प्रबंधन की विभिन्न विचारधाराएँ - different ideologies of management
प्रबंधन की विभिन्न विचारधाराएँ - different ideologies of management
प्रबंधन का प्रचलन उतना ही पुराना है जितनी कि मानव सभ्यता। विशेषकर जब से मनुष्य समूहों में काम करने लगे हैं, इसकी आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। जब अनेक व्यक्ति समूह में काम करते हैं तो उनकी क्रियाओं को सुचारु रूप से चलाने के लिए उनका प्रबंधन करना आवश्यक है। प्रबंधन का जो स्वरूप हम आज देख रहे हैं, यह प्रारम्भ से ही ऐसा नहीं था। समय-समय पर अनेक प्रबंधन विशेषज्ञों ने अपने प्रयोगों एवं अनुभव के आधार पर प्रबंधन के बारे में अलग- अलग विचार व्यक्त किए हैं। कुछ प्रबंधन विशेषज्ञों ने भौतिक साधनों को अधिक महत्व दिया है तो कुछ ने मानवीय साधन को इसके अतिरिक्त कुछ प्रबंधन विशेषज्ञों ने प्रणाली अध्ययन पर जोर दिया है। प्रबंधन के संबंध में व्यक्त किए गए इन तीनों विचारों का संबंध निर्णय से है।
अर्थात पहले विचार के अनुसार, प्रबन्धकों द्वारा निर्णय लेते समय भौतिक साधनों पर प्राथमिकता दी जाती है। दूसरे विचार के अनुसार, मानवीय साधनों पर प्राथमिकता दी जाती हैं, तीसरे विचार के अनुसार निर्णय लेते समय प्रबन्धकों द्वारा सभी संबंधित तत्वों को ध्यान में रखा जाता है।
जैसे - जैसे प्रबंधन के बारे में नये-नये विचार प्रस्तुत किए जा रहे प्रबंधन विचारधारा का विकास होता रहा। प्रबंधन विचारधारा के विकास की प्रक्रिया को निम्नलिखित तीन शीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है:
परंपरागत दृष्टिकोण:
प्रबंधन का परंपरागत दृष्टिकोण सन 1940 के आस-पास विकसित हुआ।
इस दृष्टिकोण के अंतर्गत विकसित हुए सिद्धांतों को आज भी स्वीकार किया जाता है। इस दृष्टिकोण की यह मान्यता है कि मानव उत्पादन का एक निष्क्रिय संसाधन है और इसे नियंत्रित किया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त इसकी यह भी मान्यता है कि कर्मचारी आर्थिक प्रेरणाओं से अभिप्रेरित होते हैं। इस दृष्टिकोण की तीन शाखाएँ हैं-
वैज्ञानिक प्रबन्ध
प्रशासनिक प्रबन्ध
नौकरशाही प्रबन्ध
इन्हें परंपरागत दृष्टिकोण के स्तंभ भी कहा जाता है। अब हम इनका विस्तृत
अध्ययन करेंगे वैज्ञानिक प्रबंध 1
वैज्ञानिक प्रबंधन दृष्टिकोण के जन्मदाता फ्रेडरिक डब्लयु टेलर है। वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धांतों को विकसित करने में टेलर के अतिरिक्त फ्रैंक व लिलियन गिलब्रेथ हेनरी एल. गैट, तथा हेरिंगटन इमरसन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। अब हम इन चारों प्रबंधन विशेषज्ञों के वैज्ञानिक प्रबंधन में योगदान की व्याख्या करेंगे। टेलर का योगदान
(क) एफ.डब्लयू. टेलर एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो थोड़े ही समय ( 1878-1884 ) में एक साधारण श्रमिक से मुख्य इंजीनियर के पद पर पहुंचे। सन 1878 में ये एक श्रमिक के रूप में अमेरिका की मिडवेल स्टील कम्पनी में भर्ती हुए और अपनी लगन एवं मेहनत के कारण 6 वर्ष की अल्प अवधि में (सन 1884 में इसी कम्पनी में मुख्य इंजीनियर के पद पर पहुंच गए। इस अवधि में टेलर ने अनेक प्रयोग किए और यह पाया कि एक श्रमिक को जितना काम करना चाहिए वह उससे बहुत कम काम करता है। इस समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक सुझाव दिए और अंततः प्रबंधन को वैज्ञानिक रूप दिया। सन 1901 तक बीथलहैम स्टील वर्क्स में काम करने के उपरांत उन्होंने प्रबंधन परामर्शदाता के रूप में अपनी सेवाएँ देनी प्रारम्भ की। सन 1903 में उनका एक शोध पत्र कारखाना प्रबंधन के नाम से प्रकाशित हुआ। सन 1911 में इनकी वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धांत नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसने प्रबंधन जगत में तहलका मचा दिया था ।
वार्तालाप में शामिल हों