वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धान्त - principles of scientific management
वैज्ञानिक प्रबंधन के सिद्धान्त - principles of scientific management
एफ.डब्लयू टेलर द्वारा प्रतिपादित प्रबंधन की वैज्ञानिक विचारधारा निम्नलिखित पांच सिद्धान्तों पर आधारित है:
(1) रुढ़िवादी के स्थान पर विज्ञान के प्रयोग का सिद्धान्तः इस सिद्धान्त के अनुसार, एक संस्था के अंदर जो भी काम किया जाए उसके प्रयोग हिस्से की गहन जांच करनी चाहिए ताकि काम करने की एक ऐसी पद्धति का विकास किया जा सके जिससे अधिक व बढ़िया काम न्यूनतम लागतों पर संभव हो यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि हमें लकीर का फकीर बन कर काम की पुरानी पद्धतियों को ही नहीं अपनाते रहना चाहिए बल्कि हर समय नये-नये उपयोगों द्वारा नवीनतम पद्धतियों की खोज करके अपने काम को सरल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
(ii) श्रमिकों के वैज्ञानिक चयन एवं प्रशिक्षण का सिद्धान्तः इस सिद्धान्त के अनुसार, श्रमिकों का चयन एवं प्रशिक्षण वैज्ञानिक रीति से किया जाना चाहिए।
संस्था में किए जाने वाले सभी कार्यों में से श्रमिकों के चयन का कार्य अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि एक गलत नियुक्ति संस्था के पूरे वातावरण को दूषित कर सकती है। श्रमिकों के वैज्ञानिक चयन का अभिप्राय किसी काम के लिए वांछित योग्यता रखने वाले व्यक्तियों का चयन करना है। श्रमिकों का ठीक ढंग से चयन कर लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसको समय-समय पर आवश्यक प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।
उत्तम तरीकों से दिया गया प्रशिक्षण श्रमिकों की कार्यकुशलता में निखार लाता है।
जिसका लाभ स्वयं श्रमिकों को व संस्था दोनों को प्राप्त होता है।
(iii) श्रम एवं प्रबंधक के मध्य सहयोग का सिद्धान्तः इस सिद्धान्त के अनुसार, संस्था के अंदर ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें श्रम (उत्पादन का मुख्य साधन) एवं प्रबंधक दोनों एक-दूसरे को अपना पूरक समझें। अर्थात श्रमिक वर्ग यह समझे कि प्रबंधन वर्ग के सहयोग के बिना उसका काम नहीं चल सकता और प्रबंधन वर्ग यह समझे कि श्रमिक वर्ग के सहयोग के बिना उसका अस्तित्व खतरे में है ऐसी भावना जागृत हो जाने पर दोनों वर्ग एक ही लक्ष्य ( अर्थात अधिक व अच्छा उत्पादन) का पीछा करें और सफलता निश्चित रूप से उनके कदमों में होगी। टेलर ने ऐसी अवस्था को मानसिक क्रान्ति का नाम किया है। उनका विश्वास है कि यदि दोनों पक्षों में मानसिक क्रान्ति आ जाये तो उनके सभी झगड़े समाप्त हो जाएंगे। परिणामस्वरुप दोनों वर्गों को अधिक लाभ की प्राप्ति होगी।
(iv) अधिकतम उत्पादन का सिद्धान्त: इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रबंधन वर्ग एवं श्रमिक वर्ग दोनों को अधिकतम उत्पादन करने का पूरा प्रयास करना चाहिए, अर्थात संस्था में उपलब्ध साधनों से जितना अधिक से अधिक उत्पादन हो सके उस लक्ष्य तक पहुंचने में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए। इसका सीधा प्रभाव संस्था के लाभों पर पड़ेगा अर्थात लाभ अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा अधिक लाभ होने के कारण संस्था में काम करने वाले सभी व्यक्तियों को अधिक पारिश्रमिक प्राप्त होगा और परिणाम स्वरूप वे संस्था के प्रति अधिक वफादार होंगे।
(v) समान उत्तरदायित्व विभाजन का सिद्धान्त: इस सिद्धान्त के अनुसार संस्था को दो मुख्य वर्गों (प्रबंधन वर्ग एवं श्रमिक वर्ग) में काम एवं उससे संबंधित दायित्वों का स्पष्ट बंटवारा कर देना चाहिए।
जो वर्ग जिस काम को अधिक कुशलता से कर सके उसे वही काम सौंपना चाहिए। जैसे-एक काम को पूरा करने का समय प्रबन्धकों द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए जबकि इसको कार्यरूप देने का उत्तरदायित्व श्रमिकों को सौंपना चाहिए। इस प्रकार यदि समय का ठीक से निर्धारण न किया गया तो इसके लिए प्रबंधक उत्तरदायी होगा और यदि काम को ठीक से प्रकार पूरा न किया गया तो इसके लिए श्रमिक उत्तरदायी होंगे। इस सिद्धान्त को लागू करने पर न तो सारा श्रेय किसी एक वर्ग को मिलेगा और न ही सारा उत्तरदायित्व किसी एक वर्ग पर थोपा जा सकेगा।
(ख) फ्रँक व लिलियन गिलब्रेथ का योगदान
वैज्ञानिक प्रबंधन के विकास में फ्रैंक गिलब्रेथ तथा उसकी पत्नी लिलियन गिलब्रेथ के योगदान का बहुत महत्व है।
इन्होंने गति अध्ययन में विशेष योगदान दिया। गति अध्ययन के अंतर्गत व्यक्तियों एवं मशीनों द्वारा काम के दौरान की जाने वाली हरकतों (जैसे उठाना, रखना, पकड़ना, दबाना, घुमाना, जोड़ना, छेद करना आदि) का गहन अध्ययन किया गया। अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि अनेक ऐसी अनावश्यक हरकतें हैं, जिन्हें खत्म किया जा सकता है। इतना ही नहीं बल्कि आवश्यक हरकतों को भी न्यूनतम किया जा सकता है। इस प्रकार काम करने के तरीकों में सुधार करके कार्यकुशलता में असंभावित वृद्धि की जा सकती है।
एक प्रयोग के दौरान जोकि फ्रैंक गिलब्रेथ ने किया था. यह पाया गया कि भवन निर्माण का काम करने वाला एक राज एक ईंट लगाने में 18 बार हरकतें करता है।
लेकिन अनावश्यक हरकतों को कम करके इनको केवल 5 तथा कुछ दशाओं में केवल 2 तक सीमित किया जा सकता है।
इन्होंने गति अध्ययन के साथ-साथ समय अध्ययन भी किया। समय अध्ययन के अंतर्गत यह निश्चित किया जाता है कि एक काम को पूरा करने में कितना प्रमापित समय लगना चाहिए। प्रमापित समय का अभिप्राय किसी काम को पूरा करने में लगने वाले ऐसे समय से है, जो सामान्य परिस्थितियों में एक औसत श्रमिक को लगाना चाहिए।
श्रीमति गिलब्रेथ जोकि मनोविज्ञान में पी.एच.डी. थीं, ने उद्योग में मानवीय तत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने थकान के मनोवैज्ञानिक प्रभावों की व्याख्या की। इस प्रकार गिलब्रेथ दंपति ने वैज्ञानिक प्रबंधन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(ग) हेनरी एल. गैंट का योगदान
गैंट ने मजदूरी निर्धारण की कार्य एवं बोनस योजना प्रारम्भ की। इस योजना में समय, कार्य एवं मजदूरी दर प्रति इकाई प्रमापित कर दी जाती है। कार्य क्षमता के
आधार पर दी जाती है और कार्यक्षमता के आधार पर श्रमिकों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाता है, जैसे-
प्रमापित कार्य से कम काम करने वाले श्रमिक इन्हें समयानुसार मजदूरी का भुगतान किया जाता है।
(ii) प्रमापित कार्य के बराबर काम करने वाले श्रमिक - इन्हें समयानुसार अथवा कार्यानुसार (दोनों से बराबर मजदूरी आती है) मजदूरी के अतिरिक्त 20 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बोनस दिया जाता है।
(iii) प्रमापित कार्य से अधिक काम करने वाले श्रमिक- इन्हें कार्यानुसार मजदूरी के अतिरिक्त कार्यानुसार मजदूरी पर 20 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बोनस दिया जाता है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि मजदूरी निर्धारण की इस योजना में न्यूनतम मजदूरी की गारंटी होती है और कुशल श्रमिकों को अकुशल श्रमिकों की अपेक्षा अधिक मजदूरी प्राप्त होती है। इस योजना में बोनस की अच्छी दर होने के कारण यह सभी श्रमिकों को अधिक काम करने के लिए प्रेरित करती है। गैंट ने यह भी कहा था कि उन पर्यवेक्षकों को भी बोनस दिया जाना चाहिए जो अपने श्रमिकों से वांछित स्तर तक काम लेने में सफल रहते हैं।
गैंट ने श्रमिकों की कुशलता के स्तर को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की सलाह भी दी।
प्रत्येक श्रमिक के काम को एक बार चार्ट पर प्रदर्शित किया जाता था। जो श्रमिक अपने काम को पूरा कर लेते उनके बार चार्ट को काली स्याही से और जो अपना काम पूरा न कर पाते, उनके बार चार्ट को लाल स्याही से भरा जाता था। गैंट का मानना था कि ऐसा करने से श्रमिकों पर प्रतिपादित काम को पूरा करने का मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है और परिमाणत: वे अधिक से अधिक काम करने का प्रयास करते हैं।
(ii) प्रशासनिक प्रबन्धन
प्रबंधन की प्रशासनिक प्रबंधन विचारधारा का प्रतिपदान हेनरी फेयोल ने किया। इस विचारधारा को प्रक्रिया प्रबंधन भी कहा जाता है।
जिस प्रकार टेलर को वैज्ञानिक. प्रबंधन का पिता कहा जाता है, ठीक उसी प्रकार फेयोल को प्रशासनिक प्रबन्ध का पिता कहा जाता है। इन्होंने प्रबंधन का ज्ञान फांस की कई बड़ी कम्पनियों में प्रबंधक के रूप में काम करके प्राप्त किया।
फेयोल ने अपना कैरिअर 1860 में फ्रांस के एक कम्पनी में जूनियर इंजीनियर के रूप में प्रारंभ किया। सन 1872 मे उन्हें वरिष्ठ प्रबंधक तथा 1888 में उसी कम्पनी में मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त कर लिया गया। जब वे इस कम्पनी में आये तब कम्पनी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी और कम्पनी दिवालीयापन के कगार पर थी। उन्होंने अपनी योग्यता के बल पर न केवल इस कम्पनी को दिवालिया होने से बचाया बल्कि उसे एक समृद्ध कम्पनी में बदल दिया।
फेयोल अनेक प्रयोगों के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रबंधन क्रिया, लेखांकन, विक्रय, उत्पादन, तथा वित्त संबंधी क्रियाओं से भिन्न एक ऐसी विशेष क्रिया है जिसको सभी संगठनों (व्यवसायिक तथा गैर-व्यवसायिक) में एक ही तरह से पूरा किया जाता है। फेयोल ने इस निष्कर्ष से प्रबंधन की दो विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-
(1) प्रबंधन एक क्रिया है जो अन्य व्यवसायिक क्रियाओं से भिन्न है तथा
(2) प्रबंधन में सार्वभौमिकता का गुण है।
प्रथम विषेशता का स्पष्टीकरण: फेयोल ने सभी व्यवसायिक क्रियाओं को 6 भागों में विभक्त किया है जिसमें से प्रबंधक्रिया भी एक है ये 6 क्रियाएँ निम्नलिखित हैं:
(i) तकनीकी क्रियाएँ: उत्पादन संबंधी क्रियाएँ।
(ii) वाणिज्यिक क्रियाएँ: क्रय विक्रय संबंधी क्रियाएँ
(iii) वित्तिय क्रियाएँ: वित संबंधी क्रियाएँ
(iv) सुरक्षा क्रियाएँ: सम्पत्ति एवं लोगों की सुरक्षा संबंधी क्रियाएँ। (v) लेखांकन क्रियाएँ लेखे रखने संबंधी क्रियाएँ
(vi) प्रबन्धकीय क्रियाएँ: प्रबन्धकीय क्रियाओं में नियोजन, संगठन, समन्वय, आदेश देना एवं नियंत्रण आदि को सम्मिलित किया जाता है।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रबंधन एक क्रिया है जिसे पूरा करने के लिए नियोजन, संगठन, नियुक्तियां, निर्देशन, नियंत्रण आदि उप क्रियाओं को सम्पन्न किया जाता है ।
दूसरी विशेषता का स्पष्टीकरणः फेयोल ने यह स्पष्ट किया कि प्रबंधन एक ऐसी क्रिया है जो व्यावसायिक तथा गैर व्यावसायिक सभी संगठनों में समान रूप से लागू होती हैं। इसका अभिप्राय यह है कि प्रबंधन के अंतर्गत जो भी किया जाता है वह सभी संगठनों में समान रूप से किया जाता है। फेयोल ने प्रबंधन के पांच कार्य और चौदह सिद्धान्त प्रस्तुत किये, और कहा कि जो संगठन इनकी पालना करेगा, उसे सफलता अवश्य प्राप्त होगी।
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