प्रबंधकीय भूमिकाएं - managerial roles

प्रबंधकीय भूमिकाएं - managerial roles


प्रबन्धकीय भूमिकाओं के संबंध में मुख्य प्रश्न यह उठता है कि क्या उसके अंतर्गत प्रबंधन प्रक्रिया में उपरोक्त बताए गए पांच ही कार्य किए जाते हैं? और क्या इसी क्रम में उन्हें पूरा किया जाता है? हेनरी मिज़बर्ग ने इस संबंध में गहन अध्ययन किया। मिज़बर्ग अपने शोधकार्यों के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रबंधन इन पांचों कार्यों के स्थान पर कुछ अलग तरह की भूमिकाएँ अदा करता है। उन्होंने प्रबंधन की दस भूमिकाओं का विकास किया जिन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इन सभी दस भूमिकाओं का कोई विशेष क्रम नहीं है। ये भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं :-


(A)


अंतर्व्यक्तिगत भूमिकाएं


प्रबंधन के अर्न्तगत एक व्यक्ति (अर्थात प्रबन्धक) द्वारा अन्य व्यक्तियों के माध्यम से संगठन के उद्देश्यों को पूरा किया जाता है। इसलिए इसे अंतर्व्यक्तिगत क्रिया कहा जाता है।

अन्य शब्दों में, प्रबंधन क्रिया को सार्थक बनाने के लिए एक व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों से संबंध स्थापित होना जरुरी है। इस संबंध में एक प्रबंधन निम्नलिखित तीन भूमिकाएँ अदा करता है:


(1) मुख्य व्यक्ति की भूमिका संगठन में प्रबंधक एक मुख्य व्यक्ति के रूप में होता है। इस भूमिका में प्रबंधन को निम्नलिखित कार्य करने होते हैं: संगठन की ओर से सामाजिक उत्सवों में उपस्थित होना


भ्रमणकारियों का स्वागत करना


कर्मचारियों की शादियों में उपस्थित होना


किसी महत्वपूर्ण ग्राहक के साथ भोजन करना


(ii) नेता की भूमिका : एक नेता की भूमिका में प्रबंधक अपने अधीनस्थों का मार्ग-दर्शन करता है। वह उन्हें यह बताता है कि किस कार्य को किस विधि में कम से कम समय में किया जा सकता है।


(iii) संपर्क अधिकारी की भूमिका इस भूमिका के अर्न्तगत प्रबंधक संगठन में अन्य विभागों के प्रबन्धकों के साथ संपर्क स्थापित करके अनेक जानकारियां प्राप्त करता है । प्रबन्धकों की यह भूमिका संगठन के सभी विभागों के साथ मधुर संबंध स्थापित करने में सहायक होती है।


(B) सूचनात्मक भूमिकाएँ


प्रबंधक की यह भूमिका संदेशवाहन से संबंधित है।

प्रबंधक अपने बॉस तथा अधिनस्थाओं के साथ आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है। अपने अधीनस्थों को यह आदेश व निर्देश देता है तथा उनसे सुझाव शिकायत आदि प्राप्त करता है। इसी प्रकार वह अपने बॉस से आदेश व निर्देश प्राप्त करता है और अपने सुझाव शिकायतें आदि उसके पास भेजता है। मिज़बर्ग ने निम्नलिखित सूचनात्मक भूमिकाओं का वर्णन किया है:


मॉनीटर की भूमिका एक मॉनीटर की भूमिका में प्रबंधक संगठन के आंतरिक व बाहरी वातावरण पर निगाह रखता है। वातावरण का अभिप्राय संगठन के निर्णयों को प्रभावित करने वाले आंतरिक व बाध्य तत्वों से है। प्रबंधक इन तत्वों से संबंधित सूचनाएँ एकत्रित करता है तथा उनका विश्लेषण करता है।


(ii) विस्तारक की भूमिका एक विस्तारक की भूमिका में प्रबंधक अपने अधीनस्थों को उन सूचनाओं से अवगत करवाता है जो उनकी पहुंच में नहीं हैं। ये सूचनाएँ आंतरिक व बाध्य वातावरण से संबंधित हो सकती हैं।


(iii) अधिवक्ता की भूमिकाः अधिवक्ता की भूमिका में प्रबंधक संगठन के बाहर के लोगों के साथ संगठन के प्रतिनिधि के रूप में बात चीत करता है। जैसे अंशधारकों को कम्पनी की वित्तीय स्थिति की जानकारी देना, प्रेस के लोगों के संगठन के बारे में बातचीत करना, उपभोक्ताओं को सामाजिक उत्तरदायित्व पूरा करने का आश्वासन देना, सरकार को नियमों के पालन का आश्वासन देना, आदि।


(C) निर्णयात्मक भूमिकाः प्रबंधक की इस भूमिका के बारे में कहा जाता है

कि यदि प्रबंधन में से निर्णय को घटा दिया जाए तो शेष कुछ नहीं बचता। इसका अभिप्राय यह है कि प्रबंधक को निर्णय ही तो लेने होते हैं। यदि वह निर्णय नहीं लेता तो फिर उसका कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। अतः प्रबंधन को अनेक दैनिक व अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं। प्रबंधक की निर्णयात्मक भूमिकाएं निम्नलिखित हैं:


साहसी की भूमिका इस भूमिका में प्रबंधक आधुनिक व्यवसायिक वातावरण का सामना करने के लिए काम करने की नई-नई विधियों की खोज करता है व उन्हें लागू करता है।


(ii) बाधा - रोधक की भूमिकाः इस भूमिका में प्रबंधक संगठन में उपस्थित किसी भी बाधा को अतिशीघ्र दूर करने का प्रयास करता है, जैसे बिजली का फेल होना, मशीन का अचानक खराब हो जाना, अधीनस्थों में झगड़ा हो जाना, किसी देनदार का दिवालिया हो जाना, कच्चे माल की पूर्तीकर्ता द्वारा हड़ताल की धमकी देना, आदि ऐसी समस्याएँ हैं जिनका अतिशीघ्र निपटारा करना होता है।


(iii) साधन वितरक की भूमिका प्रत्येक संगठन में साधन (जैसे- धन, माल, मशीन आदि) सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं। प्रबंधक का यह कर्तव्य होता है

कि वह सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग करें। ऐसा तभी संभव है यदि साधनों का उचित वितरण किया जाये, अर्थात जिस स्थान पर जितने साधनों की आवश्यकता हो, वहां उतने ही दिए जाने चाहिए। प्रबंधक इस भूमिका के अंतर्गत साधनों के उचित बंटवारे की व्यवस्था करता है।


(iv) सौदेबाज की भूमिका इस भूमिका के अंतर्गत प्रबंधक अनेक आंतरिक एवं बाध्य लोगों से विभिन्न मुद्दों पर सौदेबाजी करता है जैसे- हड़ताल के मुद्दे को लेकर संघ के प्रधान से सौदेबाजी करना, अर्थात श्रमिक संघ के प्रधान के साथ यह निश्चित करना कि उन्हें क्या सुविधा प्रदान करने से हड़ताल समाप्त हो सकती है।