निर्णयन प्रक्रिया - decision making process

निर्णयन प्रक्रिया - decision making process


निर्णयन को प्रायः अनेक विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ के चयन के रूप में परिभाषित किया जाता है। अतः निर्णयन एक चयनात्मक क्रिया है। उचित विकल्प का चयन करने के लिए, समस्या की जानकारी प्राप्त करने से लेकर अंतिम निर्णय लेने व उसे लागू करने तक एक लंबे रास्ते को पूरा करना होता है। यह लंबा रास्ता अथवा उठाए जाने वाले विभिन्न कदम ही निर्णयन प्रक्रिया कहलाते हैं। निर्णय लेने की प्रक्रिया को दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम, परंपरागत प्रक्रिया तथा द्वितीय, वैज्ञानिक प्रक्रिया परंपरागत प्रक्रिया के अंतर्गत प्रबंधक अपने सीमित ज्ञान, अनुभव एवं अनुमानों के आधार पर निर्णय लेते हैं और इसमें किसी निश्चित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है। दूसरी ओर, निर्णय लेने की वैज्ञानिक प्रक्रिया के अंतर्गत प्रबंधक अंतिम परिणाम तक पहुंचने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करते हैं अर्थात एक के बाद एक अनेक सीढ़ियां पार करके ही मंजिल तक पहुंचा जाता है। सफल निर्णय हेतु अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक निर्णयन प्रक्रिया निम्नलिखित है: 


(I) समस्या की व्याख्या निर्णयन प्रक्रिया का पहला कदम उस समस्या की जानकारी प्राप्त करना है, जिसके संदर्भ में निर्णय लिया जाना है। सबसे पहले यह देखना होगा कि समस्या की बात कहां से शुरु हुई। प्रायः पूर्व निर्धारित उद्देश्यों एवं वास्तविक कार्य प्रगति में अंतर आ जाने के कारण ही समस्या प्रारम्भ होती है। अब यह देखना होगा कि परिणामों में अंतर का क्या कारण है? यदि इस अंतर का सही पता लग जाए तो समस्या का समाधान ढूंढना सरल हो जाता है।


(ii) समस्या का विशलेषणः समस्या को परिभाषित कर लेने के बाद प्रबंधक द्वारा इसका विश्लेषण किया जाता है। विश्लेषण के अंतर्गत यह निश्चित किया जाता है कि समस्या के संबंध में किन-किन सूचनाओं की जरुरत होगी और ये सूचनाएं कहां से उपलब्ध होंगी।

उदाहरणार्थ, विक्रय में कमी की समस्या के लिए समालोचक तत्व माल की किस्म को माना गया है। अब यहां पर माल की घटिया किस्म का विश्लेषण करने के लिए जिन सूचनाओं की आवश्यकता होगी, वे इस प्रकार हो सकती हैं- क्या घटिया किस्म के कच्चे माल का क्रय किया गया था, क्या मशीनों ने ठीक प्रकार से काम नहीं किया, क्या आपूर्तीकर्ताओं ने जानबूझ कर घटिया कच्चा माल भेजा है, क्या कर्मचारियों में प्रशिक्षण की कमी है, क्या गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी ने लापरवाही की है, आदि। माना कि समस्या के विश्लेषण के आधार पर यह जानकारी प्राप्त हुई कि मशीनों में खराबी होने के कारण माल वांछित किस्म का तैयार नहीं हो सका।


समस्या के विश्लेषण के संबंध में यह समझ लेना जरुरी है कि सभी सूचनाओं का प्राप्त होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह जानना कि कौन-कौन सी सूचनाएं उपलब्ध नहीं हुई हैं

ताकि अंतिम निर्णय लेते समय उपलब्ध न हुई सूचनाओं को निर्णय की सीमाओं के रूप में स्वीकार कर लिया जाएँ और इन्हीं सीमाओं को लेकर निर्णय में जोखिम का निर्धारण किया जा सके अर्थात यदि कोई सूचना उपलब्ध न हो सके तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि निर्णय नहीं लिया जा सकता। निर्णय तो लिया ही जाएगा लेकिन उसमें वांछित सूचनाओं की कमी के कारण सर्वोत्तम निर्णय न लिए जाने का जोखिम रहेगा। अतः केवल यह पता लग जाए कि कौन-कौन सी सूचनाएं प्राप्त नही हुई हैं तो उनके महत्व को देखते हुए निर्णय में जोखिम की मात्रा निर्धारित की जा सकती है।


(iii) विकल्पों का विकास निर्णयन प्रक्रिया का तीसरा कदम विभिन्न विकल्पों का विकास करना है जब समस्या को परिभाषित किया जा चुका है और उसके कारणों का गहन अध्ययन भी हो चुका हो तो अब प्रश्न उठता है

कि समस्या के संभावित समाधान क्या-क्या हैं? एक समस्या के समाधान के रूप में अनेक विकल्प हो सकते हैं। यदि किसी समस्या के समाधान के रूप में केवल एक विधि उपलब्ध है तो फिर निर्णय लेने की आवश्यता ही नहीं होगा क्योंकि वह विधि अपने-आप में निर्णय ही है।


निर्णयन प्रक्रिया में लिए गए उदाहरण को विकल्पों के विकास के संदर्भ में आगे बढ़ते हुए यह देखना होगा कि माल की घटिया किस्म के लिए जिम्मेदार मशीनों की कमी को दूर करने के लिए क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं। मशीनों की कमी को दूर करने के संभावित विकल्प इस प्रकार हो सकते हैं

यदि मशीनें बहुत पुरानी नहीं हैं तो उनकी मरम्मत करवा कर काम चल सकता है, यदि मशीनें पुरानी हैं तो नई मशीनें क्रय की जा सकती हैं, यदि मशीनें अधिक लागत की होने के कारण उनको क्रय करना संस्था की पहुंच से बाहर हो, तो उन्हें किराए पर लिया जा सकता है आदि। अतः विकल्पों का विकास करते समय सीमित घटकों को ध्यान में रखा जाना जरुरी है। मशीन की अधिक लागत वाले विकल्प में वित्त सीमित घटक हैं जो प्रबंधक को इस विकल्प को छोड़ने पर मजबूर कर सकता है।


एक प्रबंधक विकल्पों की खोज करते समय अनेक स्रोतो का प्रयोग कर सकता है, जैसे - अपना पूर्व का अनुभव, दूसरों द्वारा अनपाए गए तरीके तथा एकदम नया विचार |


(iv) विकल्पों का मूल्यांकनः विभिन्न विकल्पों को ढूंढने के बाद अगला कदम विकल्पों का मूल्यांकन करना है ताकि सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव किया जा सके। विकल्पों के मूल्यांकन के अंतर्गत उनके गुणों एवं दोषों का अध्ययन किया जाता है। मूल्यांकन करने पर प्रबंधक को विभिन्न विकल्पों में निहित जोखिम की जानकारी प्राप्त होती है।


विकल्पों का मूल्यांकन समय एवं मुद्रो के संदर्भ में किया जाना चाहिए और केवल उस विकल्प का ही चयन करना चाहिए जो सर्वाधिक मितव्ययी हो। मूल्यांकन का कार्य सरल हो जाता है यदि एक विकल्प अन्य विकल्पों की अपेक्षा अधिक अच्छा हो दूसरी ओर एक ही स्तर के अधिक विकल्प प्राप्त होने पर समस्या गम्भीर हो जाती है। ऐसी स्थिति में उनका और गहराई से अध्ययन किया जाता है।

ऐसा भी हो सकता है कि कोई भी विकल्प स्वीकार्य न करना भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसी स्थिति में प्रबंधक को किसी और उपयुक्त विकल्प की खोज करनी चाहिए।


(v) सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयनः विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक विकल्प प्रस्तुत समस्या के समाधान में कहां तक सहायक हो सकता है। निर्णयन प्रक्रिया के पांचवें चरण पर विभिन्न विकल्पों के संभावित परिणामों की तुलना करके सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता है। सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करते समय प्रबंधक अपने अनुभव एवं प्रयोग की सहायता लेता है। प्रबंधक अपने अनुभव की सहायता तब ले सकता है जबकि उसे पहले कभी इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा हो।

कई बार विकल्पों को व्यवहार में प्रयोग करके देखा जाता है और अनुकूल परिणाम प्राप्त होने पर ही उनके बारे में विचार किया जाता है। प्रस्तुत उदाहरण में माना कि माल की गुणवत्ता को सुधारने के लिए मशीनों की मरम्मत करवाने का विकल्प चुना गया। इस प्रकार किसी विकल्प का अंतिम चयन करने को निर्णय कहते हैं। यहां पर निर्णय तो ले लिया गया है लेकिन निर्णयन प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है। इसके बाद भी निर्णय को लागू करना और उसके प्रभाव को रखना जरुरी है।


(vi) निर्णय को लागू करना : जब एक बार विकल्प का चयन कर लिया गया है तो इसके पश्चात अगला कदम उसे प्रभावशाली ढंग से लागू करना है।

क्योंकि निर्णय को प्रभावशाली बनाने के लिए अन्य लोगों की कार्यवाही की आवश्यकता है। (प्रबंधक निर्णय लेता है कार्यवाही नहीं करता) इसलिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।


(क) प्रभावशाली संदेशवहन निर्णय का प्रभावशाली संदेशवहन जरुरी है। इसकी स्पष्ट सूचना उन सभी व्यक्तियों तक पहुंचा देनी चाहिए जो इसको कार्यवाही में परिवर्तित करेंगे अर्थात निर्णय को वास्तविक रूप देंगे।


(ख) कर्मचारियों की स्वीकृति प्राप्त करना निर्णय को प्रभावशाली ढंग से लागू करने के लिए संबंधित कर्मचारियों से स्वीकृति लेना भी जरुरी है।

कर्मचारियों की स्वीकृति एवं सहयोग प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि विभिन्न विकल्पों का विकास करते समय उनसे सलाह ली जाए।


(ग) निर्णय लागू करने का ठीक समयः प्रत्येक निर्णय कुछ न कुछ परिवर्तन लाता है और कर्मचारी का स्वभाव परिवर्तन का विरोध करना होता है। इसीलिए निर्णय उसी समय लागू करना चाहिए जब सब कुछ ठीक-ठाक हो अर्थात उसके विरोध किए जाने का कोई डर न हो


(vii) अनुसरण निर्णयन प्रक्रिया का अंतिम चरण अनुसरण करना है।

जैसे ही निर्णय को कार्यवाही में बदला जाता है तो परिणाम आना शुरु हो जाते हैं। ये परिणाम आवश्यक रुप से इच्छित वांछित / अपेक्षित परिणामों के अनुकूल होने चाहिए। वास्तविक और इच्छित परिणामों के अंतर को देखने से यह पता चलता है कि निर्णय को उचित रूप में लागू कर दिया गया है या नहीं। यदि परिणाम अच्छे नहीं हैं तो इसका अभिप्राय यह है कि फिर से एक समस्या आ खड़ी हुई हैं और निर्णय प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करना होगा। इस प्रकार पहले लिए गए निर्णय में संशोधन करना होगा, पुनः उसके परिणाम की जांच की जाएगी और यदि परिणाम अनुकूल हैं तो निर्णय को लागू रहने दिया जाएगा। लेकिन विपरीत परिणाम आने पुनः पर संशोधन की जरुरत होगी। अतः अनुसरण भी निर्णयन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है।