निर्णयन की विशेषताएँ - characteristics of decision making
निर्णयन की विशेषताएँ - characteristics of decision making
निर्णयन की विशेषताएँ अथवा प्रकृति निम्नलिखित हैं :-
यह अनेक विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ के चयन की प्रक्रिया है। निर्णयन की सबसे पहली विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन किया जाता है।
प्रत्येक समस्या के समाधान की अनेक विधियां हो सकती हैं। प्रबंधक द्वारा उनमें से सबसे अच्छी विधि को छांटा जाता है। उदाहरणार्थ, यदि एक संस्था के सामने विक्रय वृद्धि की समस्या है तो इसके समाधान के अनेक तरीके हो सकते हैं, जैसे मूल्य में कमी करना, अधिक व अच्छा विज्ञापन करना, उधार बिक्री की सुविधा उपलब्ध कराना आदि। प्रबंधक को इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन करना होता है।
यह विवेकपूर्ण चिंतन पर आधारित है। विवेकपूर्णताः को निर्णयन का सार माना जाता है क्योंकि निर्णयन के माध्यम से जो फैसले लिए जाते है उनकी सफलता सोच-विचार अथवा चिंतन अथवा गहन अध्ययन पर निर्भर होती है।
यह हमेशा किसी न किसी समस्या अथवा विवाद से जुड़ा होता है। क्योंकि निर्णयन का उद्देश्य समस्याओं अथवा विवादों का हल ढूंढना है इसलिए इसका इनके साथ जुड़ा होना स्वाभाविक है। अन्य शब्दों में यदि समस्या या विवाद न हो तो निर्णयन तथा प्रबंधन दोनों का महत्व ही समाप्त हो जाएगा। इसी संदर्भ में कहा जाता है कि, समस्याएं प्रबंधन की खुराक होती हैं जिन पर वह जीता है और विकास करता है।
इसके अंतर्गत विभिन्न उपलब्ध विकल्पों का मूल्यांकन किया जाता है।
जैसा कि स्पष्ट है कि यदि किसी समस्या के हल की एक ही विधि है तो निर्णयन की आवश्यकता नहीं पड़ती। निर्णयन के लिए अनेक विकल्प होने चाहिए। जब अनेक विकल्प होंगे तो निर्णयन के माध्यम से उनका मूल्यांकन करके अर्थात उनके लाभ एवं हानियों का अध्ययन करके सर्वश्रेष्ठ को चुना जाता है।
इसका उद्देश्य संस्थागत लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है। निर्णय लेने का कार्य बेकार में ही नहीं किया जाता बल्कि इसके द्वारा संस्था के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
यह एक वायदे के रूप में होता है।
प्रबंधक द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय एक वायदा होता है अर्थात निर्णयन के माध्यम से प्रबंधक यह कहता है कि उसके द्वारा लिए गए निर्णय के अच्छे परिणाम होंगे।
यह मूलरूप से एक मानवीय क्रिया है। निर्णयन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एक मानवीय क्रिया है। निर्णय मनुष्य द्वारा लिए जाते हैं और मनुष्यों के लिए ही लिए जाते हैं।
यह प्रबन्धकीय कार्य एवं संस्थागत प्रक्रिया दोनों हैं। क्योंकि निर्णय लेना सभी प्रबन्धकों का मुख्य दायित्व है इसलिए यह एक प्रबन्धकीय कार्य है। इसे संस्थागत प्रक्रिया इसलिए कहा जाता है
क्योंकि अनेक ऐसे निर्णय होते हैं जो अकेला प्रबंधक नहीं ले सकता बल्कि उनके लिए प्रबन्धकों के समूह या समिति की जरुरत होती है।
यह नियोजन का केन्द्र बिंदु है यद्यपि निर्णयन की आवश्यकता सभी प्रबन्धकीय कार्यों के लिए होती है लेकिन नियोजन पूर्वतः निर्णयन पर ही आधारित है, क्योंकि यहीं पर मुख्य निर्णय लिए जाते हैं। नियोजन के अंतर्गत जब उद्देश्य, नीतियों, कार्यविधियों, नियमों आदि को निश्चित किया जाता है तो निर्णयन का विशेष महत्व होता है।
यह कार्यवाही को प्रारम्भ करते हैं। जब कोई समस्या उत्पन्न होती है तो काम एकदम से रुक जाता है और जब तक कोई निर्णय नहीं ले लिया जाता तब तक काम प्रारम्भ नहीं हो सकता। इस प्रकार निर्णय लेने पर ही भावी कार्यवाही प्रारम्भ होती है।
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