प्रशासन प्रबन्धन में शामिल - Involved in Administration Management
प्रशासन प्रबन्धन में शामिल - Involved in Administration Management
बैच के अनुसार प्रबन्धन सामाजिक क्रिया है जो किसी उपक्रम के निर्धारित उद्देश्य अथवा कार्य को सम्पन्न करने के लिए क्रियाओं का प्रभावपूर्ण नियोजन एवं नियमन करने के उत्तरदायित्व को आवश्यक मानता है।
प्रशासन प्रबंधन का भाग है एवं व्यावसायिक प्रक्रियाओं की प्रगति को योजना के अनुरूप नियमित एवं नियंत्रित कार्य के लिए कार्य विधियों के निर्धारण एवं पालन करने से संबंधित है।
प्रबन्धन और प्रशासन में कोई भेद नहीं
आधुनिक विचारधारा के अनुसार प्रबन्धन और प्रशासन में कोई भेद नहीं किया जा
सकता। थियो हैमन के अनुसार प्रशासनिक तथा प्रबन्धकीय कार्यों का निष्पादन करने के लिए भिन्न-भिन्न वर्गीय पक्षों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। प्रत्येक प्रबंधक को दोनों प्रकार की क्रियायों का निष्पादन करना पड़ता है तथा वे अपना कुछ समय प्रशासकीय व कुछ प्रबन्धकीय कार्यों में लगाते हैं।
किम्बल एवं किम्बल के अनुसार यह अन्तर बहुत भ्रमात्मक है। प्रबंधन एवं प्रशासन एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। उपरोक्त दृष्टिकोण के संज्ञान से ऐसा कहा जा सकता है कि इन दोनों क्रियाओं का
संगठनात्मक स्तर से सम्बन्ध है। पहले स्तर के प्रबन्धकीय कार्य कम एवं प्रशासकीय कार्य अधिक होते हैं। दूसरे स्तर में प्रशासकीय व प्रबन्धकीय कार्य लगभग बराबर मात्रा में होते हैं।
तीसरे स्तर में प्रशासकीय कार्य कम एवं प्रबन्धकीय कार्य अधिक करते हैं।
प्रबंधन एक पेशे के रूप में
पेशे का अर्थ
प्रबंधन की प्रकृति के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रबंधन एक पेशा है? यह निश्चित करने के लिए सर्वप्रथम पेशे का अर्थ एवं इसकी विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक है। पेशे का अर्थ समझने के लिए निम्नलिखित परिभाषाओं का अध्ययन सार्थक सिद्ध होगा।
(1) वेकस्टर शब्दकोश के अनुसार "पेशा वह व्यवसाय है जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति
विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करके दूसरे व्यक्तियों को निर्देश मार्ग-दर्शन या परामर्श देता
है" ।
(2) हॉज तथा जानसन के अनुसार व्यवसाय एक पेशा है जिसके लिए कुछ विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है जिसे उच्च स्तरीय समानता द्वारा समाज में एक
सम्बन्धित वर्ग की सेवार्थ प्रयुक्त किया जाता है" (3) प्रो. डाल्टन ई. मेक फारलैण्ड ने पेशे की निम्नलिखित पांच
किया है:-
(i) विशिष्ट ज्ञान एवं तकनीकी कौशल का होना
(ii) प्रशिक्षण एवं अनुभव प्राप्त करने की औपचारिक व्यवस्था (iii) पेशे का विकास करने के लिए एक प्रतिनिधि संस्था का होना
(iv) व्यवहार को नियन्त्रित करने के लिए आचार संहिता का होना
(v) आर्थिक स्वार्थ के स्थान पर सेवा भावना को प्राथमिकता देना
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि पेशे के अंतर्गत एक व्यक्ति लम्बे प्रशिक्षण एवं अनुभव द्वारा प्राप्त व्यक्तिगत निपुणता का प्रयोग समाज के भिन्न भिन्न वर्गों की सेवा में निष्पक्ष रूप से करता है।
• क्या प्रबंधन एक पेशा है?
पेशे का अर्थ समझने के बाद अब प्रश्न उठता है कि क्या प्रबंधन को पेशे के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए अथवा नहीं? इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह देखना होगा कि क्या पेशे वाली सभी विशेषताएँ प्रबंधन में हैं? पेशे की विभिन्न विशेषताओं और उनके प्रबंधन में विद्यमान होने के सम्बन्ध में निम्नलिखित विवेचन महत्वपूर्ण हैं:
(1) विशिष्ट ज्ञान एवं तकनीकी कौशलः पेशे की पहली विशेषता यह है कि एक पेशेवर व्यक्ति में विशिष्ट ज्ञान एवं तकनीकी चातुर्य होना चाहिए।
प्रबंधन एक विशिष्ट ज्ञान एवं निपुणता है जिसके अपने प्रयोगों पर आधारित सिद्धान्त एवं नियम हैं, जिन्हें व्यावहारिक प्रयोग में लाने के लिए विशेष चातुर्य की जरुरत पड़ती है। इस विशेषता के आधार पर प्रबंधन को पेशा माना जा सकता है।
(2) प्रशिक्षण एवं अनुभव प्राप्त करने का औपचारिक व्यवस्था प्रबंधन के विशिष्ट ज्ञान प्राप्ति के लिए शिक्षण एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था आज अनेक संस्थाओं द्वारा उपलब्ध करा दी गई है। भिन्न-भिन्न विश्वविद्यालयों एवं प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रबंधन के सिद्धान्तों को निपुणता के साथ सिखलाया जा रहा है। आजकल अधिकतर प्रबंधन या तो इन प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रबंधन की शिक्षा ग्रहण करके इस पेशे में प्रवेश लेते हैं
अथवा प्रबंधन साहित्य को पढ़कर प्रबंधन गोष्ठियों में हिस्सा लेकर व प्रबंधन पाठयक्रम सम्बन्धी कार्यक्रम जो कम्पनी या विश्वविद्यालय द्वारा संचालित किए गए हों में हिस्सा लेकर यह ज्ञान प्राप्त करते हैं। व्यवसायिक संस्थायें भी उन्हीं लोगों को प्रबंधक के रूप में चुनाव करती हैं जो प्रशिक्षित एवं अनुभवी हैं। यद्यपि यह सही है कि अभी भी अनेक व्यक्ति प्रबन्धकीय योग्यता के इस औपचारिक प्रशिक्षण के बिना ही इस पद पर कार्यरत हैं, लेकिन इन प्रबन्धकों की प्रबन्धकीय क्षमता को भी कम करके नहीं आंका जा सकता, क्योंकि इस पद पर पहुंचने के लिए उन्होंने अनेक संस्थाओं में विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर काम करके अनुभव प्राप्त किया होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दोनों प्रकार के प्रबन्धकों में लगभग एक-सी योग्यता होती है। अतः पेशे की इस विशेषता के आधार पर प्रबंधन को पेशा माना जा सकता है ।
(3)
प्रतिनिधि पेशेवर संघ का होना पेशे की तीसरी विशेषता के रूप में इसके लिए एक प्रतिनिधि संघ का होना आवश्यक है,
जिसके निम्नलिखित मुख्य कार्य होते हैं:- (i) अपने सदस्यों के व्यवहार को नियन्त्रित करना
(ii) पेशे की विभिन्न क्रियाओं का मार्ग-दर्शन करने के लिए आचार संहिता तैयार
करना।
(iii) अपने सदस्यों की छवि को एक पेशेवर के रूप में बनाना एवं विकास करना
(iv) अपने सदस्यों की न्यूनमत योग्यता निर्धारित करना
(v) पेशे के प्रवेश को नियमित करना
भारत में दूसरे पेशों में इस तरह के प्रतिनिधि संघ स्थापित हो चुके हैं- जैसे - वकालत के पेशे के लिए बार काउन्सिल ऑफ इन्डिया, चिकित्सा के पेशे के लिए मैडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया,
तथा लेखाशास्त्र के पेशे के लिए इन्स्टीच्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउन्टेंटस। इसी तरह के संघों की स्थापना प्रबंधन के सम्बन्ध में भी भारत तथा विदेशों में हो चुकी है। भारत में ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के नाम से प्रबंधन संघ की स्थापना की गई है, तथा देश के विभिन्न भागों में स्थानीय प्रबंधन संघ बनाए गए हैं, जो ए.आई.एम.ए. से संबंधित है। इन प्रबंधन संघों द्वारा प्रबन्धकों के सामाजिक दायित्व की ओर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ पेशेवर आचार संहिता को भी तैयार किया जा रहा है।
भारत में प्रबंधन संघ पेशेवर संघों के निर्धारण की ओर अग्रसर तो है लेकिन आज इनका मुख्य कार्य प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों में शोध करना ही है। यह भी सच है कि प्रबन्धकीय व्यवहार को नियमित बनाने के लिए कोई विशेष नियम नहीं बनाए गए हैं
और न ही प्रबंधन पेशे में प्रवेश करने के बारे में कोई समानता है। उदाहरण के लिए वकालत का कार्य करने के लिए कानून की उपाधि का होना आवश्यक है लेकिन प्रबंधक बनने के लिए ऐसी कोई उपाधि निश्चित नहीं की गई है। इसी प्रकार एक चार्टर्ड एकाउण्टेंट का काम करने के लिए इन्स्टीच्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टेंटस का सदस्य होना आवश्यक है लेकिन प्रबंधक बनने के लिए ए.आई.एम.ए. का सदस्य होना आवश्यक नहीं है। अतः कहा जा सकता हे कि भारत में प्रबंधन के संदर्भ में पेशे की यह विशेषता खरी साबित नहीं होती तथा इस आधार पर प्रबंधन को पूर्णतः पेशा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
(4) आचार संहिता एक पेशे के सदस्य निर्धारित आचार संहिता का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। आचार संहिता के अंतर्गत पेशे से समबन्धित नियम ईमानदारी, सत्यनिष्ठा एवं नैतिकता के पैमाने को सम्मिलित किया जाता है।
पहले से स्वीकृत पेशों- जैसे कानून, चिकित्सा, लेखाशास्त्र आदि के लिए आचार संहिता निश्चित कर दी गई है लेकिन प्रबंधन के सम्बन्ध में इस तरह की कोई समान आचार संहिता निश्चित नहीं की गई है और न ही प्रबन्धकीय कार्यों में प्रवेश के लिए किसी लाईसैंस की आवश्यकता है। इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रबंधन पूर्ण रूप से एक पेशा नहीं है। प्रबंधन के सम्बन्ध में जो आचार संहिता विकसित हो रही है उसमें मुख्यतः संस्था के गोपनीय रहस्यों को गुप्त रखना, संस्था की आंतरिक जानकारी को अपने हित के लिए उपयोग न करना, संस्था के उपलब्ध साधनों का संस्था के दीर्घकालीन कल्याण के लिए उपयोग करना आदि को सम्मिलित किया जा रहा है।
(5) आर्थिक स्वार्थ के स्थान पर सेवा भावना को प्राथमिकता अन्य धन्धों एवं व्यापार की भांति ही पेशा करना भी जीवित रहने के लिए धन अर्जित करने का एक साधन है,
जिसमें विशेष ज्ञान के आधार पर उचित पारिश्रमिक लेकर समाज की सेवा की जाती है। यही कारण है कि पेशेवर लोगों को समाज में सम्मान प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए, एक डॉक्टर चिकित्सा के पेशे से अपनी आजीविका चलाता है लेकिन समाज सेवा उसका मुख्य उदेश्य होता है। यद्यपि प्रबंधन के सम्बन्ध में इस तरह की कोई आचार संहिता नहीं है, फिर भी प्रबन्धकों के सामाजिक दायित्व पर बहुत जोर दिया जा रहा है और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे कम से कम लागतों से अधिक कुशलता अर्जित करके कर्मचारियों, श्रमिकों, उपभोक्ताओं, समाज और देश की सेवा करेंगे और अपने आर्थिक लाभ को भुलाकर संस्था के कल्याण के लिए अपनी समस्त योग्यता एवं अनुभव को दाव पर लगा देंगे। इस दृष्टिकोण से प्रबंधन को पेशे के रूप में स्वीकार करने में अधिक संकोच नहीं होना चाहिए।
उपरोक्त विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रबन्धन, पेशे की कुछ विशेषताओं को पूरा करता है तथा कुछ अन्य विशेषताओं का इसमें अभी पूरा विकास नहीं हुआ है। प्रबंधन को पेशे के रूप में विकास की धीमी गति का मुख्य कारण अधिकतर औद्योगिक उपक्रमों का संचालन कुछ प्रमुख औद्योगिक घरानों द्वारा किया जाना है जिससे पेशेवर प्रबन्धको का विकास अधिक गति से नहीं हो सका है। परन्तु फिर भी शनैः शनैः पेशेवर प्रबन्धकों की मांग बढ़ रही है। सारांश के रूप में कहा जा सकता है कि भारत में प्रबंधन का पेशे के रूप में विकास हो रहा है। जैसे-जैसे विकास की गति में तेजी आयेगी, वैसे-वैसे प्रबंधन को पेशे के रूप में स्वीकृति मिलती रहेगी।
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