प्रभावपूर्ण समन्वय के आवश्यक तत्व - Essential Elements of Effective Coordination

प्रभावपूर्ण समन्वय के आवश्यक तत्व - Essential Elements of Effective Coordination


(i) उद्देश्यों की स्पष्ट व्याख्या प्रत्येक व्यावसायिक उपक्रम कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ती के लिए किया जाता है। इन उद्देश्यों की पूर्ती हेतु सामूहिक प्रयासों में उचित तालमेल होना आवश्यक है। प्रयासों में तालमेल के लिए यह जरुरी है कि व्यवसाय का प्रत्येक विभाग, उपविभाग एवं व्यक्ति निर्धारित लक्ष्यों से परिचित हो और उन्हें ठीक प्रकार से समझते हों। दो व्यक्तियों एव विभागों के बीच समन्वय की स्थापना उस समय उग्र रुप धारण कर लेती है जब वे समान उद्देश्यों के लिए प्रयत्नशील न हों। टैरी का मत है, प्रयासों में एकता लाने के लिए उद्देश्यों में समानता आवश्यक है।" उद्देश्यों में समानता के लिए उनकी स्पष्ट व्याख्या अति आवश्यक है।


(ii) उचित संगठन संरचना :- यह निर्विवाद सत्य है कि एक अच्छी संगठन सरंचना उपक्रम में समन्वय की स्थापना में सहायक सिद्ध होती है। इसीलिए अनेक विद्वानों ने इस बात पर बल दिया है कि संगठन संरचना समन्व के सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए। अर्ल पी. स्ट्रांग ने कहा है कि, "विभाग का सामूहीकरण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि कार्य एक विभाग से दूसरे विभाग को सरलता से निरंतर मिलता रहे। आवश्यकता से अधिक मात्रा में विशिष्टीकरण का परिणाम समन्वय की समस्याओं को अनावश्यक रूप से बढ़ावा देना होता है।"


(iii) अधिकार एवं दायित्व की स्पष्ट रेखाएं :- व्यवसाय के कुशल प्रबंधन के लिए अनेक व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं

कार्य को सुचारु रूप से करने के लिए आवश्यक अधिकार और उत्तरदायित्व दिए जाते हैं। व्यवहार में यह देखा गया है कि प्रबंधन के विभिन्न स्तरों पर अधिकारों के बंटवारे एवं उनके उपयोग के संबंध में अनेक विवाद उत्पन्न हो जाते हैं फलस्वरुप उनकी क्रियाओं के मध्य समन्वय स्थापित करना समस्या बन जाता है। जहां तक एक ओर प्रबंधक अधिक से अधिक अधिकार लेने का प्रयत्न करते हैं, वहीं वे उत्तरदायित्वों से बचने का प्रयत्न करते हैं। परिणामस्वरुप हानि होने पर उनका उत्तरदायित्व किसी अन्य व्यक्ति पर डाल दिया जाता है जिसे ज्ञात करना कठिन हो जाता है। इसके कारण व्यवसाय अस्त-व्यस्त हो जाता है। अतः प्रभावी समन्वय के लिए निम्न बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए :


(क) प्रत्येक अधिकारी का क्षेत्र स्पष्ट होना चाहिए। जिससे कि कार्य की उपेक्षा की जिम्मेवारी निश्चित की जा सके।


(ख) प्रत्येक अधिकारी को अपने अधिकार क्षेत्र की जानकारी के साथ-साथ अन्य सहयोगियों व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का ज्ञान होना चाहिए जिससे कि वह व्यवसाय की समस्याओं को अधिक गहनता से समझ सकें।


(ग) परस्पर व्यापी अधिकार कम से कम होने चाहिए।


(घ) अधिकार उन्हीं को दिए जाने चाहिए जो उत्तरदायित्व को ग्रहण करने में तत्परता दिखाते हैं।


(iv) प्रभावपूर्ण संप्रेषण व्यवस्था :- अधिकार एवं उत्तरदायित्व का स्पष्टीकरण और वर्तमान समन्वय व्यवस्था का निरीक्षण विभिन्न संप्रेषण विधियों द्वारा ही संभव है।

अतः प्रभावपूर्ण समन्वय के लिए प्रभावपूर्ण संप्रेषण विधियों का उचित उपयोग भी आवश्यक है। जैसे समितियों का गठन, बैठकों और सम्मेलनों द्वारा सामूहिक निर्णय संलेख, रिपोर्ट एवं अन्य दूसरे के व्यक्तिगत संपर्क डिमोक के शब्दों में, स्टाफ सभाएं उपस्थित व्यक्तियों के व्यवसाय के कार्य के प्रति निष्ठा भाव जागृत करती हैं उन्हें अपने कार्यों को प्रभावित करने वाली नवीनतम समस्याओं से अवगत कराती हैं. समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न सदस्यों के विचार ज्ञात होते हैं और उनका सहयोग प्राप्त किया जाता है।"


(v) जांच एवं निरीक्षण की व्यवस्था प्रभावपूर्ण समन्वय के लिए व्यवसाय में संबंधित अधिकारियों की क्रियाओं की जांच एवं निरीक्षण व्यवस्था का होना भी अत्यन्त आवश्यक है।

इसके होने से समन्वय प्रयास का विरोध करना अथवा उसका दुर्बल बनाने वाले अधिकारियों की क्रियाओं पर आवश्यक नियंत्रण किया जा सकता है।


(vi) कुशल नेतृत्व - प्रभावपूर्ण समन्वय के लिए कुशल नेतृत्व का होना भी अत्यन्त आवश्यक है। जहां तक संभव हो व्यवसाय का नेतृत्व किसी एक व्यक्ति के हाथ में हो, क्योंकि एक से अधिक नेता होने पर अनेक प्रकार के भ्रम एवं अनिश्चितता का भय रहता है। यही नहीं अधीनस्थों के लिए यह निश्चित करना भी कठिन हो जाता है कि वे किस अधिकारी के आदेशों का पालन करें। अतः परम सत्ता के रुप मे भी व्यवसाय का एक नेता होना ही वांछिनीय है और वही व्यवसाय का सर्वोच्च समन्वय अधिकारी भी होता है।