आधुनिक दृष्टिकोण - modern approach
आधुनिक दृष्टिकोण - modern approach
प्रबंधन विचारधारा का आधुनिक दृष्टिकोण सन 1950 के आस-पास विकसित हुआ। इसके अंतर्गत परंपरागत तथा नव-परंपरागत दृष्टिकोण को कुछ सुधारों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस दृष्टिकोण के तीन आधारभूत स्तंभ हैं: संख्यात्मक दृष्टिकोण, प्रणाली दृष्टिकोण तथा आकस्मिक दृष्टिकोण
प्रणाली दृष्टिकोण
यह प्रबंधन का नवविकसित दृष्टिकोण है जिसका उदय 1960 में हुआ। इसका प्रतिपादन चेस्टर आई. वरनार्ड, हरबर्ट ए. साइमन व साथियों ने किया। प्रणाली का अभिप्राय छोटी-छोटी एक-दूसरे से संबंधित इकाईयों के समूह से है। विभिन्न इकाईयों के समूह अर्थात एक पूरी ईकाई को प्रणाली तथा छोटी-छोटी ईकाइयों को व्यक्तिगत रूप में उप प्रणाली कहते हैं।
सभी छोटी-छोटी इकाइयां स्वयं में स्वतंत्र होती है। लेकिन संबंधित प्रणाली अन्य उप-प्रणालीयों से किसी न किसी रूप में जुड़ी होती है। सभी उप- प्रणाली एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए मानो कि स्कूटर एक प्रणाली है जिसके इंजन, शाफ्ट, गियर, पहिए, बॉडी आदि अनेक उप- प्रणालीयां हैं। ये सभी उप-प्रणालीयां एक-दूसरे से संबंधित हैं और किसी एक के फेल हो जाने पर मुख्य प्रणाली काम करना बंद कर देती हैं। अतः मुख्य प्रणाली की सफलता उप-प्रणालीयों के सहयोग एवं कुशलता पर निर्भर करती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक प्रणाली का अभिप्राय आपस में संबंधित अनेक भागों से है जो एक निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए साथ-साथ कार्य करते हैं।
प्रणाली दृष्टिकोण के अनुसार पूरा संगठन एक प्रणाली है और इसके विभिन्न उसकी उप-प्रणालीया। सभी उप-प्रणालीया मिलकर काम करती हैं
तभी संगठन के उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है अतः जब प्रबंधन एक उप प्रणाली के संबंध में कोई निर्णय लेता है तो यह देख लेना चाहिए कि उस निर्णय का अन्य उप- प्रणालियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
आकस्मिकता अथवा परिस्थिति मूलक दृष्टिकोण
आक्समिकता दृष्टिकोण प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। इस दृष्टिकोण का उदय 1970 के आस-पास हुआ। इसके अनुसार, प्रबन्धकों को निर्णय परिस्थितियों के अनुसार लेना चाहिए, न कि सिद्धान्त के अनुसार इसका अभिप्राय यह है कि कि कोई भी ऐसा सिद्धान्त / सूत्र / प्रबन्धकीय कार्यवाही नहीं हो सकती जो सभी परिस्थितियों में उपयुक्त रहे। इसका मुख्य कारण है वातावरण की परिवर्तनशीलता । यहां वातावरण का अभिप्राय उन सभी तत्वों के योग से है जिनसे एक संगठन प्रभावित होता है। ये तत्व आंतरिक व बाध्य दोनों प्रकार के होते हैं।
आंतरिक तत्वों में उद्देश्य नीतियां, संगठन ढांचा, प्रबंधन सूचना प्रणाली आदि को सम्मिलित किया जाता है। जबकि बाध्य तत्वों में ग्राहक, पूर्तीकर्ता, प्रतियोग, सरकारी नीतियां, राजनैतिक ढांचा, वैधानिक प्रणाली आदि सम्मिलित होते है ये सभी तत्व परिवर्तनशील हैं इसलिए संगठन के वातावरण को परिवर्तनशील कहा जाता है। प्रणाली दृष्टिकोण संगठन एवं वातावरण में संबंध स्थापित करने में असफल रहा है। आकस्मिक दृष्टिकोण में इसी कमी को पूरा करने का प्रयास किया गया है। अतः प्रबन्धकों का आधारभूत कर्तव्य है कि वे वातावरण का विश्लेषण करें और विश्लेषण के आधार पर निर्णय लें। प्रबन्धकों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि किसी कार्य को करने की कोई एक विधि हमेशा उपयुक्त नहीं हो सकती। किसी समस्या के हल के लिए एक परिस्थिति में कोई विशेष विधि उपयुक्त हो सकती है जबकि किसी अन्य परिस्थिति में नहीं। जहां तक प्रबंधन के विभिन्न सिद्धान्तों का प्रश्न है वे प्रबन्धकों का मार्गदर्शन करते हैं
तथा वर्तमान गतिशील वातावरण में उनसे यह आशा करना कठिन नहीं है कि ये सिद्धान्त सभी परिस्थितियों में उपयुक्त होंगे।
आकस्मिक दृष्टिकोण की विशेषताएँ
प्रबन्धकीय कार्यवाही पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है।
प्रबन्धकीय कार्यवाही परिस्थितियों के अनुसार बदलती है।
संगठन का वातावरण आवश्यक होता है
आकस्मिक दृष्टिकोण की सीमाएँ
यह कहना पर्याप्त नहीं है कि प्रबन्धकीय कार्यवाही परिस्थिति पर निर्भर करती है।
यह बताए जाने की आवश्यकता है कि किस परिस्थिति में क्या किया जाना चाहिए।
एक परिस्थिति अनेक तत्वों से प्रभावित हो सकती है। इन सभी तत्वों का विश्लेषण किया जाना कठिन है। उदाहरण के लिए नेतृत्व की अनेक शैलियाँ हैं लेकिन किसी एक शैली को सभी परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार अभिप्रेरण व नियंत्रण की भी अनेक विधियां हैं लेकिन किसी एक विधि को ही सभी परिस्थितियो में लागू नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि यह दृष्टिकोण प्रबन्धकों को सर्तक रहने का सुझाव देता है और कहता है कि परिस्थितियों के अनुसार अपने दृष्टिकोण तथा कार्यप्रणाली में परिवर्तन लाना चाहिए।
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