प्रक्रिया के आधार पर विभागीयकरण के गुण एवं दोष निम्नलिखित - Following are the merits and demerits of departmentalization on the basis of process
प्रक्रिया के आधार पर विभागीयकरण के गुण एवं दोष निम्नलिखित - Following are the merits and demerits of departmentalization on the basis of process
गुण
0 मानवीय शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग किया जा सकता है।
(ii) विशेषज्ञ कर्मचारियों की नियुक्ति की जा सकती है।
(iii) किसी विभाग में उत्पादित माल की लागत अधिक आने पर उस विभाग को बंद करे, वही माल बाजार से खरीदा जा सकता है।
(iv)
किसी विभाग में उत्पादित माल की लागत बहुत आने पर उसका विस्तार करके उससे उत्पादित माल बाजार में बेचकर लाभ कमाया जा सकता है। • दोष
विभागीयकरण की इस पद्धति में सभी विभाग एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। अतः एक विभाग में कार्य बंद होने से अन्य विभाग भी बंद हो जाते हैं। एक विभाग द्वारा घटिया किस्म का माल उत्पादित करने से अन्य विभागों द्वारा उत्पादित माल की किस्म भी घटिया हो जाती है।
(ङ)
ग्राहकों के आधार पर
विभागीयकरण की यह पद्वति उन व्यावसायिक संस्थाओं में प्रयोग की जाती है जहां अनेक प्रकार के ग्राहकों के साथ व्यवहार करना होता है
जैसे एक व्यावसायिक संस्था थोक व्यापार, फुटकर व्यापार एवं निर्यात व्यापार करती है तो इसमें तीनों प्रकार के ग्राहकों के लिए तीन अलग-अलग विभाग बनाए जा सकते हैं जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।
गुण
सभी ग्राहकों को पूरी तरह संतुष्ट किया जा सकता है। अलग-अलग प्रकार के ग्राहकों से सीधा संपर्क होने के कारण उनकी समस्याओं का शीघ्र निवारण किया जा सकता है।
(ii)
दोष
0 विभागों के आकार में अधिक अंतर होते हुए भी सभी को एक जैसी सुविधाएं (प्रबंधको एवं अन्य कर्मचारियों के रूप में) प्रदान करने से लागतें बढ़ती हैं।
(ii) ग्राहकों के अनेक प्रकार होने के कारण उम्पादित वस्तुओं की संख्या बढ़ जाती है। जिससे उत्पादन विभागों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। समन्वय में कठिनाई आती है।
(iii)
(च) मैट्रिक्स के आधार पर
विभागीयकरण का यह आधार उन व्यावसायिक संस्थाओं के लिए उपयुक्त है जिसमें किए जाने वाले कार्य जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं, जैस एक इंजीनियरिंग कम्पनी को प्रतिदिन नई मशीनें बनाने के आदेश प्राप्त होते रहते हैं। इसी प्रकार एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी को भवन, सड़कें, पुलों आदि के निर्माण का कार्य मिलता रहता है।
ऐसी संस्थाओं में विभागीकरण का कोई एक आधार काम नहीं करता बल्कि एक ही साथ दो या अधिक आधारों का प्रयोग करना पड़ता है। इसीलिए इसे सामूहिक, ग्रिड आदि नामों से भी जाना जाता है।
इसके अंतर्गत प्रायः कार्य के अनुसार एवं वस्तुओं का संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है। सर्वप्रथम, कम्पनी की सभी क्रियाओं को संगठन के स्थाई विभागों को साँप दिया जाता है। जैसे- क्रय विभाग, निर्माणी विभाग, शोध एवं विकास विभाग आदि । इन सभी विभागों की स्थापना हो जाने पर जैसे ही संस्था को कोई कार्य मिलता है तो वस्तुओं अथवा प्रोजेक्ट के आधार पर विभागीयकरण कर दिया जाता है।
जैसा कि निम्न चित्र में स्पष्ट किया गया है:
जैसे ही कम्पनी को कोई विशेष कार्य मिलता है तो एक प्राजेक्ट प्रबंधक के नेतृत्व में विभिन्न कार्यानुसार विभागों से अधिकारियों को लेकर एक टीम का गठन कर दिया जाता है। जैसे कम्पनी को एक्स प्रोजेक्ट के मिलने पर इसके एक अलग से प्रबंधक नियुक्त कर दिया जाता है जिसको क्रय अधिकार निर्माण अधिकारी वित्त अधिकारी तथा शोध एवं विकास अधिकारी सहयोगी के रूप में दे दिए जाते हैं। प्रोजेक्ट 1 की सारी जिम्मेदारी संबंधित प्रबंधक की रहती है और जैसे ही एक्स प्रोजेक्ट का काम पूरा होगा तो प्रोजेक्ट के आधार पर किया गया यह विभागीयकरण समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार 2 तथा 3 प्रोजेक्टों का कार्य चलेगा। जो अधिकारी प्रोजेक्ट प्रबंधक के सहयोगी के रूप में उपलब्ध कराए जाते हैं
वे प्रोजेक्ट का काम पूरा होने पर पुनः अपने पैतृक विभाग में चले जाते है।
प्रोजेक्ट प्रबंधक का उसके टीम के सदस्यों पर अधिकार अस्थाई होता है। जैसा कि चित्र में बिन्दुवार लाईन के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। मुख्य प्रबंधक की ओर से कार्यानुसार बनाए गए विभागों का यह आदेश होता है कि वे प्रोजेक्ट प्रबंधकों को पूरा सहयोग दें। प्रोजेक्ट प्रबंधक सभी कार्यों का विशेषज्ञ होता है और वह एक प्रोजेक्ट से संबंधित सभी गतिविधियों को देखता है। दूसरी ओर, विभागीय प्रबंधक किसी एक विशेष कार्य के ही विशेषज्ञ होते हैं।
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