उद्देश्यों द्वारा प्रबंधन की सीमाएँ - Limitations of Management by Objectives
उद्देश्यों द्वारा प्रबंधन की सीमाएँ - Limitations of Management by Objectives
उद्देश्यों द्वारा प्रबंधन के अनेक लाभ होते हुए भी इसकी कुछ सीमाएँ / समस्याएं / कमजोरियां है, इनका अध्ययन किया जाना आवश्यक हैं। एम.बी.ओ. की मुख्य सीमाएँ / समस्याएं / कमजोरियां निम्नलिखित है :-
कर्मचारियों पर अधिक दबाव एम.बी.ओं के अंतर्गत संगठन के सभी स्तरों पर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दबाव डाला जाता है। ऐसा करने से कर्मचारी अपने-आप को स्वतंत्र महसूस नहीं करते बल्कि हर समय दबाव में रहते हैं। दबाव से उनकी कार्यकुशलता में कमी होती है।
(ii) समय की बर्बादी एम.बी.ओ. के अंतर्गत पूरे वर्ष सभाओं व प्रतिवेदनों के लेन-देन का दौर ही चलता रहता है।
प्रबंधको का अधिक समय सभाओं में उपस्थित रहने व रिपोर्ट तैयार करने में ही लग जाता है। परिणाम स्वरुप कुछ मुख्य कार्यों की ओर ध्यान न दिए जाने के कारण उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होती है। अतः कहा जा सकता है कि एम.बी.ओ. के लागू करने से समय की बर्बादी होती है।
(iii) अमूल्य साधनों की बर्बादी भागीदारी से जिम्मदारी का बढ़ना, एम.बी.ओ. की एक आधारभूत मान्यता है। प्रथम चरण पर तो यह बिल्कुल ठीक है और इससे लाभ प्राप्त होता है।
लेकिन कई बार कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी को कुछ ज्यादा ही महत्व देने लग जाते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपना काम पूरा करने के प्रति अधिक उतावले हो जाते है। उनके उतावलेपन के कारण साधनों का दुरुपयोग होने लगता है। (हो सकता है।)
(iv) उच्च प्रबंधन का अपूर्ण समर्थन एक संगठन में अधिकारों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर चलता है। अर्थात उच्च प्रबंधन के अधिकार सर्वाधिक होते हैं। उच्च प्रबंधन अपने निर्णयों को अधीनस्थों पर थोपते हैं। ऐसा करना उन्हें अच्छा लगता है। दूसरी ओर एम.बी.ओ. में अधीनस्थों की चारदिवारी से उच्च प्रबंधकों के अधिकारों में कमी आती है, जिसे वे पसंद नहीं करते। अंततः एम.बी.ओ. को लागू करने में बाधा उत्पन्न होती है।
(v) उद्देश्य निर्धारण में कठिनाई एम.बी.ओ. केवल उसी स्थिति में सफल होता है जब अधिकारी व अधीनस्थ दोनों एक-दूसरे की सीमाओं को ध्यान में रखकर उद्देश्यों का निर्धारण करें। प्रायः देखा जाता है कि वरिष्ठ अधिकारी ही उद्देश्यों का निर्धारण कर लेते हैं और अधीनस्थों को मात्र औपचारिकतावश बुलाया जाता है। उन्हें इतना समय नहीं दिया जाता कि वे अपने सुझाव दे सकें। और यदि वे अपने सुझाव देते भी हैं तो उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है। इस प्रकार उद्देश्य निर्धारण में कठिनाई उत्पन्न होती है। इसका प्रभाव यह होता है कि उद्देश्यों को पूरा करना कठिन हो जाता है।
(vi) दीर्घकालीन उद्देश्यों को महत्व देनाः एम.बी.ओ. की सफलता के लिए प्रबंधकों को चाहिए कि अल्पकालीन उद्देश्यों के साथ-साथ दीर्घकालीन उद्देश्यों के महत्व को भी समझें।
ऐसा करने से अल्पकाल के साथ-साथ दीर्घकाल में भी संस्था की सफलता व विकास की उम्मीद बनी रहेगी।
(vii) कर्मचारीयों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करनाः कुशल निपुण कर्मचारियों की कमी एम.बी.ओ. की सफलता को प्रभवित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है। अतः इस कमी को पूरा करना अतिआवश्यक है। इसके लिए जरुरी है कि एम.बी.ओ. कार्यक्रम प्रारंभ करने से पूर्व ही संस्था में काम करने वाले हर व्यक्ति को इसकी जानकारी से परिचित करवा दिया जाए। प्रशिक्षण के दौरान ही कर्मचारियों के एम.बी. ओ. के संबंध में सभी संदेहों को दूर कर देना चाहिए। प्रायः कर्मचारी किसी भी नये कार्यक्रम का लागू किए जाने का विरोध करते हैं। प्रशिक्षण के माध्यम से कर्मचारियों का मानसिक रुप से तैयार किया जा सकता है। (viii) भागीदारी प्रकृति का विकास करनाः प्रायः देखा जाता है कि अधीनस्थों की प्रकृति भागीदारी की नहीं होती। इस समस्या के दूर करने के लिए अधीनस्थों को यह समझाया जाना चाहिए कि वे संस्था के मुख्य अंग हैं। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा दिये गये सुझावों को निर्णयों में उचित स्थान देना चाहिए। यदि एक बार उनके सुझाव को स्वीकार कर लिया गया तो वे बार-बार नये सुझावों के साथ आयेंगे। इस प्रकार भागीदारी की समस्या को समाप्त किया जा सकता है।
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