प्रबंधन विचारधारा का नव परंपरागत दृष्टिकोण - Neoclassical Approach to Management Ideology
प्रबंधन विचारधारा का नव परंपरागत दृष्टिकोण - Neoclassical Approach to Management Ideology
प्रबंधन विचारधारा का नव परंपरागत दृष्टिकोण सन 1930 के आस-पास विकसित हुआ। इस दृष्टिकोण का आधार परंपरागत दृष्टिकोण ही है। इसके अंतर्गत परंपरागत दृष्टिकोण को कुछ सुधारों के साथ प्रस्तुत किया गया है। परंपरागत तथा नव-परंपरागत दृष्टिकोण में मुख्य अंतर मानवीय संसाधन के साथ किए जाने वाले व्यवहार का लेकर है। जहां एक ओर परंपरागत दृष्टिकोण के अंतर्गत, मानवीय संसाधन को अनदेखा करते हुए काम तथा भौतिक संसाधनों को महत्व दिया जाता था, वहीं दूसरी ओर, नव-परंपरागत दृष्टिकोण में मानवीय संसाधन के महत्व का समझा गया है। नये दृष्टिकोण के अंतर्गत व्यक्तिगत तथा समूहों के महत्व पर जोर दिया गया है। इस दृष्टिकोण के दो आधारभूत स्तंभ हैं:
मानवीय संबंध दृष्टिकोण तथा व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण 0 टेलर का वैज्ञानिक प्रबंधन दृष्टिकोण तथा फेयोल का प्रशासनिक प्रबंधन दृष्टिकोण दोनों ही उत्पादन कुशलता तथा कार्य स्थल पर मैत्रीपूर्ण व्यवहार स्थापित करने में असफल रहे। इनकी असफलता का मुख्य कारण मानवीय संसाधन की ओर ध्यान न दिया जाना था। मानवीय संबंध दृष्टिकोण की उत्पत्ति का भी यही कारण है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एल्टन मेयो ने पहली बार मानवीय संबंध दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। इस दृष्टिकोण को अंतिम रूप देने के लिए मेयो ने अपने सहयोगियों के साथ कुछ प्रयोग किए। इन प्रयोगों को हॉथोर्न प्रयोग के नाम से जाना जाता है।
ये प्रयोग 1927 से 1932 के यू.एस.ए. की वैस्टर्न इलैक्ट्रिक कम्पनी के हॉथोर्न प्लॉट में हुए थे।
इन प्रयोगों के हॉथोर्न में होने के कारण ही इन्हें हॉथोर्न प्रयोग कहा जाता है। इस प्लॉट में टेलिफोन के पुर्जे तैयार किये जाते थे जहां 29000 श्रमिक काम करते थे। अपने प्रयोगों के दौरान मेयो एवं साथियों ने निम्नलिखित तत्वों का अध्ययन किया:-
> रोशनी एवं उत्पादकता में संबंध
> कार्य की दशाओं एवं उत्पादकता में संबंध (कार्य की दशाओं में रोशनी, हवा, विश्राम की अवधि, विश्राम की बारंबारता आदि को सम्मिलित किया जाता है।
अनौपचारिक समूह एवं उत्पादकता में संबंध तथा > आर्थिक प्रेरणाओं एवं उत्पादकता में संबंध
इन प्रयोगों का यह परिणाम निकला कि उत्पादकता का संबंध उतना कार्य की दशाओं से नहीं है, जितना कि भावनात्मक तत्वों से है। मेयो तथा उसके साथी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कार्य के समय श्रमिकों के मध्य अनौपचारिक संबंध महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उन्होंने कहा कि श्रमिक केवल उत्पादन का साधन नहीं हैं बल्कि वह एक सामाजिक प्राणी भी है जिसकी कुछ इच्छाएँ भावनाएँ एवं प्रवृत्तियां हैं। यदि श्रमिक को एक सामाजिक प्राणी की दृष्टि से देखा जाए तो वह निश्चित रूप से अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने बताया कि उच्च उत्पादन एवं कर्मचारी सन्तुष्टि परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हैं। मानवीय संबंध का अर्थ भी यही है।
मानवीय संबंध दृष्टिकोण के मूल्यांकन के लिए इसके महत्व एवं सीमाओं का अध्ययन किया जाना जरुरी है। इसका वर्णन इस प्रकार है:- महत्व अथवा योगदान
इस दृष्टिकोण का महत्व इसके अंतर्गत दिए गए निम्नलिखित सुझावों से स्पष्ट होता है:
■ कार्य की दशाओं एवं उत्पादकता में कोई संबंध नहीं है
. एक श्रमिक की कार्यकुशलता पर अवित्तिय पुरस्कारों का अच्छा प्रभाव पड़ता है
■ जनतंत्रीय नेतृत्व शैली उत्पादन प्रधान शैली से अधिक प्रभावशाली है
कारखाना व्यक्तियों का स्थान मात्र नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक संगठन है।
अतः श्रमिकों को सामाजिक सन्तुष्टि प्रदान की जानी चाहिए
■ श्रमिकों के मनोविज्ञान का बहुत महत्व होता है। अतः उसे समझा जाना चाहिए
• श्रमिको को निर्णयों में भागीदार बनाना चाहिए
श्रमिकों के मान-सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए
कार्य के दौरान नियमित अंतराल पर विश्राम की व्यवस्था होनी चाहिए
• श्रमिकों को समूह में कार्य करने से अधिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है
श्रमिकों को सभी सूचनाओं से अवगत रखना चाहिए
सीमाएँ
इस दृष्टिकोण की मुख्य सीमाएँ निम्नलिखित हैं:
• इस दृष्टिकोण में मानवीय तत्व पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया है तथा शेष तत्वों को
अनदेखा कर दिया गया है।
• यह मानना कि व्यवसायिक संगठन को एक परिवार के रूप में स्थापित किया जा सकता है गलत है,
क्योंकि इसमें अनेक धर्मों, जातियों व रुचियों के लोग काम करते हैं। ये लोग अलग-अलग समूह तो बना लेते हैं, परिवार नहीं
• सभी श्रमिकों को अवित्तिय पुरस्कारों से खुश करना असंभव है। • यह मानना कि लोग अनौपचारिक समूहों में अधिक सन्तुष्ट रहते हैं, गलत है। इस संदर्भ में कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि श्रमिक कारखानों में काम करने आते हैं। न कि अनौपचारिक समूह बनाने।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि मानवीय संबंध दृष्टिकोण का केंद्र बिंदु व्यक्ति है। इस दृष्टिकोण के अनुसार एक सन्तुष्ट व्यक्ति की उत्पादकता अपेक्षाकृत अधिक होती है।
(ii) व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण
मानवीय संबंध प्रबंधन दृष्टिकोण में कहा गया है कि सन्तुष्टि व उत्पादकता में सीधा संबंध है
अर्थात श्रमिक जितने अधिक सन्तुष्ट होंगे उतना ही अधिक उत्पादन करेंगे। व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण का ही एक सुधरा हुआ रूप है। इसके अंतर्गत मानवीय संबंधों के स्थान पर मानव के व्यवहार का अध्ययन किए जाने की बात कही गई है। इस दृष्टिकोण के प्रवर्तक डगलस मेक्ग्रेगर, चस्टर आई. बरनार्ड, रेनसिस लिकर्ट, क्रिस आर्गरिस, फ्रैडरिक हर्जबर्ग, वारेन जी. बेनिस, क्रिस पार्कस फोलेट, अब्रहम माशलो, तथा राबर्ट टेनिन बॉम हैं। व्यवहारात्मक वैज्ञानिकों का मुख्य योगदान नेतृत्व, संदेशवाहन अभिप्रेरणा, संगठनात्मक परिवर्तन, संगठनात्मक झगड़े आदि क्षेत्रों में रहा। व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण 1940 के बाद प्रचलन में आया। व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण के कुछ प्रवर्तकों द्वारा किए गए योगदान का विवरण इस प्रकार है:-
(क) अब्राहम माशलो माशलो ने आवश्यकता - प्राथमिकता सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
इस सिद्धान्त के अनुसार, मनुष्य की आवश्यकताएं अनेक होती हैं तथा उनका क्रम निर्धारित किया जा सकता है। जैसे ही मनुष्य की पहली आवश्यकता पूरी होती है वह दूसरी के बारे में चिंतित हो जाता है और यह क्रम चलता रहता है। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि मनुष्य की आवश्यकताएं ही उसके लिए अभिप्रेरण का काम करती है।
(ख) फ्रेडरिक हर्जबर्ग हर्जबर्ग के अनुसार, अभिप्रेरक तत्वों के साथ-साथ अनुरक्षक तत्त्व भी श्रमिकों के उत्साह में वृद्धि करते हैं।
(TT) डगलस मैक्ग्रेगर': मैक्ग्रेगर ने अभिप्रेरणा की परंपरागत विचारधारा को एक्स' विचारधारा तथा आधुनिक विचारधारा को 'वाई' विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया ।
(घ) रेनसिस लिकर्ट: अपने शोधकार्य के दौरान लिकर्ट ने अनेक प्रबन्धकों से संपर्क स्थापित किया और निष्कर्ष के रूप में चार मॉडल प्रस्तुत किये। इन्हें लिकर्ट की प्रबंधप्रणाली कहते हैं।
(ङ) राबर्ट टेनिनबॉमः टेनिनबॉम ने नेतृत्व व्यवहार की निरंतरता का प्रतिपादन किया। टेनिकवॉम के अनुसार, ऐसा संभव नहीं है कि किसी एक नेतृत्व शैली को सभी परिस्थितियों में लागू किया जा सके। इसलिए इन्होंने एक-दो नहीं बल्कि सात नेतृत्व शैलियों का वर्णन किया।
व्यवहारात्मक विज्ञान दृष्टिकोण के प्रवर्तकों ने मानव व्यवहार का अध्ययन करने के बाद निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत किए
• कर्मचारियों को नीति-निर्धारण में हिस्सा प्रदान करना चाहिए • कर्मचारियों से मानवता का व्यवहार करना चाहिए
प्रबंधन का कर्तव्य है कि स्वस्थ वातावरण प्रदान करे
• थोपे गए नियंत्रण के स्थान पर स्वतः नियंत्रण की पद्धति को अपनाना चाहिए
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