वस्तुओं अथवा सेवाओं के आधार पर विभागीकरण करने के गुण एवं दोष निम्न - Following are the merits and demerits of departmentalization on the basis of goods or services

वस्तुओं अथवा सेवाओं के आधार पर विभागीकरण करने के गुण एवं दोष निम्न - Following are the merits and demerits of departmentalization on the basis of goods or services


गुण


(0 प्रत्येक वस्तु को समान महत्व दिया जाना संभव होता है।


(ii) प्रत्येक वस्तु से होने वाले लाभ-हानि की अलग-अलग जानकारी प्राप्त होती है।


(ii) क्योंकि प्रत्येक नई वस्तु के लिए अलग से विभाग खोला जा सकता है इसलिए


संस्था के विस्तार में सरलता आती है। सभी विभाग स्वतंत्र इकाई के रूप में होते हैं। अतः एक की कमजोरी से दूसरा विभाग प्रभावित होता है। (iv)


(v) इस पद्धति में प्रबंधकों का पूर्ण विकास संभव होता है।


(vi) (vii) प्रबंधकों को अपनी योग्यता सिद्ध करने का पूरा अवसर मिलता है। सभी वस्तु विभागों के प्रबंधकों द्वारा, दूसरों से अच्छे परिणाम दिखाने की प्रतियोगिता


का संस्था को लाभ प्राप्त होता है।


(viii) विशिष्टीकरण के लाभ प्राप्त होते हैं।


■ दोष


(i) सभी वस्तु विभागों में कार्यों के दोहराव से प्रबंधकीय लागतें बढ़ती हैं।


(ii) साधनों का अपव्यय होता है।


यह पद्धति केवल बड़ी संस्थाओं के लिए उपयोगी है।


उच्च स्तर पर नियंत्रण में कठिनाई आती है।


क्षेत्र के आधार पर


जब किसी व्यवसायिक संस्था के ग्राहक स्थानीय क्षेत्र तक सीमित न होकर एक बड़े क्षेत्र में फैले हों तो क्षेत्र के आधार पर विभागीयकरण किया जाता है। इस तरह विभागीयकरण करने का मुख्य कारण अलग-अलग क्षेत्रों के ग्राहकों की रुचियों, समस्याओं आदि का अलग-अलग होना है उदारणार्थ,

यदि एक संस्था का व्यवसाय पूरे देश में फैला हो तो व्यवसाय का संचालन एक ही स्थान पर करने की अपेक्षा उसे चार क्षेत्रों में बांटा जा सकता है, जैसे-उत्तरी जोन, दक्षिणी जोन, पूर्वी जोन तथा पश्चिमी जोन । प्रत्येक जोन अपने आप में एक संपूर्ण व्यावसायिक इकाई के रूप में होता है, जिसके लिए अलग से क्षेत्रीय प्रबंधक नियुक्त किया जाता है। क्षेत्रीय प्रबंधक अपने क्षेत्र के ग्राहकों के संपर्क में रहते हैं और उनकी समस्याओं को भली प्रकार समझते हुए उन्हें आसानी से दूर करते हैं। प्रत्येक क्षेत्र अपने क्षेत्र के अंतर्गत पुनः कार्यानुसार अथवा वस्तुओं के अनुसार विभागीयकरण किया जा सकता है जैसा कि चित्र में स्पष्ट किया गया है।



क्षेत्र के आधार पर विभागीयकरण करने के गुण एवं दोष निम्नलिखित हैं :


गुण


ग्राहकों से सीधा संपर्क होने के कारण उनकी समस्याओं को आसानी से समझा एवं दूर किया जा सकता है।


(ii) स्थानीय प्रतियोगिता का सामना आसानी से किया जा सकता है।


(iii) प्रभावपूर्ण क्षेत्रीय नियंत्रण संभव होता है।


(iv) इस तरह के संगठन को कुछ स्थानीय तत्वों, जैसे कच्चा माल, श्रमिक, बाजार के लाभ प्राप्त होते हैं।


(v) क्षेत्रीय लाभ-हानि की जानकारी प्राप्त होने पर अधिक लाभ देने वाले क्षेत्र में अधिक


विनियोग संभव होता है। क्षेत्रीय प्रबंधकों की अच्छे परिणाम दिखाने की प्रतियोगिता का संस्था को लाभ पहुचता है।


• दोष


कुछ ऐसे कार्य जिनको केन्द्रिय स्तर पर मितव्ययी ढंग से किया जाता है। उनको सभी क्षेत्रों में अलग-अलग करने से खर्चे बढ़ते हैं।


(ii) नीतियां बनाने वालों एवं उनको लागू करने वालों में दूरी होने के कारण, नीतियों को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने में कठिनाई आती है।


(iii) अधिक प्रबंधकीय कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है जिससे प्रबंधकीय खर्चे बढ़ते हैं।


(iv) मुख्य कार्यालय एवं क्षेत्रीय कार्यालयों में अधिक दूरी होने के कारण नियंत्रण में कठिनाई आती है।



प्रक्रिया के आधार


विभागीयकरण का यह आधार उन औद्योगिक संस्थाओं में लाभकारी होता है जिनकी उत्पादित वस्तुएं अनेक प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हैं। उदाहरणार्थ, एक कपड़ा बनाने वाली संस्था में कताई, बुनाई, रंगाई एवं छपायी तथा पैकिंग विभाग बनाए जा सकते हैं। सभी विभागों में अलग-अलग प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए अलग-अलग मशीनों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें विशेष योग्यता वाले व्यक्ति चलाते हैं। प्रक्रिया के आधार पर विभागीकरण को निम्न चित्र में दिखाया गया है।