अधिकार या सत्ता के स्रोत - source of authority or power

अधिकार या सत्ता के स्रोत - source of authority or power


अधिकार अपने कार्यक्षेत्र में स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार से लेकर अपना कार्य कुशलतापूर्वक करने के लिए निश्चित धनराशी खर्च करने, संस्था को अपने वचन से वचनबद्ध करने का अधिकार तक कुछ भी हो सकता है। प्रबंधन के क्षेत्र में यह अधिकार सहायक लोगों का आदेश देने तथा उनसे आदेश पूर्ती करने से संबंध रखता है। अधिकार के उपयोग का मुख्य उद्देश्य अधीनस्थों के व्यवहार को इस प्रकार प्रभावित करना है कि वे संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए जाते हैं क्योंकि किसी भी संगठन के संस्थापक उस संगठन के अधिकार स्त्रोत कहलाते हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में ये नीचे से या बराबर के स्रोत से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।


औपचारिक अधिकार सत्ता की विचारधारा इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक अधिकारी को सत्ता अपने से उच्च अधिकारी से प्राप्त होती है और इस दृष्टि से मुख्य प्रबंधक सत्ता का स्त्रोत होता है। यदि सत्ता स्त्रोत की खोज आगे भी जारी रखी जाए तो हम पाएंगे कि मुख्य प्रबंधक को, कंपनी के सभापति को संचालक मंडल और संचालक मंडल को संस्थान के अंशघारियों अथवा स्वामियों से सत्ता प्राप्त होती है। अतः संस्थान के स्वामियों में सत्ता का अंतिम निवास माना जा सकता है, लेकिन सत्ता स्त्रोत की खोज को सत्ता कहां से प्राप्त होती है? स्वामियों को सत्ता देश के संविधान के अंतर्गत प्राप्त होती हैं जबकि संविधान देश के सभी विधान का मूल स्त्रोत माना जा सकता है।

संविधान का निर्माण, संशोधन एवं परिवर्तन, देशवासियों द्वारा किया जा सकता है और इस प्रकार किसी भी प्रजातांत्रिक देश में सर्वोच्च सत्ता देशवासियों के हाथों में रहती है। इस प्रकार सत्ता सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर करती है। एक बड़ी संस्था में सत्ता का विवरण ऊपर से नीचे की ओर किया जाता है। संगठन की सर्वोच्च सत्ता इसके संस्थापकों के हाथों में मानी जाती है जो इसे सर्वोच्च प्रबंधकों के हाथ में सौप देते हैं। सर्वोच्च प्रबंधक क्यो की सारा काम स्वयं नहीं कर पाते, अपनी सहायता के लिए सहायक अधिकारी नियुक्त करते है और उन्हें उनकी निपुणता व उत्तरदायित्व के अनुरूप कुछ काम सौंप देते हैं। ये सहायक प्रबंधक भी अपनी पारी में अपनी जिम्मेदारी बढ़ जाने पर आगे कुछ सहायक नियुक्त करते हैं और उन्हें सौपे गए कार्यों के अनुरुप कुछ अधिकार सौंप देते हैं। प्रबंधकों की यह क्रमिक नियुक्ति एक ओर संगठन के औपचारिक ढांचे को जन्म देती है और दूसरी ओर संगठन को भरने वाले अधिकारियों को तरह-तरह के अधिकारियों से युक्त कर देती है।


(ii) स्वीकृति का सिद्धान्त :


साइमन तथा बर्नार्ड इस सिद्धान्त के प्रवर्तक माने जाते हैं। इन विद्वानों के मतानुसार किसी भी प्रबंधक के अधिकारों का अस्तित्व केवल उसी दशा में होता है जबकि अधीनस्थ कर्मचारी उन्हें स्वीकार करें। औपचारिक सत्ता एक नाममात्र की सत्ता है। यह सत्ता उसी समय प्रभावशाली बन पाती है, जबकि अधीनस्थ इस सत्ता को स्वीकार कर लें। इस प्रकार सत्ता का वास्तविक स्त्रोत उन व्यक्तियों में निहित होता है जिन पर सत्ता का प्रयोग किया जाना है और इस प्रकार के प्रयोग को स्वीकृति प्रदान करते हैं। टैननबाम के अनुसार, किसी व्यक्ति के पास औपचारिक सत्ता हो सकती है लेकिन यह सत्ता उस समय तक व्यर्थ ही होगी, जब तक कि उसके प्रभावशाली प्रयोग के लिए अधनस्थों की स्वीकृति अप्राप्त है। अधीनस्थ आदेश की सत्ता को उस समय स्वीकार करेगा जब वह उन आदेशों को समझता हो तथा उसके स्वयं के हितों के विरुद्ध नहीं है और वह उन्हें शारीरिक तथा मानसिक रुप से पूरा करने के लिए सक्षम है।


क्षमता का सिद्धान्त: कभी-कभी प्रभावशाली व्यक्तित्व भी अधिकार के स्त्रोत का कार्य करता है। उदाहरण के लिए ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जिन्हें यद्यपि औपचारिक रूप से कुछ भी अधिकार प्राप्त नही होते, किंतु प्रभावी व्यक्तित्व तथा विशिष्ट तकनीकी योग्यता के कारण उन्हें विशेष मान्यता दी जाती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ऐसा ही प्रभावशाली व्यक्तियों में से थे, जिनसे अनेक व्यक्ति आदेश प्राप्त करते थे अनेक कुशल इंजीनियर तथा विद्वान अर्थशास्त्री भी इसी श्रेणी में सम्मिलित किए जा सकते हैं। इसी प्रकार धार्मिक संस्थाओं के प्रबन्धकों के अधिकार प्रायः समाज के मूलभूत आदर्शों तथा व्यक्तियों के आचरणों द्वारा निर्धारित होते हैं एवं उनमें परिवर्तन होने पर प्रबन्धकों के अधिकारों में भी परिवर्तन हो जाता है। इस विचारधारा के अनुयायी उच्च अधिकारी अपने क्षेत्र में स्वीकृति,

योग्यता व निपुणता को उसके अधिकार और सत्ता का स्त्रोत मानते हैं। उदाहरण के लिए, औद्योगिक संगठन में एक औद्योगिक मनोवैज्ञानिक से इसलिए सलाह ली जाती है क्योंकि वह संस्था में लगे कर्मचारियों के मनोविज्ञान के बारे में एक साधारण प्रबंधक से कहीं अधिक जानता है और इसलिए कर्मचारी प्रबंधक को कार्य करने एवं अच्छा वातावरण तैयार करने, उनके लिए सही प्रेरणात्मक पारिश्रामिक नीति तय करने में तथा औद्योगिक संबंधों को अधिक मधुर बनाने की दशा में कहीं अधिक अच्छा परामर्श दे सकता है।


उत्तरदायित्व


प्रबंध साहित्य के क्षेत्र में उत्तरदायित्व शब्द बहुत भ्रांतिपूर्ण है क्योंकि विभिन्न प्रबंधकों द्वारा इसे अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया गया है।

उत्तरदायित्व शब्द को कर्तव्य, कार्य तथा अधिकार के रूप में प्रयोग किया जाता है। कर्तव्य या कार्य के रूप में इसकी एक परिभाषा मोरिस हर्ले ने निम्न प्रकार दी है -


"उत्तरदायित्व वह कर्तव्य है जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति अपने स्थिति या कार्य के कारण से बाध्य है। कुछ उत्तरदायित्वों में उस व्यक्ति के निर्देश का पालन गर्भित होता है जो कि भारार्पण करते हैं।" कुछ व्यक्ति उत्तरदायित्व शब्द को एक आबंधन या दायित्व के रूप में परिभाषित करते है। इस संबंध में निम्नलिखित परिभाषाएं महत्वपूर्ण हैं-


जार्ज आर टेरी के अनुसार, “उत्तरदायित्व एक ऐसा आबंधन या दायित्व है,

जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति सौपे गए कर्तव्यों को अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता से सम्पन्न करता है।" कुण्टज एवं ओ'डोनेल के अनुसार, उत्तरदायित्वों को एक अधीनस्थ कर्मचारी के ऐसे दायित्व के रूप में परिभाषित किया गया है जिसको कोई कार्य सौपा गया है और वह उसे पूरा करता है।" .


लुइस ए. एलन के अनुसार, "उत्तरदायित्व मानसिक तथा शारीरिक क्रियाऐं होती है जिन्हें किसी कार्य के करने अथवा कर्तव्य का पालन करने के लिए किया जाना चाहिए।"


आर. सी. डेविस के अनुसार, "उत्तरदायित्व का आशय अपनी सक्षमता व अधिकारी के निर्देश के अनुसार कार्य करने की सहमति देने से है।"


• एक. ई. हर्ले के अनुसार, 'उत्तरदायित्व वह कर्तव्य है जिससे व्यक्ति अपनी परिस्थिति के कारण बंधा होता है।