करने के लिए राज्य सरकार नियम बना सकती है। अधिनियम में उन विषयों का भी उल्लेख किया गया है, जिनके संबंध में राज्य सरकार नियम बना सकती है। रेलवे, खान तथा तेलक्षेत्रों के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियम लागू होगें।


(ix) अन्य उपबंध अधिनियम के अन्य उपबंध अपराधों के परीक्षण के लिए प्रक्रियाओं, वादों के वर्जन तथा सद्भावपूर्वक कार्यवाही के लिए बचाव से संबद्ध है।