समन्वय की प्रकृति - The nature of coordination
समन्वय की प्रकृति - The nature of coordination
समन्वय एक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित करने वाली प्रक्रिया है। समन्वय की परिभाषाएं इसकी प्रकृति के बारे में निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत करती हैं:-
समन्वय सामूहिक प्रयास में सामंजस्य स्थापित करता है समन्वय की आवश्यकता उस समय पड़ती है जब किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेक व्यक्तियों के प्रयासों की जरुरत हो । संक्षेप में समन्वय का संबंध सामूहिक प्रयास से है न कि एकाकी प्रयास से यदि एक ही व्यक्ति काम करने वाला हो तो समन्वय का प्रश्न ही नहीं उठता।
(ii) समन्वय प्रयास में एकता सुनिचित करता है समन्वय की प्रकृति प्रयास में एकता पैदा करने की है। इसका अभिप्राय प्रक्रिया के दौरान एक संगठन की विभिन्न क्रियाओं में एकता पैदा करने के प्रयास से है। उदाहरण के लिए क्रय तथा विक्रय विभागों को अपनी क्रियाओं को इस ढंग से समन्वित करना होता है ताकि क्रय आदेशों की पूर्ती की जा सके।
(iii) समन्वय एक सतत् प्रक्रिया है : यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो हमेशा के लिए एक ही बार में पूरा कर दिया जाए बल्कि इसकी आवश्यकता कदम-कदम पर होती है।
व्यवसाय में अनेक क्रियाएं की जाती हैं। इनमें से कोई न कोई क्रिया आवश्यकता से अधिक या कम होती रहती है जो पूरे संतुलन को बिगाड़ देती है। अतः सभी क्रियाओं में संतुलन बनाए रखने के लिए उन पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। समन्वय एक सर्वव्यापक कार्य है : सर्वव्यापकता का अर्थ उस सत्य से है जो सभी क्षेत्रों (व्यावसायिक तथा गैर व्यावसायिक) तथा सभी स्थानों पर समान रूप से लागू होता हो और समन्वय की ऐसी प्रकृतिः जैसे - एक शिक्षण संस्था में टाईम टेबल बनाना समन्वय स्थापित करने का एक अच्छा उदाहरण है किसी भी सामूहिक खेल. जैसे- फुटबॉल में सभी खिलाड़ियों को पूर्व निर्धारित स्थानों पर खड़ा करना समन्वय ही है। इसी प्रकार एक व्यावसायिक इकाई में क्रय और विक्रय उत्पादन, वित्त आदि विभागों की क्रियाओं में मिलान स्थापित करना समन्वय है।
(v) समन्वय सभी प्रबंधकों का उत्तरदायित्व है समन्वय की जरुरत उच्च, मध्य व निम्न तीनों प्रबंधकीय स्तरों पर होती है सभी स्तरों पर की जाने वाली विभिन्न क्रियाएं अपने आप में महत्वपूर्ण होती हैं। अतः सभी प्रबंधकों का यह उत्तरदायित्व है कि समन्वय स्थापित करने का प्रयास करें। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि समन्वय का किसी विशेष प्रबंधकीय स्तर पर अथवा कियी विशेष प्रबंधक के लिए अधिक महत्व है।
(vi) समन्वय जानबूझ कर किया जाने वाला कार्य है समन्वय कभी भी अपने-आप स्थापित नहीं होता बल्कि यह जानबूझ कर किया जाने वाला एक प्रयास होता है। केवल सहयोग से बात नहीं बनती। सहयोग के साथ समन्वय का होना जरुरी है। उदाहरण के लिए, एक सेल्स एक्ज़ीक्यूटिव किसी उत्पाद का वितरण करना चाहता है जिससे कि संस्था के लाभ में वृद्धि हो। किंतु निश्चित समय पर अपेक्षित मात्रा में उत्पाद न मिलने की सूरत मे समन्वय के अभाव में आती है। दूसरी ओर सहयोग के अभाव में समन्वय कर्मचारियों को असंतुष्ट करता है। अतः एक ही समय पर दोनों का होना जरुरी है।
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