प्रबंधन के सिद्धान्त - principles of management
प्रबंधन के सिद्धान्त - principles of management
आज व्यवसाय ने विस्तृत रूप धारण कर लिया है जिसके कारण दिन प्रतिदिन के कार्यों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं और उपक्रम के प्रबन्धकों को इन समस्याओं का समाधान करना पड़ता है। समस्याओं का समाधान करने एवं व्यवसाय को कुशलतापूर्वक तथा ठीक तरीके से चलाने के लिए प्रबन्धकों को मार्गदर्शन की जरुरत होती है। प्रबंधन के सिद्धान्त प्रबन्धकों का मार्ग दर्शन करते हैं। प्रबंधन के सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या करने से पहले सिद्धान्त शब्द का अर्थ समझना जरुरी है। विभिन्न विद्वानों ने सिद्धान्त को निम्न प्रकार से पारिभाषित किया है :
0 जी. आर. टेरी के अनुसार, "सिद्धान्त एक आधारभूत कथन अथवा सत्य है जो विचार या कार्य का मार्ग-दर्शन करता है"।
(ii) ऐडविन. वी. फिलिप्पो के अनुसार, सिद्धान्त एक आधारभूत सत्य होता है और सामान्यतः यह कारण एवं परिणाम में सम्बन्ध की व्याख्या करता है।
(iii) कूण्टज़ तथा डोनेल ने प्रबन्धकीय सिद्धान्तों की परिभाषा इस प्रकार दी है. "प्रबन्धकीय सिद्धान्त सामान्य वैधता के आधारभूत सत्य हैं जो प्रबन्धकीय क्रियाओं के परिणामों का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता रखते हैं।" सिद्धान्त की परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि ये किसी विषय के ऐसे आधारभूत सत्य के रूप में होते हैं जो कारण एवं परिणाम के संबंध को व्यक्त करते हैं और इनको तैयार करने में विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
प्रबंधन के सिद्धान्तों की प्रकृति
प्रबंधन के सिद्धान्तों की प्रकृति निम्न तथ्यों से स्पष्ट होती है :
(1) सार्वभौमिक अनुकूलताः सार्वभौमिकता का अभिप्राय उस सत्य से है जो सभी क्षेत्रों ( व्यावसायिक एवं गैर-व्यावसायिक) में समान रूप से लागू होता है और प्रबंधन के सिद्धान्तों में यह गुण विद्यमान है। प्रत्येक व्यावसायिक (औद्योगिक उपक्रम) तथा गैर-व्यावसायिक संस्था (शिक्षण संस्थाएं खेल का मैदान, कृषि फार्म, सेना, क्लब एवं अन्य सामाजिक संस्थान) सभी को अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु लगभग एक समान सिद्धान्तों को अपनाना होता है।
(ii) सामान्य मार्ग निर्देशन प्रबंधन के सिद्धान्त भौतिक एवं रसायन शास्त्रों के सिद्धान्तों की भांति कठोर नहीं है।
भौतिक एवं रसायन शास्त्रों के सिद्धान्तों को जैसा लिखा गया है वे उसी भांति पूर्णरूप से खरे उतरते हैं, जबकि प्रबंधन के सिद्धान्त सामान्य मार्ग निर्देशन के रूप में होते हैं और इनको कठोरता से लागू नहीं किया जा सकता।
(iii) अभ्यास एंव प्रयोगों द्वारा निर्धारण प्रबंधन के सिद्धान्त पेशेवर लोगों के सामने उपस्थित हुई अनेक समस्याओं के परिणाम हैं। पहले समस्याएँ उत्पन्न हुई, फिर उनके समाधान का प्रयास किया गया तथा इसी प्रयास में अनेक शोधकार्य सम्पन्न हुए और अंततः समाधान ढूंढ लिए गए। इस प्रकार अभ्यास द्वारा ढूंढे गए समाधानों को ही हम प्रबंधन के सिद्धान्त के रूप में जानते हैं।
(iv) लोचशीलता प्रबंधन के सिद्धान्त जो आज उपलब्ध हैं वे अन्तिम सत्य के रूप में नहीं हैं।
जैसे-जैसे राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तन हो रहे हैं और नई नई समस्याएँ सामने आ रही हैं तो पुराने सिद्धान्तों में सुधार किए जा रहे हैं और नए सिद्धान्तों का जन्म हो रहा है। अतः प्रबंधन के सिद्धान्त गतिशील प्रकृति के हैं अर्थात उन्हें स्थाई नहीं कहा जा सकता।
(v) मुख्यतः व्यवहारात्मक प्रबंधन के सिद्धान्तों का सीधा संबंध मानवीय व्यवहार से है। प्रबंधन के अंतर्गत मुख्य रूप से मानव का ही प्रबंधन किया जाता है और मानव एक सामाजिक प्राणी है जिसकी अपनी इच्छाएँ, स्वभाव व अपेक्षाएँ होती हैं। अर्थात उसे किसी बंधन में नहीं बांधा जा सकता है।
यही कारण है कि प्रबंधन के सिद्धान्त मानवीय व्यवहार से प्रभावित होते हैं और कई बार यही मानवीय व्यवहार प्रबंधन के सिद्धान्तों के बीच में अवरोध बन कर खड़ा हो जाता है। उदाहरण के लिए कार्य विभाजन का सिद्धान्त कुशलता वृद्धि के लिए अपनाया जाता है लेकिन एक ही काम को बार-बार करते रहने से व्यक्ति ऊबने लगता है (यही मानवीय व्यवहार है ) और कार्यकुशलता कम हो जाती है। अतः प्रबंधन के सिद्धान्तों के सीमित उपयोग होने की प्रकृति है।
(vi) कारण व परिणाम संबंध प्रबंधन के सिद्धान्त कारण व परिणाम में संबंध स्थापित करते हैं। अर्थात ये स्पष्ट करते हैं कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में एक विशेष ढंग से काम किया जाए तो उसके ये परिणाम होंगे।
उदाहरण के लिए, यदि कार्य विभाजन के सिद्धान्त के अनुसार, सम्पूर्ण कार्य को अनेक भागों में बांट दिया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी रुचि एवं योग्यता के अनुसार कार्य सौंपा जाए तो कार्यकुशलता में वृद्धि होगी। यहां काम का बंटवारा कारण है और कार्यकुशलता में वृद्धि परिणाम प्रबंधन के अन्य सिद्धान्त भी इसी प्रकार कारण व परिणाम में सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
(vii) अनिश्चित प्रबंधन के सिद्धान्त निश्चित नहीं हैं। इन पर परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। अतः परिस्थितियों के अनुसार ही इन्हें लागू करने अथवा न करने का निर्णय लिया जाता है। उदाहरण के लिए, कार्य विभाजन के सिद्धान्त के अनुसार एक कर्मचारी को कुल काम का एक विशेष हिस्सा ही बार -बार सौंपना चाहिए ताकि उसकी कुशलता में वृद्धि हो। लेकिन यदि एक ही काम को बार-बार करने में वह तंग आ चुका है तो इस सिद्धान्त को लागू करने से लाभ नहीं होता। अतः इसमें परिवर्तन की आवश्यकता होगी।
वार्तालाप में शामिल हों