नियोजन का महत्व एवं सीमाएं नियोजन का महत्व - Importance and Limitations of Planning Importance of Planning
नियोजन का महत्व एवं सीमाएं नियोजन का महत्व - Importance and Limitations of Planning Importance of Planning
नियोजन प्रबंधन का प्रथम एवं सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसकी आवश्यकता प्रत्येक प्रबन्धकीय स्तर पर होती है। नियोजन के अभाव में किसी भी व्यवसायिक संस्था की सभी क्रियाएं अर्थहीन हो जाएंगी। संस्थाओं के आकार एवं जटिलताओं में वृद्धि होने के कारण नियोजन का महत्व और भी बढ़ गया है। नियोजन इसलिए भी एक महत्वपूर्ण कार्य बन गया है, क्योंकि आज व्यवसाय को एक ऐसे वातावरण में जीवित रहना पड़ता है जो अनिश्चित तथा निरंतर परिवर्तनशील है। नियोजन के अभाव में भविष्य की अनिश्चित घटनाओं का अनुमान लगाना असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य है।
एक व्यवसायिक संस्था में नियोजन का महत्व अथवा लाभ निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है:-
(क) नियोजन दिशा प्रदान करता है: नियोजन प्रक्रिया द्वारा संस्था के उद्देश्यों को सरल एवं स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि सभी कर्मचारियों को एक ऐसी दिशा मिल जाती है जिसकी ओर सभी के प्रयास केन्द्रित हो जाते हैं। इस प्रकार संस्था के मुख्य उद्देश्यों को प्राप्त करने में नियोजन का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
उदाहरण के लिए, माना एक कम्पनी नियोजन के अंतर्गत अपना बिक्री लक्ष्य निर्धारित करती है। अब सभी अन्य विभागः जैसे - क्रय, उत्पादन, सेविवर्गीय, वित्त, आदि बिक्री लक्ष्य के संदर्भ में ही अपने-अपने उद्देश्य निर्धारित करेंगे।
इस प्रकार सभी प्रबन्धकों का ध्यान अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति की ओर केन्द्रित हो जाएगा। जब सब अपने-अपने उद्देश्यों को पूरा कर लेंगे तो बिक्री लक्ष्य को प्राप्त करना निश्चित हो जाएगा। अतः उद्देश्यों के अभाव में संगठन अपंग हो जाता है और उद्देश्य का निर्धारण नियोजन के अंतर्गत ही किया जाता है।
(ख) नियोजन अनिश्चितता का जोखिम कम करता है: नियोजन सदैव भविष्य के बारे में किया जाता है और भविष्य अनिश्चित होता है। नियोजन द्वारा भविष्य में संभावित परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाकर विभिन्न क्रियाओं को अच्छे से अच्छे ढंग से नियोजित करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार नियोजन द्वारा भावी अनिश्चितताओं से होने वाले जोखिम को कम किया जाता है।
उदाहरण के लिए, बिक्री लक्ष्य निर्धारित करने से पहले बाजार सर्वेक्षण करके यह पता लगाया जा सकता है कि कितनी नई कम्पनियां प्रतियोगिता में उतरने वाली हैं। इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर भावी क्रियाओं को नियोजित करके संभावित संकट से छुटकारा पाया जा सकता है।
(ग) नियोजन आवश्यक क्रियाओं के छूटने व अपव्ययी क्रियाओं को कम करता है:- नियोजन के अंतर्गत उद्देश्य प्राप्ति के लिए भावी क्रियाओं का निर्धारण किया जाता है। फलस्वरुप, यह निश्चित हो जाता है कि कब, कहां, क्या व क्यों चाहिए। इससे अव्यवस्था व भ्रम की स्थिति समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में विभिन्न क्रियाओं व विभागों में समन्वय स्थापित होता है
जिससे यह संभावना खत्म हो जाती है कि किसी आवश्यक क्रिया को पूरा न किया जाए और अपव्ययी क्रियाएं होती रहे। परिणामतः अपव्यय शून्य की ओर चला जाता है, कुशलता बढ़ती है और लागतें अपने न्यूनतम स्तर पर आ जाती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि यह निश्चित हो जाए या कि किसी विशेष महीने में इतनी धनराशि की जरुरत होगी तो वित्त प्रबंधक समय पर व्यवस्था कर लेगा। इस जानकारी के अभाव में उस महीने में धनराशि आवश्यकता से कम या अधिक हो सकती है। दोनों ही स्थितियां अवांछनीय हैं। कम होने कर काम पूरा नहीं हो सकेगे और अधिक होने पर अनावश्यक रूप से नगदी पड़ी रहेगी और ब्याज की हानि होगी।
(ET) नियोजन नवीनतम विचार विकसित करता है: जैसा कि स्पष्ट है कि नियोजन में विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन किया जाता है। किसी कार्य को करने के लिए विभिन्न विकल्प स्वयं ही प्रबंधक के पास नहीं आ पाते बल्कि उनकी खोज करनी पड़ती है। इस प्रयास में नए-नए विचार सामने आते हैं तथा उनमें और अधिक निखार लाने के लिए उनका गहराई से अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार नियोजन से प्रबन्धकों में सोच विचार करने की शक्ति का संचार होता है और अंततः नव प्रवर्तन एवं सृजनशीलता को बढ़ावा मिलता है।
उदाहरण के लिए, एक कम्पनी अपने व्यवसाय का विस्तार करना चाहती है। यह विचार आते ही संबंधित प्रबंधक के मस्तिष्क में नियोजन की कार्यवाही शुरु हो जाएगी। वह कुछ इस प्रकार सोचेगा -
■ क्या पहले वाले उत्पाद की ही कुछ और किस्में तैयार की जाएं?
क्या थोक बिक्री के साथ-साथ फुटकर बिक्री भी की जाए ?
क्या अपने पुराने उत्पाद के लिए ही अन्य स्थानों पर शाखाएं खोली जाएं?
क्या किसी नए उत्पाद का बाजार में लाया जाए?
क्या अपने उत्पाद को इंटरनेट के माध्यम से भी बेचा जाए?
इस प्रकार एक के बाद अनेक विचार सामने आएंगे ऐसा करने पर यह प्रबंधक कुछ नया व रचनात्मक करने की सोचेगा।
कम्पनी के लिए यह एक सुखद स्थिति है, जो नियोजन के माध्यम से पैदा होती है।
(ङ) नियोजन निर्णयन में सहायक है: निर्णयन का अर्थ निर्णय लेने की प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत विकल्पों की खोज की जाती है तथा बेहतर विकल्प का चयन किया जाता है। नियोजन के अंतर्गत निर्णयन का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। यह विभिन्न विकल्पों के मूल्यांकन का आधार भी प्रस्तुत करता है। इस प्रकार नियोजन निर्णयन में सहायक है।
(च) नियोजन नियन्त्रण के लिए प्रमाण निश्चित करता है नियोजन द्वारा संस्था के उद्देश्यों को निर्धारित करके संस्था मे कार्यरत सभी विभागों एवं व्यक्तियों को बता दिया जाता है
कि उन्हें कब, क्या और किस प्रकार करना है। उनके कार्य, समय, लागत आदि के बारे में प्रमाप निश्चित कर दिए जाते हैं। नियन्त्रण में कार्य पूरा होने पर प्रमापित कार्य को असल में हुए कार्य के साथ माप करके विचलनों का पता लगाया जाता है। ऋणात्मक विचलन आने पर अर्थात कार्य इच्छानुसार पूरा न होने पर संबंधित व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जाता है।
उदाहरण के लिए, एक श्रमिक के लिए एक दिन में 10 ईकाई काम करना निश्चित किया जाता है (यह नियोजन की बात है) वह वास्तव में 8 इकाई काम करता है। इस प्रकार 2 इकाई का ऋणात्मक विचलन आता है। इसके लिए उसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा। (वास्तविक कार्य का माप, विचलन की जानकारी व श्रमिक को उत्तरदाया ठहराना नियंत्रण के अंतर्गत आता है) इस प्रकार नियोजन के अभाव में नियंत्रण संभव नहीं है।
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