नियोजन के प्रकार - types of planning

नियोजन के प्रकार - types of planning


नियोजन एक प्रक्रिया है और योजना उसका परिणाम योजना परिणामों को प्राप्त | करने के लिए की जाने वाली क्रियाओं को पूरा करने का एक वायदा है। इस दृष्टिकोण से योजनायें अनेक प्रकार की होती हैं। योजनाओं के प्रकार को समझने में निम्न विवेचन सहायक होगा।


प्रत्येक संस्था का एक केन्द्रीय लक्ष्य होता है जिसे मिशन भी कहते हैं। एक व्यवसायिक संस्था को अर्थपूर्ण तभी माना जाता है जब उसका कोई लक्ष्य हो। जिससे संस्था की स्थापना का औचित्य स्पष्ट होता है। यह संस्था के व्यवसाय की विशेषता स्पष्ट करता है और यह बताता है कि एक संस्था उसी प्रकार की अन्य संस्थाओं से कैसे भिन्न है। उदाहरण के लिए,

एक शिक्षण संस्था का लक्ष्य / मिशन केवल लड़कियों को शिक्षित करना हो सकता है। इसी प्रकार एक अस्पताल का लक्ष्य केवल दिल के मरीजों का इलाज करना हो सकता है


लक्ष्य प्राप्ति के संदर्भ में अनेक योजनाएं तैयार की जाती है। सर्वप्रथम संस्था के उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है। प्रतियोगिता का डटकर मुकाबला करते हुए उद्देश्यों को वास्तविकता में बदलने के लिए मोर्चाबन्दी / रणनीति तैयार की जाती है। विभिन्न प्रबन्धकों द्वारा लिए जाने वाले निणयों में एकरूपता लाने के लिए नीतियां बनाई जाती हैं। नीतियां निर्धारण कर लेने के बाद क्रियाओं का क्रम निर्धारित किया जाता है।

जिसे कार्यविधि कहते हैं। इसी प्रकार पद्धतियां, नियम, बजट, कार्यक्रम आदि नियोजन के प्रमुख तत्व हैं, ये सभी योजनाएं कहलाती है। एक उच्चस्तरीय योजना निम्नस्तरीय योजना को जन्म देती है।


योजनाओं का प्राथमिकता क्रम


(क) उद्देश्य


उद्देश्य वे अंतिम बिंदु हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए सभी क्रियाएं की जाती हैं। उद्देश्य के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।


संदेशवाहन प्रणाली में सुधार के लिए लगातार सभाएं करना व समाचार-पत्र प्रकाशित करना


(ii) साबुनों की बिक्री को 20000 करोड़ रुपये के पार ले जाना । प्रत्येक वर्ष 100 लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना।


(iii)


(iv) गुणतवता के कारण माल की वापसी को 3 प्रतिशत तक लेकर आना । उद्देश्यों में निम्न विषेशताएं होनी चाहिए:


स्पष्ट होने चाहिए।


■ परिणाम से संबंधित होने चाहिए न कि उन्हें प्राप्त करने के लिए की जाने वाली क्रियाओं से।


• मापने योग्य होने चाहिए।


इन्हें प्राप्त करने की समय सीमा निर्धारित होना चाहिए।


प्राप्त करने योग्य होने चाहिए


(ख) मोर्चाबंदी


मोर्चाबंदी वे योजनाएं हैं जो प्रतियोगियों की चाल को ध्यान में रखकर तैयार की जाती


हैं और जिनका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग संभव बनाना है। उदाहरण के लिए, यदि कोई प्रतियोगी संस्था अपने माल की बिक्री बढ़ाने के लिए- वस्तुओं के मूल्य में कमी करने जा रही है या विज्ञापन के नए तरीकों को अपनाने पर विचार कर रही है या उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए कोई उपहार योजना निकाल रही है तो इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही हमें भी अपनी मोर्चाबंदी करनी होगी।


मोर्चाबंदी दो प्रकार की होती है-


• बाहरी मोर्चाबंदी तथा


• आंतरिक मोर्चाबंदी


जब प्रतियोगीयों की योजनाओं को ध्यान में रखकर हम अपनी योजनाएं बनाते हैं तो इसे बाहरी मोर्चाबंदी कहते हैं। यदि किसी परिवर्तन से संस्था के अंदर कोई समस्या उत्पन्न होने वाली है तो उसका सामना करने के लिए पहले ही तैयारी करने को आंतरिक मोर्चाबंदी कहते हैं, जैसे- फैक्ट्री में मशीनीकरण करना, जिससे अनेक व्यक्तियों की छंटनी हो सकती है। इस व्यवस्था के लागू करने पर कर्मचारियों के विरोध का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी करनी होगी ताकि नई व्यवस्था भी लागू हो जाए और कर्मचारी भी नाराज न हों। 


नीतियां


नीतियां वे सामान्य विवरण है जो निर्णय में कर्मचारियों के मार्गदर्शन हेतु बनायी जाती हैं। इनका उद्देश्य एक ऐसी सीमा निर्धारण करना है

जिसके अंदर रहते हुए ही कोई कार्य किया जा सकता है अथवा कोई निर्णय लिया जा सकता है। उद्देश्य यह निश्चित करते हैं कि हमें क्या प्राप्त करना है तथा नीतियां यह बताती है कि कैसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रायः हम कुछ नीतियों के संबंध में सुनते रहते हैं, जैसे-


सेविवर्गीय नीति- इस नीति में यह निश्चित किया जा सकता है कि कर्मचारियों की तरक्की का आधार उनकी आयु होगा। एक बार यह निश्चित कर देने के बाद किसी भी विभागीय प्रबंधक को कर्मचारियों की तरक्की के बारे में उच्च प्रबंधक से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं रहती।

(ii) विक्रय नीति- इस नीति में यह निश्चित किया जाता है कि माल केवल नकद बेचा जाएगा या उधार भी।


(iii) मूल्य निर्धारण नीति- इसके अंतर्गत यह निश्चित किया जाता है कि वस्तुओं का विक्रय कैसे निर्धारित किया जाएगा अर्थात लागत में कितना लाभ जोड़कर विक्रय मूल्य तय होगा तथा व्यापारिक छूट एवं नकद छूट की क्या शर्तें होंगी। वास्तव में नीति निरंतर चलने वाला एक निर्णय है जो बार-बार पैदा होने वाली एक समान समस्याओं अथवा परिस्थितियों में प्रबन्धको का मार्ग-दर्शन करता है।


कार्यविधियां :


कार्यविधियां ये योजनाएं हैं जो किसी काम को पूरा करने के लिए की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं का क्रम निश्चित करती हैं। उदाहरणार्थ, देनदारों से रुपया वसूल करने का क्रम इस प्रकार निश्चित किया जा सकता है: पत्र लिखना (ii) टेलिफोन करना,


(iii)


व्यक्तिगत रुप से जाकर मिलना तथा


(iv) वैधानिक कार्यवाही करना ।


इस प्रकार सभी देनदारों से रुपया एकत्रित करने की यह एक कार्यविधि है। नीतियों और कार्यविधियों में अंतर होता है। देनदारों से रुपया वसूल करने के संबंध में संस्था की दो नीतियां हो सकती हैं:


• सख्त वसूली नीति तथा


नरम वसूली नीति तथा


पहली नीति में देनदारों के साथ सख्त व्यवहार करते हुए शीघ्र रुपया वसूल करने का प्रयास किया जाएगा,

जबकि द्वितीय नीति में देनदारों को भुगतान करने का पूरा समय देते हुए उनसे नरम व्यवहार किया जाएगा। इन दोनों प्रकार की नीतियों में रुपया वसूल करने की कार्यविधि ऊपर बताई गई ही रहेगी अर्थात रुपया वसूल क रने के लिए उठाए जाने वाले कदम समान होंगें।


(ङ) पद्धतियां :-


पद्धति वह योजना है जो यह निश्चित करती है कि कार्यविधि में बताई गई विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक क्रिया को कैसे पूरा किया जाएगा। पद्धति का संबंध सभी क्रियाओं से न होकर किसी एक क्रिया से होता है और यह कार्यविधि की तुलना में अधिक विस्तृत होती है। एक कार्य को पूरा करने की अनेक पद्धतियां हो सकती हैं।

गहन अध्ययन के बाद ऐसी पद्धति का चयन किया जाता है जिससे काम करने वाले व्यक्ति को थकावट कम हो. उत्पादकता में वृद्धि हो तथा लागतें कम आएं। इस प्रकार चुनी गई पद्धति को ही दैनिक प्रयोग में लाया जाता है और इसे पद्धति कहते हैं। इस पद्धति में लगातार सुधार के प्रयत्न किए जाते हैं ताकि अनावश्यक अथवा अनुपादक प्रयासों को पद्धति में से निकाल दिया जाएं।


(च) नियम :


नियम हमें बताते हैं कि किसी विशेष परिस्थिति में क्या करना है और क्या नहीं करना । नियम के होते हुए किसी तरह का निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं है।

नियम में जो बात कही गई है बिना किसी सोच विचार के उसका पालन करना ही होगा। जैसे - कारखाने में धूम्रपान का वर्जित होना एक नियम है जो सभी पर लागू होता है और इसका पालन करना अवश्य होना चाहिए। नियम का पालन न करने पर दण्ड की व्यवस्था भी की जा सकती है


नियम एवं नीति में अंतर होता है। नीति केवल मार्ग-दर्शन करती है और अधिकारियों को एक सीमा के अंदर निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करती है जैसे माल उधार बेचा जा सकता है, यह एक नीति है। लेकिन किस ग्राहक को माल उधार देना है और किसको नहीं, यह विक्रय प्रबंधक को देखना है।

अर्थात यहां उसे अपने विवेक का प्रयोग करना होगा। दूसरी ओर, नियम स्थिर होते हैं और नियम के आगे विवेक की जरुरत नहीं होती:- जैसे - प्रत्येक कर्मचारी को महीने में एक छुट्टी मिलेगी। एक से ज्यादा छुट्टी लेने पर वेतन कटेगा। यह एक नियम है और सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होगा।


नियम एवं कार्यविधि में भी अंतर होता है। नियम यह बताते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना, जबकि कार्यविधियां एक विशेष क्रिया को पूरा करने का क्रम निश्चित करती हैं: जैसे - यदि एक कर्मचारी ने बिना पूछे महीने में एक से ज्यादा छुट्टी ली तो उसका वेतन कट जाएगा। यदि उस कर्मचारी को नौकरी से निकालना है तो उसे पहले कारण बताओ नोटिस दिया जाएगा, उसके बाद ही कोई सख्त कार्यवाही होगी।


(छ) बजट


बजट इच्छित परिणामों के गणनात्मक विवरण होते हैं। बजट वह योजना है जो विभिन्न विभागों में निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक अनुमानित धन सामग्री, समय एवं अन्य साधनों का ब्योरा देती है। उदाहरणार्थ, क्रय विभाग के बजट में इस बारे में अनुमानित आंकड़े दिए जाते हैं कि किस-किस तरह का माल कितनी कितनी मात्रा में कब-कब खरीदा जाएगा और इस पर कितनी लागत आएगी। इसी प्रकार अन्य विभागों के भी बजट तैयार कर लिए जाते है। आमतौर पर बजट सालाना प्रक्रिया है।


बजट का संबंध नियोजन व नियंत्रण दोनों से होता है। जब हम बजट तैयार करते हैं तो इसका संबंध नियोजन से होता है और जब हम परिणामों को मापने के लिए उदाहरण के रूप में इसका प्रयोग करते हैं

तो इसका संबंध नियंत्रण से होता है। इस प्रकार प्रबंधक वास्तविक प्रगति की तुलना बजटकीय आंकड़ों से करके सफलता अथवा असफलता के बारे में जानकारी प्राप्त करता है।


(ज) कार्यक्रम :


कार्यक्रम का अर्थ किसी विशेष कार्य को पूरा करने के लिए बनाई गई एकल उपभोग विस्तृत योजना से है जो यह निश्चित करती है कि क्या किया जाएगा, कैसे किया जाएगा, कौन करेगा तथा कब करेगा। कार्यक्रम प्रबन्धकों को विभिन्न जरुरतों के बारे में पहले से ही सूचित कर देते हैं ताकि भविष्य में कोई समस्या उत्पन्न न हो ।

कार्यक्रम अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जैसे उत्पादन कार्यक्रम विक्रय संवर्द्धन कार्यक्रम, प्रबंध विकास कार्यक्रम, आदि। एक उत्पादन कार्यक्रम बनाने के लिए कच्चे माल को खरीदने से लेकर माल को तैयार करने तक की सभी क्रियाओं को क्या, कैसे, कौन, कब में परिभाषित कर दिया जाता है। जैसे ही वह काम पूरा हो जाता है।


जिसके लिए कार्यक्रम बनाया जाता है उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। अन्य शब्दों में, हर नए काम के लिए नया कार्यक्रम बनाया जाता है।