नियोजन प्रक्रिया - planning process
नियोजन प्रक्रिया - planning process
जब हम नियोजन को प्रबंधन के सम्बन्ध में देखते हैं तो प्रबंधन का एक अंग होने के कारण इस क्रिया को नियोजन प्रक्रिया कहा जाता है। दूसरी ओर जब इसका व्यक्तिगत रुप से अध्ययन किया जाता है तो यह प्रक्रिया कहलाती है, क्योंकि इसे पूरा करने के लिए एक के बाद एक अनेक सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। जहां तक नियोजन प्रक्रिया में सम्मिलित सीढ़ियों / कदमों का प्रश्न है ये समस्या के आकार पर निर्भर करता हैं। भिन्न सस्थाओं में नियोजन प्रक्रिया भिन्न हो सकती है।
नियोजन की आवश्यकता किसी समस्या को सुलझाने या किसी अवसर का लाभ उठाने के लिए होती है। इसी संदर्भ में एक प्रबंधक उपक्रम की ताकत व कमजोरी का विश्लेषण करता है।
इस विश्लेष में उपक्रम के आंतरिक एवं बाहरी वातावरण का ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए वहां कारखाने स्थापित करने को प्राथमिकता दे रही है तो एक बुद्धिमान प्रबंधक निश्चित रूप से इस अवसर का लाभ उठाना चाहेगा। यहीं से नियोजन प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। व्यवसायिक संस्थाओं में नियोजन प्रक्रिया में प्रायः निम्नलिखित कदम निहित होते हैं:
उद्देश्य निर्धारित करना उद्देश्य ये अंतिम बिंदु होते हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए समस्त क्रियाएं की जाती है। नियोजन प्रक्रिया में सर्वप्रथम उद्देश्यों को निर्धारित एवं परिभाषित किया जाता है
ताकि सभी संबंधित कर्मचारियों को इनकी जानकारी हो जाए और वे इन्हें प्राप्त करने में पूरा योगदान दे सकें। उद्देश्यों का एक प्राथमिकता क्रम होता है जैसे- संस्थागत उद्देश्य, विभागीय उद्देश्य व व्यक्तिगत उद्देश्य इसी क्रम में इन्हें निर्धारित एवं परिभाषित किया जाता है।
उदाहरण के लिए, एक कम्पनी अपने बिक्री को 2000 करोड़ रुपये तक ले जाना चाहती है। (यह कम्पनी का संस्थागत उद्देश्य है) इस उद्देश्य को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है - माना कम्पनी के चार प्रमुख उत्पाद हैं
जिनकी अपेक्षित बिक्री क्रमशः 1000 करोड़ रुपये, 500 करोड़ रुपये, 300 करोड़ रुपये व 200 करोड़ रुपये निर्धारित की जाती है। इसी संदर्भ में अन्य सभी विभागों के उद्देश्य निर्धारित किए जाऐंगे जैसे उत्पादन विभाग को जानकारी प्राप्त हो जाएगी कि उसे किस-किस उत्पाद का कितना-कितना उत्पादन करना है। अंत में प्रत्येक विभाग में कार्यरत कर्मचारियों को बता दिया जाएगा कि उनसे क्या अपेक्षित है। सीमाएँ विकसित करना नियोजन आधार अथवा सीमाएँ वे तत्व / मान्यताएं होती हैं जो विभिन्न विकल्पों के संभावित परिणामों को प्रभावित करती हैं। किसी विकल्प के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पहले इन मान्यताओं के पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। जितने अधिक पूर्वानुमान सही होंगे नियोजन उतना ही अधिक सफल रहेगा। नियोजन के आधार दो प्रकार के होते हैं:
(ii) (क) आंतरिक आधार पूंजी, श्रम, कच्चा माल, मशीन आदि ।
(ख) बाहरी आधार: सरकारी नीतियां, व्यवसायिक प्रतियोगिता, ग्राहकों की रुचि, ब्याज दर कर दर आदि ।
उदाहरण के लिए, एक कम्पनी अपने व्यवसाय का विस्तार करना चाहती है। कम्पनी के पास ग्रामीण क्षेत्र में कारखाना स्थापित करना एक विकल्प है। यहां पूंजी, माल व श्रम की उपलब्धता इसके आंतरिक आधार हो सकते हैं तथा सरकार की औद्योगिक नीति बाहरी आधार प्रबंधक को इन सभी आधारों का पूर्वानुमान लगाना होगा। अन्य शब्दों में, यह देखना होगा कि आवश्यक पूंजी, कच्चा माल व श्रम उपलब्ध हो सकेगा। इसी प्रकार देखना होगा कि कहीं सरकार की औद्योगिक नीति इस तरह की औद्योगिक इकाई की स्थापना का विरोध तो नहीं करेगी?
(iii) वैकल्पिक कार्यवाहियों की पहचान करनाः प्रायः कोई भी कार्य ऐसा नहीं होता कि. वैकल्पिक मार्ग न हो। संस्था के उद्देश्यों के आधार पर एक ही कार्य करने के अनेक तरीकों की खोज की जा सकती है। उदाहरणार्थ, यदि किसी संस्था का उद्देश्य अपना व्यवसाय बढ़ाने का है तो इस उद्देश्य की पूर्ती अनेक तरीकों से की जा सकती है। जैसे-
(क) पहले से चल रहे व्यवसाय का विस्तार करके माना एक कम्पनी किसी एक साईकिल का निर्माण कर रही है। व्यवसाय को बढ़ाने के उद्देश्य से कम्पनी द्वारा अनेक साईज़ के साईकिल (बच्चों / पुरुष / महिला) बनाना प्रारंभ किया जा सकता है।
(ख) दूसरे क्षेत्रों में उत्पादन प्रारंभ करके साईकिल बनाने वाली कम्पनी मोटरसाईकिल बनाना प्रारंभ कर सकती है।
(ग) दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर कोई व्यवसाय प्रारंभ कर सकती है। जैसे भारत में हीरो साईकिल ने जापान की होंडा कम्पनी के साथ मिलकर मोटरसाइकित का उत्पादन किया था।
(घ) किसी दूसरी संस्था को खरीद सकती है: आदि ।
(iv) वैकल्पिक कार्यवाहियों का मूल्यांकन करना वे सभी विकल्प जो न्यूनतम प्रारंभिक मापदण्ड के आधार पर खरे उतरते हैं उन्हें गहन अध्ययन के लिए चुन लिया जाता है। यहां पर यह देख जाएगा कि प्रत्येक विकल्प संस्था के उद्देश्यों को कहां तक पूरा करता है। विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करने पर प्रायः एक समस्या सामने आती है वह यह कि सभी विकल्पों के अपने-अपने गुण दोष होते हैं।
अर्थात एक विकल्प किसी एक मापदण्ड पर खरा उतरता है तो दूसरा किसी दूसरे मापदण्ड पर । उदाहणार्थ- एक विकल्प बहुत लाभदायक हो सकता है लेकिन उसमें बहुत अधिक पूंजी विनियोग की आवश्यकता है और उसका लाभ अर्जित करने का समय भी अधिक है। एक अन्य विकल्प में पूंजी विनियोग भी कम चाहिए तथा उसका लाभ अर्जित करने की अवधि भी कम है। लेकिन वह अधिक लाभदायक नहीं है। ऐसी स्थिति में नियोजनकर्ता को विभिन्न विकल्पों के मिश्रण के रूप में एक नया विकल्प खोजना चाहिए।
(v) एक विकल्प का चयन करना विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करके सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव कर लिया जाता है। कई बार मूल्यांकन के आधार पर एक से अधिक विकल्प एक जैसे गुणों वाले प्राप्त हो जाते हैं।
भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए एक से अधिक अच्छे विकल्पों का चयन करना न्यायसंगत भी है। एक विकल्प को लागू करके दूसरे को रिजर्व में रख लिया जाता है और यदि पूर्वानुमान गलत हो जाए तो पहला विकल्प असफल हो जाने के कारण रिजर्व में रखे गए विकल्प को तुरंत लागू करके असफलता से बचा जा सकता है।
(vi) योजना को लागू करना मुख्य योजना तथा सहायक योजनाओं का निर्धारण कर लेने के बाद उन्हें लागू करना होता है। योजनाओं को लागू करने के बाद विभिन्न क्रियाओं का क्रम निर्धारित कर दिया जाता है
अर्थात यह निश्चित कर दिया जाता है कि कौन क्या करेगा और किस समय करेगा। इससे उद्देश्यों को प्राप्त करना सरल हो जाता है।
(vii) समीक्षा करना योजनाएं लागू कर देने से ही नियोजन प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती। योजनाएं भविष्य के लिए बनाई जाती हैं और भविष्य अनिश्चित होता है। अनिश्चित भविष्य में सफलता सुनिश्चित करने के लिए योजनाओं की प्रगति की लगातार समीक्षा करते रहना जरुरी है। जैसे ही उन मान्यताओं में जिन पर योजनाएं आधारित हैं परिवर्तन होता नजर आए योजनाओं में भी आवश्यक फेर-बदल कर दिया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नियोजन एक निरंतर चालू रहने वाली प्रक्रिया है।
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