विभागीयकरण की आवश्यकता एवं महत्व - Need and importance of departmentalization
विभागीयकरण की आवश्यकता एवं महत्व - Need and importance of departmentalization
विभागीयकरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। एक उपक्रम की सफलता में इसके योगदान को निम्नलिखित तत्वों से समझा जा सकता है। इन्ही तत्वों से विभागीयकरण की आवश्यकता का संकेत भी मिलता है।
प्रबंधकीय निपुणताः विभागीयकरण के कारण प्रबंधक कुछ ही क्रियाओं को बार-बार करते हैं और अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हुए निर्णय लेते हैं। थोड़े ही समय में वे उस विभाग के विशेषज्ञ बन जाते हैं। विशेषज्ञ बनने पर अधिक व अच्छा काम कम से कम समय में होने लगता है।
(ii) दायित्वों का निर्धारण विभागीयकरण के अंतर्गत प्रत्येक विभागाध्यक्ष के दायित्वों का निर्धारण करना संभव हो जाता है।
यदि किसी कर्मचारी को एक काम न सौंप कर पूरी संस्था के काम सौंपे जाएं तो उसके दायित्व का निर्धारण करना कठिन होता है और प्रत्येक कर्मचारी विपरीत परिणामों की जिम्मेदारी अन्य कर्मचारियों पर डालने का प्रयास करता है। इसके विपरीत, दायित्व निर्धारण हो जाने पर सभी प्रबंधकों को स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। इस प्रकार उनका पूरा ध्यान एक ओर लग जाता है और परिणामतः उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।
(iii) प्रबंधन - योग्य इकाइयों की स्थापना विभागीयकरण के अंतर्गत संस्था में की जाने वाली सभी क्रियाओं को अनेक इकाइयों अथवा विभागों में बांट दिया जाता है।
इन छोटे-छोटे विभागों पर प्रबंधन करना आसान होता है। प्रत्येक विभाग के लिए एक अध्यक्ष नियुक्त कर दिया जाता है जिसे उस विशेष विभाग का ज्ञान एवं अनुभव होता
है। अपने ज्ञान एवं अनुभव का प्रयोग करके अध्यक्ष सभी कार्य समय पर एवं नियमबद्ध ढंग से पूरे करता है। इस प्रकार संस्था की साख में वृद्धि होती है।
(iv) वास्तविक कार्य का मापन संभव कार्य का विभाजन हो जाने पर प्रत्येक विभाग की कुशलता का माप किया जा सकता है।
सभी विभागों का प्रमाप निश्चित कर दिए जाते हैं और वास्तविक कार्य का प्रमापों से मिलान करके विचलनों का पता लगाया जाता है। इस प्रकार विपरीत परिणामों का पता लगने पर समय पर ही सुधारात्मक कार्यवाही की जा सकती है और संबंधित व्यक्तियों को जिम्मेदार भी ठहराया जा सकता है।
(v) बजट बनाने की सुविधा : क्योंकि प्रत्येक विभाग की लागतों की गणना आसानी से की जा सकती है इसलिए विभागीय बजट बनाने में सुविधा रहती है।
(vi) खर्चे पर नियंत्रण यदि पूरी संस्था को एक ही इकाई के रूप में चलाया जाए तो खचों पर नियंत्रण रखना कठिन होता हैं
जबकि पूरी संस्था को अनेक छोटी-छोटी इकाइयों में बांटकर खर्चों पर नियंत्रण रखना आसान होता है। एक विभाग की क्रियाएं एक ही व्यक्ति की देख-रेख में होती है। और उसे पता होता है कि कौन-कौन से खर्चे जरुरी हैं और कौन-कौन से नहीं। इस प्रकार विभागीकरण से खर्चों पर नियंत्रण संभव होता है।
(7) विशिष्टीकरण के लाभ विभागीयकरण का आधार विशिष्टीकरण में निहित है। अतः विभागीयकरण द्वारा संस्था को विशिष्टीकरण का लाभ प्राप्त होना स्वाभाविक है। जब एक व्यक्ति एक ही काम को बार-बार करता है तो वह उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बन जाता है और फिर वह अधिक व अच्छा काम, कम समय व कम लागत पर करने लगता है। यह विशिष्टीकरण के माध्यम से संस्था को प्राप्त होता है।
उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट होता है कि सभी बड़ी संस्थाओं के लिए विभागीयकरण आवश्यक है इसके माध्यम से संस्था के उद्देश्यो को आसानी से प्राप्त कर लिया जाता है।
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