फेयोल के अनुसार प्रबंधन के कार्य - Functions of Management according to Fayol
फेयोल के अनुसार प्रबंधन के कार्य - Functions of Management according to Fayol
नियोजन, संगठन, समन्वय, आदेश देना तथा नियंत्रण
• फेयोल के अनुसार प्रबंधन के सिद्धान्त
> कार्य विभाजन
> अधिकार एवं दायित्व
> अनुशासन
> आदेश की एकता
> निर्देश की एकता
> व्यक्तिगत हित पर सामान्य हित को प्राथमिकता
> कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक
> प्रभावपूर्ण केन्द्रिकरण
> व्यवस्था अथवा क्रमबद्धता
> समता
> कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व > पहल- शक्ति
> सोपान की श्रृंखला तथा समतल संपर्क
> सहयोग की भावना
> प्रशासनिक प्रबंधन का मूल्यांकन
महत्व : फेयोल ने प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत
कुछ मुख्य विचार, जिनसे प्रबंधन जगत को बहुत लाभ हुआ है निम्नलिखित हैं:
प्रबंधन की सार्वभौमिकता
प्रबंधक पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं
केवल अधिकारों को सौंपा जा सकता है उत्तरदायित्व को नहीं
एक प्रबंधक के नियंत्रण का विस्तार चार या छः से अधिक नहीं होने चाहिए
एक व्यक्ति को केवल एक ही कार्य करना चाहिए।
ऊपर से नीचे तक अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा होना चाहिए आलोचना : कुछ प्रबंधन विषेशज्ञों ने फेयोल के विचारों का विरोध किया है। विरोध के समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित बातें कहीं है:-
फेयोल द्वारा प्रस्तुत किए गए सिद्धान्तों में विरोधाभास है।
ये सिद्धान्त अध्ययन पर आधारित नहीं हैं ।
ये सिद्धान्त संगठन का मशीनीकरण करते हैं। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि प्रशासनिक प्रबंधन की आलोचना अधिक व्यावहारिक नहीं है। फेयोल द्वारा प्रस्तुत किए गए सिद्धान्त आज भी अटल हैं और प्रबन्धकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
टेलर एवं फेयोल का तुलनात्मक अध्ययन
टेलर एवं फेयोल दोनों ही प्रख्यात विशेषज्ञ हुए हैं। प्रबंधन के क्षेत्र में दोनों का अमूल्य योगदान रहा है। टेलर एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है
जिन्होंने अपना जीवन एक श्रमिक के रूप में प्रारंभ किया था। यही कारण है कि उन्होंने श्रमिकों को काम करते हुए नज़दीक से देखा है। उनकी समस्याओं को समझा है तथा उनकी कार्यकुशलता के स्तर को पहचाना है। श्रमिकों की कार्यकुशलता के संबंध में टेलर ने अनेक प्रयोग किए और अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक श्रमिक को जितना काम करना चाहिए उससे बहुत कम काम करता है। श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए टेलर ने अनेक सुझाव दिए। टेलर के अध्ययन का केन्द्र श्रमिकों की कार्यकुशलता था। यही कारण है कि इन्हें कुशलता विशेषज्ञ के नाम से जाना जाता है।
इसके विपरीत, फेयोल ने अपना जीवन एक उच्च प्रबंधक के रूप में आरंभ किया।
यही कारण है कि उन्होंने उच्च प्रबन्धकों की समस्याओं को नज़दीक से देखा व समझा है। उच्च प्रबन्धकों की समस्याओं को दूर करने के लिए फेयोल ने अनेक अमूल्य सिद्धान्तों को जन्म दिया। फेयोल के अध्ययन का केन्द्र उच्च प्रबन्धकों की समस्यों होने के कारण ही इन्हें प्रशासन विषेशज्ञ के नाम से जाना जाता है। दोनों प्रबंधन विशेषज्ञों के प्रबंधन जगत में दिए गए योगदान में कुछ समानताएँ और कुछ असमानताएँ हैं। ये निम्नलिखित हैं:-
समानताएँ
टेलर व फेयोल के विचारों में निम्नलिखित बातों के संबंध में समानता पाई जाती है:- (1) प्रबन्धकीय समस्याओं का समाधानः दोनों प्रबंधन विषेशज्ञों ने अपने-अपने अनुभवों एवं प्रयोगों के आधार पर प्रबन्धकीय समस्याओं के समाधान प्रस्तुत किए हैं। दोनों द्वारा प्रस्तुत किए गए समाधान सिद्धांतों के रूप में विद्यमान है।
(2) व्यावहारिक पक्ष पर बल: टेलर व फेयोल दोनों का वास्तविक कार्य से सीधा संबंध था। यही कारण है कि उन्होंने हर कार्य के व्यावहारिक पक्ष पर बल दिया है। अर्थात जो सुधार संभव थे उन्होंने उन्हीं के संबंध में अपने सुझाव दिए हैं। उन्होंने ऐसा कोई भी सिद्धान्त प्रस्तुत नहीं किया जिसको व्यावहारिकता में न लाया जा सके। अच्छे औद्योगिक संबंधों पर बल दोनों का यह मत है कि यदि स्वामी व श्रमिकों में अच्छे संबंध स्थापित हो जाएं तो उद्देश्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। (3)
असमानताएँ
टेलर व फेयोल के विचारों में निम्नलिखित मतभेद हैं: (1) सिद्धान्तों का क्षेत्रः टेलर के सिद्धान्त उत्पादन क्रियाओं से संबंधित हैं जबकि फेयोल
के सिद्धान्त सभी प्रकार की प्रबन्धकीय क्रियाओं से संबंधित हैं। (2) सिद्धान्तों का नाम: टेलर ने अपने सिद्धान्तों को वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धान्तों के नाम से पुकारा है। दूसरी ओर, फेयोल ने अपने सिद्धान्तों को प्रशासन का सामान्य सिद्धान्त कहा है।
(3) सिद्धान्तों का उद्देश्य: टेलर के सिद्धान्तों का उद्देश्य श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि करना है । फेयोल के सिद्धान्तों का उद्देश्य प्रबन्धकों की प्रशासनिक कार्यकुशलता में वृद्धि करना है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि आज प्रबंधन जगत में अनेक परिवर्तन आ चुके हैं। इन्हीं परिवर्तनों के कारण टेलर के सिद्धान्त कुछ नजर आने लगे हैं। दूसरी ओर, फेयोल के सिद्धान्त आधुनिक परिवेश में एकदम खरे उतरते हैं लेकिन फिर भी टेलर के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता,
क्योंकि उनके सिद्धान्त भी किसी न किसी रूप में प्रबन्धकों का मार्गदर्शन अवश्य करते हैं।
(iv) नौकरशाही प्रबंध - इस विचारधारा का प्रतिपादन जर्मनी के मैक्स वैबर ने किया। वैबर के अनुसार, प्रबन्धकीय अनियिमताओं के समाप्त करने के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। बड़े संगठन में नौकरशाही प्रबंधन से ही सफलता मिलती है।
नौकरशाही प्रबंधन की विषेशताएँ
नौकरशाही प्रबंधन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(1) उचित कार्य विभाजनः उचित कार्य विभाजन का अभिप्राय, विशिष्टीकरण के आधार पर कार्य का निपटान करने से है। अर्थात जो व्यक्ति जिस कार्य का विशेषज्ञ हो उसे वही कार्य सौंपना चाहिए।
(2) स्पष्ट अधिकार श्रृंखलाः वरिष्ठ अधीनस्थ संबंधों को स्पष्टतः परिभाषित कर दिया जाना चाहिए। प्रत्येक कर्मचारी अपने तथा अपने अधिनस्थ द्वारा लिए निर्णय के लिए अपने बॉस के प्रति उत्तरदायी होता है।
(3) नियमों की व्यवस्थाः संगठन के अंदर लिए जाने वाले कार्यों के लिए स्पष्ट नियम बनाये जाने चाहिएं तथा उनका सख्ती से पालन भी किया जाना चाहिए।
(4) लोगों में व्यक्तिगत संबंध इस प्रबंधन विचारधारा के अंतर्गत व्यक्तिगत संबंधों को अनदेखा किया जाता है। पुरस्कार संबंधों के आधार पर नहीं बल्कि कुशलता के आधार पर दिए जाने चाहिए।
(5) पदोन्नति का आधार योग्यताः इस प्रबंधन विचारधारा के अनुसार, पदोन्नति का आधार योग्यता होना चाहिए।
इस प्रबंधन विचारधारा के गुण एवं दोष निम्नलिखित हैं:
गुण
• श्रम विभाजन से विशेषज्ञता प्राप्त होती है।
• कर्मचारियों के व्यवहार में नियमितता आती है।
पदोन्नति का आधार योग्यता को माने जाने के कारण कर्मचारियों की कुशलता वृद्धि होती है।
संगठन लगातार चलता रहता है क्योंकि व्यक्ति पर नहीं पदों पर ध्यान दिया जाता है ।
दोषः
■ कागजी कार्यवाही में वृद्धि
. लाल फीताशाही में वृद्धि
• आपसी संबंधों की भावना का कोई महत्व नहीं
• श्रमिकों में क्षमता का अभाव।
श्रमिकों द्वारा परिवर्तन का विरोध निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि नौकरशाही प्रबंधन का प्रयोग केवल उन संगठनों में किया जा सकता है जहां परिवर्तनों का प्रभाव न पड़ता हो अथवा परिवर्तन धीमी गति से होते हों अथवा परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता हो। ऐसा प्रायः सरकारी विभागों तथा बड़े व्यवसायिक संगठनों में होता है। दूसरी ओर एक परिवर्तनशील व्यवसायिक संगठन में नौकरशाही प्रबंधन को नहीं अपनाया जा सकता।
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