वेतन की नीति का महत्व - Importance of salary policy

वेतन की नीति का महत्व - Importance of salary policy


व्यावहारिक जीवन में मजदूरी में अंतर पाया जाता है जो विभिन्न रोजगार, धंधों या जगहों में श्रमिकों के बीच या एक ही धंधे में काम करने वाले श्रमिकों के बीच होता है मजदूरी अंतर पैदा करने के कारण इस प्रकार है। वेतन की नीति के महत्व निम्न है-


(क) श्रम बाजार में अप्रतियोगी समूहों के होने के कारण मजदूरी अंतर- श्रमिक एकरूप नहीं होते, उनमें मानसिक तथा शारीरिक गुणों तथा शिक्षा एवं प्रशिक्षण को देखते हुए अंतर होता है। अतः श्रमिकों को विभिन्न वर्गों तथा समूहों में बांटा जा सकता है। किसी वर्ग या समूह के अंदर श्रमिकों में प्रतियोगिता होती है किंतु विभिन्न समूहों के बीच प्रतियोगिता नहीं होती जिससे इनमें अप्रतियोगी समूह कहते हैं।

हर अप्रतियोगी समूह में श्रमिकों की मजदूरी उनकी मांग एवं पूर्ति की दशाओं के मुताबिक निर्धारित होगी और इन समूहों की मजदूरियों में अंतर होगा। अप्रतियोगी समूहों के अंदर अप्रतियोगी समूह होते है। विभिन्न अप्रतियोगी समूह अक्सर नीची मजदूरी वाले रोजगार से ऊंची मजदूरी वाले रोजगारों में श्रमिकों की गतिशीलता में कठिनाइयों के कारण पैदा होते हैं। यह कठिनाइयां विभिन्न सामाजिक अथवा आर्थिक कारणों से हो सकती है। यह यातायात सुविधाओं की कमी, पारिवारिक बंधनों के होने या जाति संबंधी रूकावटों एवं अच्छे प्रशिक्षण के साधनों की कमी, आदि के कारण भी हो सकती है। इस तरह अप्रतियोगी समूहों एवं उनके अंतर्गत भी अप्रतियोगी समूहों की मजदूरियों में अंतर पाये जाते है।


(ख) समकारी अंतर मजदूरी वे अंतर जो कार्यों के अमौद्रिक लाभों के अंतर के हरजाने का काम करते है।

उन्हें समकारी अंतर कहा जाता है। अमौद्रिक तत्व जो विभिन्न कार्यो या धंधों में मजदूरी में अंतर पैदा करते हैं वे ये है:-


रोजगार की प्रकृति सम्बंधी अंतर- जिन धंधों में श्रमिकों का काम अस्थायी तथा अनियमित होता है उनमें मजदूरी स्थायी तथा नियमित काम करने वाले धंधों की अपेक्षा ज्यादा होती है क्योंकि अस्थायी कार्य वाले धंधे के श्रमिक बीच बीच में बरोजगार हो जाते है और खाली समय अपने भरण पोषण का खर्च निकालने के लिए वे अपेक्षाकृत ऊंची मजदूरी पर काम करना चाहेंगे।


• कार्य की पसंदगी अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा संबंधी अंतर- प्रायः उन रोजगारों जहां काम आमतौर से पसंद नहीं किया जाता या जिनमें सामाजिक प्रतिष्ठा होती है,

दूसरे रोजगारों की तुलना में ज्यादा मजदूरी दी जाती है किंतु कुछ ऐसे कार्यों में हो अकुशल श्रमिकों के द्वारा किये जाते है जो सामाजिक या दूसरी कमजोरियों के कारण दूसरा काम नहीं कर सकते मजदूरियों नीची हो सकती हैं।


• धंधों की प्रकृति संबंधी अंतर- मुश्किल एवं खतरनाक धंधों में आमतौर से आसानी से एवं सुरक्षित रूप से किये जा सकने वाले धंधों की अपेक्षा ज्यादा मजदूरी होती है।


• व्यवसाय या काम को सीखने में कठिनाई या लागत संबंधी अंतर- आमतौर से जो व्यक्ति कठिन धंधों या कार्यों को अच्छी तरह से सीख सकते है,

उनकी संख्या कम होती है और फलस्वरूप उनकी पूर्ति उनकी मांग से कम होती है। अतः उनकी मजदूरियां प्राय दूसरों की तुलना में ऊंची होती है।


• कार्य की जिम्मेदारी एवं विश्वसनीयता संबंधी अंतर- कुछ कार्य ऐसे होते है जिनमें जिम्मेदारी तथा विश्वास की जरूरत होती है जैसे बैंक के मैनेजर का कार्य, मिल मैनेजर का कार्य आदि। ऐसे कार्यो के लिए आमतौर से दूसरी की तुलना में ऊंची मजदूरी होती है।


• भविष्य में उन्नति की आशा- जिन धंधों में श्रमिकों के लिए भविष्य में उन्नति के अच्छे मौके होते है।

उनमें शुरूआत में मजदूरी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।


सुविधाओं का होना- जिन धंधों में श्रमिकों को नकद मजदूरी के अलावा दूसरी बहुत सी सुविधाएं आदि मिलती है। उनमें श्रमिकों की मजदूरी अपेक्षाकृत कम होती है।


(ग) असमकारी अंतर- चुंकि वास्तविक जगत में सभी श्रमिक एकरूप नहीं होते, उनकी मजदूरियों में सभी अंतरों की व्यवस्था समकारी अंतरों द्वारा नहीं की जा सकती। एक ही व्यवसाय या समान कार्यों में लगे हुए श्रमिकों की मजदूरी में अंतर की व्याख्या असमकारी अंतरों द्वारा की जाती हैं जिन्हें दो उपवर्गों में रखा जा सकता है।


• बाजार अपूर्णताएं- कई तरह की अगतिशीलताएं एकाधिकारी प्रवृतियां तथा सरकारी हस्तक्षेप बाजार की अपूर्णताओं को जन्म देती है।

किसी व्यवसाय में मजबूत श्रमिक संघ के होने या श्रमिकों में एकाधिकार की स्थिति या सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण, आदि के कारण मजदूरी अपेक्षाकृत अच्छी या ऊंची हो सकती है। इसके अलावा एक ही व्यवसाय में दो जगहों या क्षेत्रों में मजदूरी अंतर श्रमिकों की भौगोलिक अगतिशीलताओं के कारण हो सकते हैं।


• श्रमिकों के गुणों या उनकी कुशलता में अंतर होना - विभिन्न श्रमिकों की योग्यताओं में अंदरूनी गुणों, शिक्षा, प्रशिक्षण या उन दशाओं के कारण जिनमें कि काम किया जाता है अंतर होता है। जब कुशलता ही अलग अलग होती है, मजदूरी में अंतर जरूर होगा। ऊपर बताये गये कारण विभिन्न रोजगारों और वर्गों की दिशा में श्रमिकों की पूर्ति के उनकी मांग के साथ समायोजन को प्रभावित करके मजदूरी अंतर पैदा करते हैं। हर दशा में मजदूरी कर निर्धारण श्रमिकों की मांग के सम्बंध में सीमितता की मात्रा या हर तरह के कार्य सम्बंध में श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता द्वारा होता है।



केंद्रीय सरकार इस अधिनियम को रेलवे, खानों, तेल क्षेत्रों और हवाई परिवहन सेवाओं में प्रवर्तित करने के लिए जिम्मेदार है, जबकि राज्य सरकारें इसके लिए फैक्टरियों और अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों में प्रवर्तित करने के लिए जिम्मेदार हैं।


अधिनियम के मूल प्रावधान निम्नानुसार है:


• पारिश्रमिक भुगतान करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति पारिश्रमिक अवधि का निर्धारण करेगा जिस समय तक पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना है। कोई पारिश्रमिक अवधि एक माह से अधिक नहीं होगी।


• सभी पारिश्रमिक का भुगतान वर्तमान कानूनी निविदा में किया जाएगा अर्थात् वर्तमान सिक्का और मुद्रा नोट या दोनों में तथापि,

नियोक्ता कामगारों का लिखित प्राधिकार प्राप्त करने के बाद पारिश्रमिक का भुगतान या तो चैक द्वारा या उनकी पारिश्रमिक को उनके बैंक खाते में जमा करने के माध्यम से करता है।


• पारिश्रमिक के सभी भुगतान कार्य दिवसों में किया जाएगा रेलवे, फैक्टरी या औद्योगिक प्रतिष्ठानों में जहां 1000 से कम व्यक्ति नियुक्त होते है वहां अंतिम भुगतान की तारीख समाप्त होने के बाद सातवां दिन समाप्त होने के पहले किया जाना है। अन्य सभी मामलों में पारिश्रमिक अवधि के अंतिम दिन का 10वां दिन समाप्त होने के पहले किया जाएगा तथापि, कामगार की पारिश्रमिक जिसकी सेवा समाप्त कर दी गई है उसे उसकी सेवा समाप्ति के अगले ही दिन भुगतान किया जाएगा।


• यद्यपि नियुक्त व्यक्ति का भुगतान उसको किसी प्रकार की कटौती के बगैर किया जाएगा, अधिनियम के तहत कर्मचारी की पारिश्रमिक में कटौती निम्नलिखित के कारण अनुमत है- (1) जुर्माना, (2) कर्तव्य से अनुपस्थिति (3) स्पष्ट रूप से कर्मचारी को सौंपें गए माल की क्षति या नुक्सान, (4) नियोक्ता द्वारा प्रदान किया जाने वाला आवास और अन्य सुख सुविधाओं (5) अग्रिम की वसूली या पारिश्रमिक की अति अदायगी का समायोजन, (6) राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित नियमों के अनुसार श्रम कल्याण के लिए गठित किसी निधि से दिए गए ऋण की वसूली और संबंध में देय ब्याज, (7) किसी भविष्य निधि के लिए अंशदान और अग्रिम का भुगतान, (8) आयकर, (9) राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित सहकारी समितियों के भुगतान या भारतीय डाक कार्यालय द्वारा अनुरक्षित बीमा योजना लिए भुगतान, (10) अपनी बीमा पॉलिसी में या प्रतिभूतियों की खरीद के लिए प्रीमियम के भुगतान के लिए कर्मचारी के लिखित प्राधिकार से कटौती की जाती है।


• अधिनिमय जुर्माने के लिए निम्नलिखित नियम निर्धारित किए गए है- ० अनुमोदित कार्य एवं चूक के लिए जुर्माना लगाया जाएगा।


० ऐसी सूची को विनिर्दिष्ट करने वाली सूचना, परिसर में निर्धारित तरीके से प्रदर्शित की जाएगी जहां कार्य किया जाता है या ऐसी जगह जहां कार्य किया जाता है ऐसी जगह पर जहां निर्धारित किया जाए, यदि व्यक्ति रेलवे में नुियक्त हो


० किसी नियुक्त व्यक्ति पर किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाएगा जब तक कि जुर्माने के लिए कारण बताने हेतु उसे अवसर नहीं दिया जाए या ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जुर्माना अधिरोपित करने के लिए निर्धारित किया गया है।


० जुर्माने की कुल राशि जो किसी एक पारिश्रमिक अवधि में किसी नियुक्त व्यक्ति पर अधिरोपित किया जाता है उसकी राशि उस पारिश्रमिक अवधि के संबंध में भुगतान योग्य पारिश्रमिक का तीन प्रतिशत से अधिक न हो।


० पंद्रह वर्ष से कम आयु वाले किसी नियुक्त व्यक्ति पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।


० नियुक्त व्यक्ति पर लगाए गए जुर्माने की वसूली उससे किस्त में नहीं वसूली जाएगी या जिस दिन जुर्माना लगाया गया हो उसके बाद साठ दिनों की समाप्ति पर इसे नहीं वसूला जाएगा।


० सभी जुर्माने और उनकी सभी वसूलियां एक रजिस्टर में दर्ज किए जाएंगे उसको पारिश्रमिक के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के पास रखा जाएगा।


इसलिए अधिनियम का मुख्य लक्ष्य पारिश्रमिक भुगतान के लिए समय और भुगतान तरीका निर्धारित करने द्वारा कुप्रथाओं को समाप्त करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि कामगारों को उनके पारिश्रमिक का भुगतान नियत अंतराल में किया जाए, जिसमें किसी प्रकार की प्राधिकृत कटौती न की जाए। अधिनिमय में पारिश्रमिक भुगतान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा संशोधन किया गया है ताकि इसकी संभावना क्षेत्र का विस्तार और अधिक प्रभावी प्रवर्तन की व्याख्या की जा सके मुख्य संशोधित प्रावधान पारिश्रमिक की सीमा 1600 रू० प्रति माह से 6500 रू० प्रति माह बढ़ाना, अधिनियम की प्रयोज्यता के लिए और सरकार को अधिसूचना द्वारा अधिकृत करना है।


प्रारंभ में यह अधिनियम कारखानों और रेलवे प्रशासन में काम करने वाले ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रू० प्रतिमाह से अधिक नहीं थी। बाद में इसे अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया। इनमें मुख्य हैं-


• ट्राम पथ सेवा या मोटर परिवहन सेवा,


• संघ की सेना या वायुसेना या भारत सरकार के सिविल विमान विभाग में लगी हुई, वायु परिवहन सेवा के अतिरिक्त अन्य वायु परिवहन सेवा,


• गोदी, घाटी तथा जेटी, 


यांत्रिक रूप से चालित अंतर्देशीय जलयान,


• खान, पत्थर खान, या तेल-क्षेत्र,


• कर्मशाला या प्रतिष्ठान, जिसमें प्रयोग, वाहन या विक्रय के लिए वस्तुएं उत्पादित, अनुकूलित तथा विनिर्मित होती है तथा,


• ऐसा प्रतिष्ठान, जिसमें भवनों, सड़कों, पुलों, नहरों या जल के निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबंध कोई भी कार्य या बिजली या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन, प्रसारण या वितरण से संबंध कोई कार्य किया जा रहा हो।


(क) विस्तार - प्रारंभ में यह अधिनियम कारखानों और रेलवे प्रशासन में काम करने वाले ऐसे कर्मचारियों पर लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रू0 प्रतिमाह से अधिक नहीं थी बाद में इसे कई अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया। इनमें मुख्य हैं- (1) ट्राम प्रथ सेवा या मोटर परिवहन सेवा, (2) संघ की सेना या वायुसेना या भारत सरकार के सिविल विमानन विभाग में लगी हुई वायु परिवहन सेवा के अतिरिक्त अन्य वायु परिवहन सेवा, (3) गोदी, घाट तथा जेटी, (4) यांत्रिक रूप से चालित अंतर्देशीय जलयान ( 5 ) खान. पत्थर या तेल क्षेत्र, (6) कर्मशाला या प्रतिष्ठान, जिसमें प्रयोग वहन या विक्रय के लिए वस्तुएं उत्पादित, अनुकूलित तथा विनिर्मित होती है

तथा (7) ऐसा प्रतिष्ठान, जिसमें भवनों, सडको, पुलों, नहरों या जल के निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबंध कोई कार्य या बिजली या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन प्रसारण या वितरण से संबंध कोई कार्य किया जा रहा है।


श्रमिकों के लिए केवल मजदूरी की मात्रा ही महत्त्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी अदायगी के तरीके मजदूरी भुगतान के अंतराल उसके संरक्षण से संबंध अन्य कई बाते भी महत्वपूर्ण होती है जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के दायरे में आते है। इस शक्ति का प्रयोग कर कई राज्य सरकारों ने इस अधिनियम को कृषि तथा कुछ अन्य असंगठित नियोजनों में भी लागू किया है। इस तरह आज मजदूरी भुगतान अधिनियम देश के कई उद्योगों, नियोजनों में भी लागू है यह अधिनियम उपर्युक्त प्रतिष्ठानों या उद्योगों में 142 ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू है, जिनकी मजदूरी 6500 रू0 प्रतिमाह से अधिक नहीं है।



(ख) मजदूरी की परिभाषा - मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 के अनुसार


मजदूरी भुगतान अधिनियम में मजदूरी की परिभाषा निम्नांकित प्रकार से दी गई है मजदूरी का अभिप्राय उन सभी पारिश्रमिक से है जिन्हें मुद्रा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है या किया जा सकता है और जो नियोजन की अभिव्यक्त या विवक्षित शर्तों के पूरी किए जाने पर नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन या नियोजन के दौरान किए गए काम के लिए देय होता है मजदूरी के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित होते है-


(i) किसी अधिनियम या पक्षकारों के बीच किए गए समझौते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय पारिश्रमिक,


(ii) ऐसा पारिश्रमिक जिसके लिए नियोजित व्यक्ति अतिकाल कार्य या छुट्टी के दिनों या अवधि के लिए हकदार है


(iii) ऐसा कोई पारिश्रमिक जो नियोजन की शर्तो के अधीन देय होता है


(iv) ऐसी कोई राशि जो नियोजित व्यक्ति को उसकी सेवा की समाप्ति पर किसी कानून, संविदा या लिखित के अधीन कटौतियों के साथ या कटौतियों के बिना देय होती है तथा उसकी अदायगी के लिए अवधि की व्याख्या नहीं की गई है या


(v) ऐसी कोई राशि जिसके लिए नियोजित व्यक्ति किसी लागू कानून के अधीन बनाई गई योजना के अंतर्गत हकदार होता है।


अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मजदूरी की परिभाषा के अंतर्गत निम्नलिखित को सम्मिलित नहीं किया जाता -


(i) ऐसा बोनस, जो नियोजन की शर्तों अधिनिर्णय, पक्षकारों के बीच समझौते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय नहीं है।


(ii) आवास-स्थान, प्रकाश, जल, चिकित्सकीय परिचर्चा, अन्य सुख सुविधाओं का मूल्य, ऐसी सेवा का मूल्य जिसे राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा मजदूरी की गणना से अपवर्जित कर दिया गया हो।


(iii) नियोजक द्वारा किसी पेंशन या भविष्य निधि के अंशदान के रूप में दी गई तथा उस पर प्राप्त किया जाने वाला सूद,


(iv) यात्रा भता या यात्रा संबंधी रियायत का मूल्य,


(v) किसी नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन की प्रकृति के कारण उस पर पडे विशेष व्यय को चुकाने के लिए दी गई धनराशि या


(vi) ऊपर के भाग (4) में वर्णित राशि को छोडकर नियोजन की समाप्ति पर दिया जाने वाला उपादान


(ग) मजदूरी भुगतान का दायित्व