नियंत्रण की सीमाएं - limits of control
नियंत्रण की सीमाएं - limits of control
नियंत्रण प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण कार्य है लेकिन यह सीमाओं से रहित नहीं है। इनकी मुख्य सीमाएं निम्नलिखित हैं:
गुणात्मक प्रमाप निर्धारित करने में कठिनाई: प्रमाप निर्धारित करने के संबंध में एक मुख्य बात यह है कि जो कार्य संख्यात्मक प्रकृति के हैं उनके माप निर्धारण में कठिनाई आती है। इनके लिए अप्रत्यक्ष मापदंडों का सहारा लिया जाता है। उदाहरणार्थ, कर्मचारियों के ऊँचे मनोबल को मापना एक गुणात्मक प्रकृति का कार्य है। इसे सीधे तरीके से नहीं मापा जा सकता। इसको मापने के लिए श्रम-परिवर्तन दर, अनुपस्थिति दर झगड़ों की दर,
आदि को देखा जा सकता है। यदि ये तीनों दरें ऊँची हैं तो कहा जाएगा कि संस्था में कर्मचारियों का मनोबल ऊंचा नहीं है। अतः स्पष्ट है कि सभी कार्यों के लिए संख्यात्मक प्रमाप निर्धारित नहीं हो सकते और गुणात्मक प्रमाप पूर्णत: शुद्ध नहीं होते
(ii) बाहरी तत्वों पर कोई नियंत्रण नहीं यदि हम कहें कि एक प्रबंधक प्रबंधन के नियंत्रण कार्य को पूरा करके संगठन में पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर देगा तो यह कहना बिल्कुल गलत होगा। प्रबंधक आंतरिक तत्वों (जैसे- मानव, माल, मशीन आदि) पर तो नियंत्रण कर सकता है लेकिन बाहरी तत्वों (जैसे- सरकारी नीतियां तकनीकी परिवर्तन, प्रतियोगिता, आदि) पर नियंत्रण करना असंभव है। अतः कभी भी पूर्ण नियंत्रण की स्थिति स्थापित नहीं हो सकती।
(iii) कर्मचारियों द्वारा विरोध: व्यवसायिक वातावरण में लगातार परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन का सामना करने के लिए नियंत्रण की नवीनतम पद्धतियों का प्रयोग करना होता है। लेकिन कर्मचारी इन पद्धतियों का विरोध करते है। उदाहरण के लिए, यदि उस हाल में जहां कर्मचारी काम कर रहे हैं, उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए सी.सी.टी.वी लगा दिए जाएं तो वे निश्चित रूप से इसका विरोध करेंगे।
(iv) महंगी प्रक्रिया : नियंत्रण प्रक्रिया को लागू करने के लिए बहुत धन, समय व प्रयासों की जरुरत होती है। छोटी संस्थाओं के लिए यह विलासिता बन कर रह गई है। प्रबन्धकों को चाहिए कि ऐसी नियंत्रण प्रणाली लागू करें जिससे प्राप्त लाभ उसकी लागतों से अधिक हो।
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