प्रबंधन के स्तर - management level

प्रबंधन के स्तर - management level


प्रबंधन के स्तरों की कोई निश्चित संख्या नहीं है। इनकी संख्या व्यवसाय की प्रकृति, आकार आदि द्वारा निर्धारित होती है। बैच ने प्रबंधन के स्तरों का निम्नलिखित तीन भागों में बांटा है :-


उच्चस्तरीय प्रबंधन


उच्चस्तरीय प्रबंधन में संचालक मण्डल, मुख्य कार्यकारी अधिकारी आदि को सम्मिलित किया जाता है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी एक अकेला व्यक्ति भी हो सकता है अथवा कुछ अधिकारी भी और एक समिति भी। मुख्य कार्यकारी अधिकारी को अनेक नामों से पुकारा जाता है- जैसे प्रबंध संचालक, मुख्य प्रबन्धक, प्रधान आदि । उच्चस्तरीय प्रबंधक के पास सभी प्रबन्धकीय अधिकारी होते हैं और इस आधार पर ही उच्च स्तर के अधिकारी व्यवसाय के स्वामियों अथवा अंशधारियों के प्रति उत्तरदायी हैं।


मध्यस्तरीय प्रबंधन


मध्यस्तरीय प्रबन्धन, उच्चस्तरीय तथा निम्नस्तरीय प्रबंधन के मध्य स्थित होता है। इसके मध्यस्तरीय प्रबंधन उच्चस्तरीय प्रबंधन से आदेश लेते हैं और निम्नस्तरीय प्रबंधन से कार्य करवाते हैं। ये अपने कार्य के लिए उच्चस्तरीय प्रबंधन के प्रति उत्तरदायी होते हैं ।


निम्नस्तरीय प्रबंधन :


यह प्रबंधन का सबसे नीचा का स्तर है और इसका श्रमिकों से सीधा संबंध होता है। ये उनकी साधारण समस्याओं को तो स्वयं ही निपटा देते हैं

और गम्भीर समस्याओं को मध्यस्तरीय प्रबन्धकों तक पहुँचाते हैं। ये अधीनस्थ से काम को और बेहतर ढंग से करवाते हैं और बेहतर ढंग से करने का सुझाव भी देते हैं।


प्रशासन और प्रबन्धन


प्रशासन और प्रबंधन दोनो का अर्थ समान समझा जाता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। यहां पर प्रबंधन और प्रशासन को भिन्न स्वीकारा गया है। इन्हें ठीक से समझना आवश्यक है।


प्रबंधन और प्रशासन में अन्तर


ओलिवर शैल्डन के अनुसार, प्रशासन संगठन का निर्माण करता है, प्रबंधन इनका प्रयोग करता है। प्रशासन लक्ष्य निर्धारित करता है, प्रबंधन इन्हें पूरा करने का प्रयत्न करता है। प्रशासन द्वारा निर्धारित संगठन-तन्त्र का प्रयोग प्रबंधन निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के


लिए करता है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि प्रशासन लक्ष्य व नीतियाँ निर्धारित करता है तथा प्रबंधन उन्हें प्राप्त करने एवं लागू करने का प्रयास करता है अर्थात प्रशासन का कार्यक्षेत्र प्रबंधन से व्यापक है।


विलियम आर. स्पीगल के अनुसार, 'प्रशासन किसी व्यवसायिक संस्था का वह भाग है जिसका सम्बन्ध संस्थागत उद्देश्य निश्चित करना तथा नीतियों का निर्धारण करना है जिसका अनुसरण करना उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।