प्रमाप के आधार - standard basis
प्रमाप के आधार - standard basis
प्रमाप निर्धारण के मुख्यतः चार आधार होते हैं:
मात्रा
(ii) किस्म
(iii) समय तथा
(iv) लागत
मात्रा प्रमाप उत्पादन, विक्रय स्टॉक आदि के संबंध में होते हैं।
]किस्म प्रमाप- कच्चे माल एवं तैयार माल के संबंध में तथा ग्राहक सेवा एवं कर्मचारी मनोबल के संबंध में होते हैं। समय प्रमाप-उत्पादन में लगने वाले समय के संबंध में होते हैं।
इसी प्रकार लागत प्रमाप श्रम, माल व अन्य खर्चों के संबंध में होते हैं।
(ख) वास्तविक प्रगति का मापन नियंत्रण प्रक्रिया का दूसरा कदम वास्तविक कार्य प्रगति को मापना है। वास्तविक प्रगति का मापन पूर्व निर्धारित प्रमापों के आधार कर किया।
वास्तविक प्रगति के माप से प्रबंधकों को यह जानकारी मिलती है कि कार्य योजना के अनुरुप हुआ है या नहीं। वास्तविक प्रगति के मापन के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रगति का मापन, कार्य पूरा होने पर ही किया जा सकता है अथवा जब कार्य चल रहा हो तब भी हो सकता है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहना उचित होगा कि कार्य प्रगति का मापन दोनों दशाओं में हो सकता है। प्रथम जब कार्य चल रहा हो तो पर्यवेक्षण के माध्यम से यह देखना चाहिए कि कार्य इच्छित गति से हो रहा है अथवा नहीं, ताकि नकारात्मक परिणाम पर तुरन्त सुधारात्मक कार्यवाही करके शेष कार्य में होने वाली हानि को रोका जा सके। द्वितीय, जब संपूर्ण कार्य पूरा हो जाए।
ऐसी स्थिति में नकारात्मक परिणाम आने पर सुधारात्मक कार्यवाही केवल भविष्य के लिए ही की जा सकेगी, अर्थात जो हानि हो चुकी है उसे कम नहीं किया जा सकता । वास्तविक कार्य प्रगति को मापते समय निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए:
(i) कार्य प्रगति के आंकड़े यथासंभव पूर्णतया सही होने चाहिए।
(ii) ये आंकड़े निरंतर तैयार किए जाने चाहिए।
(ii) प्रगति मापने के मापदंड वैसे ही होने चाहिए जैसे कि प्रमाप तय करने के लिए इस्तेमाल किए गए हों।
(iv) प्रगति मापन पद्धति शीघ्र विचलन को प्रकट करने वाली होनी चाहिए।
वास्तविक प्रगति की प्रमापों से तुलना इस चरण पर वास्तविक प्रगति की तुलना प्रमापों से की जाती है। इससे वास्तविक प्रगति एवं प्रमापों में विचलन की जानकारी प्राप्त होती है। (TT)
विचलन दो प्रकार के हो सकते हैं:
नकारात्मक विचलन
धनात्मक विचलन
नियंत्रण प्रक्रिया में ऋणात्मक विचलन अर्थात प्रमाणित कार्य से कम कार्य होने के कारणों का पता लगाना तो जरुरी है ही, लेकिन धनात्मक विचलनों के कारणों की जानकारी प्राप्त करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
गुणनात्मक विचलन का अभिप्राय वास्तविक कार्य प्रमापित कार्य से अधिक होना है। यदि यह जानकारी मिल जाए तो जाता है। वास्तविक प्रगति के माप से प्रबंधकों को यह जानकारी मिलती है कि कार्य योजना के अनुरुप हुआ है या नहीं। वास्तविक प्रगति के मापन के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रगति का मापन, कार्य पूरा होने पर ही किया जा सकता है अथवा जब कार्य चल रहा हो तब भी हो सकता है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहना उचित होगा कि कार्य प्रगति का मापन दोनों दशाओं में हो सकता है। प्रथम जब कार्य चल रहा हो तो पर्यवेक्षण के माध्यम से यह देखना चाहिए कि कार्य इच्छित गति से हो रहा है अथवा नहीं,
ताकि नकारात्मक परिणाम पर तुरन्त सुधारात्मक कार्यवाही करके शेष कार्य में होने वाली हानि को रोका जा सके। द्वितीय, जब संपूर्ण कार्य पूरा हो जाए। ऐसी स्थिति में नकारात्मक परिणाम आने पर सुधारात्मक कार्यवाही केवल भविष्य के लिए ही की जा सकेगी, अर्थात जो हानि हो चुकी है उसे कम नहीं किया जा सकता । वास्तविक कार्य प्रगति को मापते समय निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए:
(i) कार्य प्रगति के आंकड़े यथासंभव पूर्णतया सही होने चाहिए।
(ii) ये आंकड़े निरंतर तैयार किए जाने चाहिए।
(ii) प्रगति मापने के मापदंड वैसे ही होने चाहिए जैसे कि प्रमाप तय करने के लिए इस्तेमाल किए गए हों।
(iv) प्रगति मापन पद्धति शीघ्र विचलन को प्रकट करने वाली होनी चाहिए। वास्तविक प्रगति की प्रमापों से तुलना इस चरण पर वास्तविक प्रगति की तुलना प्रमापों से की जाती है। इससे वास्तविक प्रगति एवं प्रमापों में विचलन की जानकारी प्राप्त होती है। (TT)
विचलन दो प्रकार के हो सकते हैं:
नकारात्मक विचलन
धनात्मक विचलन
नियंत्रण प्रक्रिया में ऋणात्मक विचलन अर्थात प्रमाणित कार्य से कम कार्य होने के कारणों का पता लगाना तो जरुरी है ही, लेकिन धनात्मक विचलनों के कारणों की जानकारी प्राप्त करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। गुणनात्मक विचलन का अभिप्राय वास्तविक कार्य प्रमापित कार्य से अधिक होना है। यदि यह जानकारी मिल जाए तो वास्तविक प्रगति अधिक होने के क्या कारण हैं, तो उनमें और अधिक सुधार करके भविष्य में कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सकता है।
विचलनों का विश्लेषण: इस चरण पर विचलनों का विश्लेषण किया जाता है।
विचलनों के विश्लेषण के दौरान निम्न बातों का अध्ययन किया जाता है:
(i) क्या प्रमाप प्राप्त हो सका? यदि 'हां' तो कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। काम पूर्व की भांति जारी रहेगा. वास्तविक प्रगति का मापन होगा और शेष प्रक्रिया आगे चलेगी। इसके विपरीत यदि प्रमाप प्राप्त नहीं हो सका तो अगले प्रश्न के उत्तर ढूंढने होंगे।
(ii) क्या विचलन स्वीकार्य है? यदि वास्तविक प्रगति प्रमापित प्रगति से कम है लेकिन विचलन स्वीकार्य है (अर्थात ऐसा विचलन नहीं है जिसके लिए सुधारात्मक कार्यवाही की जरुरत हो ) तो पुनः कुछ नहीं करना और काम पहले की भांति आगे चलेगा।
इसके विपरीत, यदि विचलन स्वीकार्य नहीं है तो अगले प्रश्न का उत्तर ढूंढना होगा
(III) क्या प्रमाप स्वीकार्य है? यदि प्रमाप स्वीकार्य है अथवा उसमें कुछ भी गलत नहीं है तो विचलन के कारणों की खोज की जाएगी, तत्पश्चात सुधारात्मक कार्यवाही की जाएगी और काम आगे चलेगा। इसके विपरीत, यदि निर्धारित किया गया प्रमाप ही गलत हो तो अगले प्रश्न का उत्तर ढूंढना होगा।
(iv) प्रमाप का पुननिर्धारणः यदि प्रमाप गलत है तो उसको फिर से निर्धारित किया जाएगा। अतः नये सिरे से प्रमाण निश्चित होगा एवं वास्तविक प्रगति का मापन होगा।
(ङ) सुधारात्मक कार्यवाही करना नियंत्रण प्रक्रिया का अंतिम, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कदम सुधारात्मक कार्यवाही करना है। इससे पूर्व विचलनों व उनके कारणों का पता लगा लिया जाता है। अब बारी आती है वास्तविक कार्य प्रगति में अडचन बने कारणों अथवा बाधाओं को दूर करने की। सुधारात्मक कार्यवाही का उद्देश्य वास्तविक प्रगति को अपेक्षित प्रगति के अनुकूल बनाना है। इसमें दो प्रकार की व्यवस्थाएं शामिल हैं:
वास्ताविक प्रगति में कमी को दूर करना । उदाहरण के लिए, यदि उत्पादन में कमी मशीन की खराबी के कारण हुई तो मशीन को तुरन्त ठीक करवा लेना चाहिए तथा कर्मचारियो से अधिक समय तक काम करवाकर उत्पादन में कमी को पूरा कर लेना वाहिए।
(ii) इस कमी की भविष्य में पुनरावृत्ति को रोकना उदाहरण के लिए, मशीन में खराबी होने के कारणों का गहराई से अध्ययन करके ऐसे उपाय करना ताकि भविष्य में यह समस्या उत्पन्न ही न हो।
सुधारात्मक कार्यवाही में ध्यान रखने योग्य बातें: सुधाारात्मक कार्यवाही करते समय प्रबंधकों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
(1) सुधारात्मक कार्यवाही विचलनों के कारणों की पूरी जांच-पड़ताल करने के बाद की जानी चाहिए।
यदि प्रमाप गलत निर्धारित कर दिए गए थे तो उन्हें ठीक कर देना चाहिए।
सुधारात्मक कार्यवाही उसी प्रबंधक की जानी चाहिए जिसका कार्य से सीधा संबंध हो ।
(iv) (v) कार्यवाही शीघ्र की जाने चाहिए ताकि भविष्य में हानि से बचा जा सके। यदि आश्यक हो तो नीतियों, कार्यविधियों, नियमों आदि में परिवर्तन कर देना चाहिए
सुधारात्मक कार्यवाही करने के संबंध में एक विशेष बात यह है कि मात्र सुधारात्मक कार्यवाही कर देने से ही नियंत्रण कार्य पूरा नहीं हो जाता बल्कि यह भी देखना चाहिए कि इस कार्यवाही का वास्तविक परिणामों पर क्या प्रभाव पड़ा और नकारात्मक परिणाम मिलने पर पुनः सुधारात्मक कार्यवाही करनी चाहिए। इसीलिए कहा जाता है कि नियंत्रण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
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